कर्नाटक चुनाव में गुजरात वाला प्रयोग करना चाहती है बीजेपी, जानिए कहां फंसेगा पेच?
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी इसबार कुछ चौंकाने वाली लिस्ट जारी करने का संकेत दे रही है। वह राज्य में गुजरात अपनाने का भी हिंट दे रही है। लेकिन,पार्टी के लिए यह बहुत ही चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

कर्नाटक में बीजेपी की ओर से उम्मीदवारों की लिस्ट जारी होने में देरी हो रही है तो तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। लेकिन, पार्टी की ओर से कहा जा रहा है कि सबकुछ ठीक है और इसबार प्रदेश में नया प्रयोग किया जा रहा है, जो कई राज्यों सफल हो चुका है। यानि पार्टी संकेत दे रही है कि जिन उम्मीदवारों की छवि उनके चुनाव क्षेत्र में अच्छी नहीं होगी, उन्हें टिकट की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। लेकिन, शायद भाजपा के नेता यह भूल रहे हैं कि कर्नाटक, गुजरात नहीं है। गुजरात में पार्टी ने बड़े-बड़े दिग्गजों को साइड कर दिया था और परिणाम ऐसे आए कि पार्टी ने आजतक के सारे रिकॉर्ड टूट गए।

कर्नाटक में 'सरप्राइज' करना चाहती है बीजेपी
कर्नाटक चुनाव में बीजेपी के अंदर उम्मीदवारों की लिस्ट को लेकर कश्मकश जारी है। लेकिन, प्रदेश नेतृत्व की ओर से जो संकेत दिए जा रहे हैं, उससे लगता है कि पार्टी उम्मीदवारों की एंटी-इंकंबेंसी झेलने को तैयार नहीं है। इसलिए पार्टी की ओर से इशारा किया जा रहा है कि कई राज्यों में किए गए सफल प्रयोग को कर्नाटक में भी अपनाना चाहती है। बैंगलोर मिरर की एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा है कि पहली लिस्ट में कई नए चेहरे देखने को मिलेंगे। उन्होंने कहा है, 'इस चुनाव में आपको उम्मीदवारों के चयन में सरप्राइज देखने को मिलेंगे।'

गुजरात समेत कई राज्यों में सफल हुआ भाजपा का प्रयोग
पिछले साल दिसंबर में गुजरात विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने करीब 50 सीटिंग विधायकों का टिकट काट दिया था। पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर बड़े-बड़े दिग्गज पहले ही साइडलाइन कर दिए गए थे। इससे पार्टी को विधायकों के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी मिटाने में बड़ी मदद मिली। पार्टी को वहां इतनी बड़ी जीत मिली कि राज्य का आजतक का सारा रिकॉर्ड ही टूट गया। छत्तीसगढ़ लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने सबका टिकट काट दिया और सत्ताधारी कांग्रेस को हाथ मलने पर मजबूर होना पड़ा। यह प्रयोग पार्टी यूपी, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश हर जगह कर चुकी है और उसे नुकसान से ज्यादा फायदा मिला है। 2017 के एमसीडी चुनावों में तो लगभग सारे बदल डाले थे और पार्टी दिल्ली नगर निगम पर कायम रह गई थी। लेकिन, इसबार यह इसके हाथ से निकल गया है।

विधायकों की एंटी-इंकंबेंसी से निपटने का फंडा
कर्नाटक के सीएम जो कुछ कह रहे हैं, उससे कुछ इसी तरह का अर्थ निकलता है। उन्होंने कहा है, 'टिकट लोकतांत्रिक तरीके से बांटे जाएंगे। जमीनी स्तर से रिपोर्ट जुटाने और जमीनी सच्चाई के आधार पर ही लिस्ट तैयार की जा रही है।' सीएम जो कुछ कह रहे हैं, उसका मतलब यही है कि पार्टी अपने विधायकों की परफॉर्मेंस पर ध्यान देगी। जिनका रिपोर्ट कार्ड पार्टी नेतृत्व को नहीं जंचेगा, उनका नाम लिस्ट से गायब हो सकता है। उन्होंने कहा है, 'कई जगहों में नए प्रयोग किए जाएंगे। यह कई राज्यों में सफल रहा है। हम ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देंगे, जो चौंकाने वाले होंगे'

कहां फंसेगा पेच?
कर्नाटक में बीजेपी जो चेहरा बदलने की रणनीति बना रही है, वह राज्य की राजनीति में बहुत ही ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। गुजरात में वह ऐसा चुनाव लड़ रही थी, जहां विपक्ष जमीन पर था ही नहीं। लेकिन, कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस मजबूत स्थिति में हैं। 2019 में बीजेपी की सरकार इसलिए बनी थी, क्योंकि कांग्रेस के विधायक ही पार्टी छोड़कर भाजपा के साथ आ गए थे। ऊपर से कर्नाटक में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है, जिसको लेकर कांग्रेस बीजेपी सरकार को लगातार दबाव में रख रही है। एक विधायक का बेटा 40 लाख रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा जा चुका है। उसके दफ्तर और विधायक के घर से करीब 8 करोड़ रुपए बरामद हुए हैं। कांग्रेस ने '40 प्रतिशत कमीशन वाली सरकार' को अपना नारा बना रखा है।
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कर्नाटक जीतने के बीजेपी तीन बड़े फॉर्मूले
हालांकि, फिर भी भाजपा के पास कुछ ऐसे फॉर्मूले हैं, जिसके दम पर वह टिकट कटने से असंतुष्ट हुए नेताओं की नाराजगी के बावजूद अपना चुनावी धार मजबूत कर सकती है।
पहला- नरेंद्र मोदी, जो कि विकास और डबल इंजन की सरकार के दम पर बीजेपी को सत्ता में वापस बिठाना चाहते हैं। कांग्रेस भी मानती है कि पीएम मोदी राज्य के चुनाव में बहुत बड़े फैक्टर बन सकते हैं। इसलिए पार्टी ने अनौपचारिक तौर पर राज्य में नेताओं-कार्यकर्ताओं से उनपर सीधे हमला करने से बचने को कहा है।
दूसरा- हिंदुत्व बनाम टीपू सुल्तान। बीजेपी ने राज्य में मुस्लिमों को मिलने वाला 4 फीसदी ओबीसी कोटा खत्म करके अपना निशाना लगा दिया है। साथ ही साथ उसे वोक्कालिगा और लिंगायतों में बांट कर अपना इरादा भी जाहिर कर दिया है। टीपू सुल्तान को निशाना बनाते रहना भी उसकी रणनीतियों में शामिल है। कांग्रेस ने पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं को जो हिदायत दी है, उसमें यह भी है कि किसी भी तरह से हिंदुत्व बनाम सेक्युलरिज्म की बहस में न पड़ें।
तीसरा- बीएस येदियुरप्पा। कर्नाटक में भाजपा का सबसे बड़ा वोट बैंक अभी भी लिंगायत माने जाते हैं। पूर्व सीएम येदियुरप्पा को पार्टी इसलिए बहुत ही ज्यादा अहमियत दे रही है, ताकि यह समाज उसके साथ बना रहे। बाकी का काम वह आरक्षण और हिंदुत्ववादी एजेंडे के साथ-साथ विकास की बातों से पूरा करना चाहती है।













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