कर्नाटक में बीजेपी 2019 में खेलेगी लिंगायत और किसान कार्ड? येदुरप्पा ने दिए संकेत

बेंगलूूूूरु: कर्नाटक चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद जिस प्रकार घटनाक्रम बदले, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि इस चुनाव की गूंज देश की राजनीति में लम्बे समय तक सुनाई देगी। बीएस येदुरप्पा ने फ्लोर टेस्ट से कुछ समय पहले विधानसभा में एक भावुक भाषण दिया और उसके बाद बहुमत परीक्षण से अपने कदम वापस खींचते हुए इस्तीफा दे दिया। दरअसल ये भाषण एक तरफ ये भी इशारा कर रहा था कि उन्हें बहुमत न जुटा पाने का अफसोस है, वहीं दूसरी तरफ येदुरप्पा लिंगायत और किसानों के मुद्दे पर बोलकर बीजेपी के लिए 2019 की जमीन को और मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे।

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येदुरप्पा ने कहा कि, में जानदेश के बाद सीएम बना था और मुझे जो जिम्मेदारी दी गई मैंने उसे निभाया। हम चुनाव में 40 सीटों से 104 पर पहुंच गए है, वहीं कांग्रेस 122 से घटकर 78 पर पहुंच गई है। कांग्रेस ने जनादेश का अपमान किया है। येदुरप्पा ने यहां पीएम मोदी की तारीफ भी की और कहा कि उन्होंने कर्नाटक के लिए बहुत कुछ किया है। अगर यहां की जनता ने उन्हें बहुमत दिया होता तो वो कर्नाटक को स्वर्ग बना सकते थे।

येदुरप्पा ने शुरु की 2019 की तैयारी

येदुरप्पा ने शुरु की 2019 की तैयारी

येदुरप्पा ने कहा कि, मैं चुनाव के दौरा पूरे राज्य में घूमा, राज्य में किसानों की हालत बहुत खराब है। हमने सोचा था कि किसानों के लिए काम करेंगे। मैं आखिरी सांस तक किसानों के हित के लिए लड़ता रहूंगा। सिद्धारमैया ने कुछ भी काम नहीं किया है। राज्य में पानी की सप्लाई, एमएसपी आदि पर हमें फोकस करने की जरूरत है। किसानों के मुद्दे पर बोलते हुए येदुरप्पा भावुक हो गए थे। याद दिला दें कि बीएस येदुरप्पा ने शपथ ग्रहण के वक्त हरे रंग का साफा भी ओढ़ा था जो कि किसानों का प्रतीक माना जाता है।

किसानों की लड़ाई लड़ने का दिया संकेत

किसानों की लड़ाई लड़ने का दिया संकेत

विधानसभा में येदुरप्पा ने किसानों के मुद्दे को उठाकर उनका विश्वास जीतने की कोशिश की है और येदुरप्पा अब विधानसभा चुनाव के बाद 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारी करते दिखाई दे रहे हैं। इसका इशारा भी उन्होंने दिया जब उन्होंने कहा कि उनके पास कोई पद रहे या न रहे, किसानों के हित के लिए काम करते रहेंगे और आखिरी सांस तक किसानों के हित के लिए लड़ते रहेंगे। कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय का बहुत प्रभाव रहा है और इसी कारण सभी राजनीतिक लिंगायतों को लुभाने के लिए तरह-तरह के वादे करते रहते हैं।

लिंगायतों के सबसे बड़े नेता हैं येदुरप्पा

लिंगायतों के सबसे बड़े नेता हैं येदुरप्पा

कांग्रेस ने तो कर्नाटक चुनाव के दौरान लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने की बात भी कही थी लेकिन ये कांग्रेस पर ही भारी पड़ा था। वहीं बीएस येदियुरप्पा ने विधायकों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील की थी, इसका साफ इशारा था कि वो लिंगायत विधायकों को अपनी ओर खींचना चाहते थे। लोकसभा चुनाव में भी लिंगायत वोट बीजेपी के पक्ष में जा सकते हैं। आपको बता दें कि इस चुनाव में भी लिंगायत बाहुल सीटों पर बीजेपी का वोट शेयर कांग्रेस के मुकाबले काफी अधिक था और ये तब जब कांग्रेस ने लिंगायतों को लुभाने के लिए उन्हें अलग धर्म का दर्जा दिए जाने बात की। कांग्रेस विधायकों ने भी इसपर विरोध जताया था।
लिंगायत विधायकों पर भी रहेगी नजरें

कांग्रेस के लिंगायत विधायकों ने चुनाव बाद जेडीएस से गठबंधन का विरोध किया था और ये सब कांग्रेस के लिए आगे आसान नहीं होने वाला है। भाजपा ने सीएम उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा को बनाया था और येदियुरप्पा पूरे कर्नाटक में सबसे बड़ा लिंगायत चेहरा हैं। येदुरप्पा ये दाव भी खेल सकते हैं कि एक लिंगायत को इन्होने मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया। ऐसे में कांग्रेस के लिए भविष्य में येदुरप्पा से निपटना आसान नहीं होगा और येदुरप्पा भी इस हार को लोकसभा चुनावों में एक बड़ी जीत में बदलने की पूरी कोशिश करेंगे। बता दें कि येदुरप्पा ने विधानसभा में इस्तीफा देने का ऐलान किया और इसी के साथ कर्नाटक में 5 दिनों से चल रही सियासी उठापटक पर काफी हदतक विराम लग गया।

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