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Karnataka Lok Sabha Chunav: लिंगायतों का जनाधार, 14 सीटों पर प्रभाव, बीजेपी गढ़ बचा लेगी या आगे रहेगी कांग्रेस

Karnataka Lok Sabha Election: कर्नाटक के दूसरे चरण में आज उत्तर और मध्य कर्नाटक की सभी 14 सीटों पर मतदान हो रहा है। खासकर उत्तर कर्नाटक वो इलाका है, जिसे भाजपा का गढ़ माना जाता है और 2019 में यहां की सभी 14 सीटें बीजेपी ने ही जीती थी।

26 अप्रैल, 2024 को दक्षिण कर्नाटक की 14 सीटों पर चुनाव हुए थे। यह इलाका मूल रूप से वोक्कालिगा समुदाय के वर्चस्व वाला क्षेत्र माना जाता है। लेकिन, उत्तर कर्नाटक में लिंगायत समुदाय राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा प्रभावी रहे हैं, वहीं ओबीसी, दलित और आदिवासी समाज की भी अच्छी उपस्थिति है।

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2019 के चुनाव में भाजपा ने सभी सीटों पर लहराया था परचम

उत्तर और मध्य कर्नाटक में बीजेपी और कांग्रेस में ही सीधा मुकाबला नजर आ रहा है। क्योंकि, इस चरण में भाजपा की सहयोगी जेडीएस मैदान में नहीं है। पहले मध्य कर्नाटक में कांग्रेस का दबदबा रहता था। लेकिन, 2019 में कांग्रेस वहां से भी पैदल हो गई।

सर्वे में दिखता है लिंगायतों का वोटिंग पैटर्न
उत्तर कर्नाटक को लेकर लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे पर यकीन करें तो 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा को लिंगायतों के 60% से ज्यादा वोट मिले। उस सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में बीजेपी को मिलने वाला लिंगायतों का समर्थन बढ़कर 87% के लगभग पहुंच गया।

लिंगायत वोट बैंक पर बीजेपी की रही है पकड़
यह रुझान चुनाव परिणामों में भी दिखता है, जब 2014 में कांग्रेस ने इन 14 में से 4 सीटें हासिल भी की थीं, लेकिन 2019 में वह यहां से पूरी तरह से साफ हो गई थी। यह सर्वे बताता है कि 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस का ग्राफ आसमान पर पहुंचा और बीजेपी सत्ता से बेदखल हुई थी तो भी उसे लिंगायतों के 56% वोट मिले थे।

वहीं 2014 के बाद कांग्रेस अगर लिंगायतों का एक-चौथाई वोट मैनेज कर पा रही थी तो 2019 में उसका प्रभाव सिमटकर महज 10% लिंगायत वोट बैंक तक रह गया था।

2023 के नतीजों के बाद बीजेपी ने बदली रणनीति
2023 के नतीजों से सीख लेकर बीजेपी ने अपने संगठन और चुनाव रणनीति में कई बदलाव किए हैं। पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा फिर से पार्टी के सबसे कद्दावर नेता के रूप में स्थापित हुए हैं। उनके एक बेटे को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है और दूसरे सांसद बेटे को विरोध और बगावत के बावजूद फिर से टिकट दिया गया है।

कर्नाटक में येदियुरप्पा आज भी बीजेपी के सबसे बड़े लिंगायत नेता हैं। इनके अलावा पार्टी ने उत्तर कर्नाटक से ही अपने दो पूर्व मुख्यमंत्रियों बसवराज बोम्मई और जगदीश शेट्टार को भी चुनाव मैदान में उतारा है। विधानसभा चुनाव में शेट्टार कांग्रेस में चले गए थे। ये दोनों भी लिंगायत समुदाय के हैं।

उत्तर कर्नाटक में लिंगायत ही दिखाएंगे दम?
भाजपा इस उम्मीद में है कि राज्य की कांग्रेस सरकार में जिस तरह से मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के पदों पर गैर-लिंगायत नेताओं की मौजूदगी है, उससे वह फिर से लिंगायतों को अपने पक्ष में गोलबंद करने में सफल रहेगी। ऐसे में इस चरण में लिंगायतों का वोटिंग पैटर्न क्या रहता है, उससे काफी हद तक चुनाव परिणामों पर असर पड़ेगा।

कांग्रेस ने टिकट बांटने में 'परिवार' पर किया भरोसा
हालांकि बीजेपी ने 14 सीटों में से आधे मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए हैं। ऐसे में पार्टी के एक खेमे में खुलकर नाराजगी देखी गई है। टिकट बंटवारे में येदियुरप्पा पर मनमानी के भी आरोप लगे हैं। वहीं कांग्रेस ने 14 में से 8 टिकट राज्य सरकार के मंत्रियों के बेटे-बेटियों और पार्टी के बड़े नेताओं के रिश्तेदारों में बांट दिए हैं। जबकि, राज्य सरकार का कोई भी सीनियर मंत्री खुद चुनाव मैदान में उतरने के लिए तैयार नहीं हुआ है।

कांग्रेस ने अपने सिर्फ एक ही प्रत्याशी को रिपीट किया है। राज्य में कांग्रेस की बड़ी बहुमत वाली सरकार है, जिसने बड़ी चुनावी गारंटियों के दम पर जीत मुकम्मल की है। वह अबकी बार इस क्षेत्र में भी अधिकतर सीटें जीतने की उम्मीदें लगाए बैठी है। इस दौर के साथ ही कर्नाटक की सभी 28 सीटों पर चुनाव संपन्न होगा और नतीजे 4 जून को आएंगे।

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