Karnataka election 2023: क्यों जो पार्टी पुराने मैसूर में जीतेगी, वही कर्नाटक में राज करेगी?
Karnataka election 2023: इस बार कर्नाटक में सभी दल पुराने मैसूर पर पूरा फोकस कर रही हैं। बीजेपी पहले इस क्षेत्र में उतनी प्रभावी नहीं थी। लेकिन, अबकी बार कहानी बदल चुकी है।

Who will win Karnataka election 2023: कर्नाटक में इसबार पुराने मैसूर की लड़ाई निर्णायक साबित हो सकती है। अबतक वहां सीधा मुकाबला होता रहा था। लेकिन, अबकी बार चुनावी फिजा बदली हुई है। सत्ताधारी भाजपा ने पुराने मैसूर की जंग जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। दूसरी तरफ यह ऐसा क्षेत्र है, जहां से तीन-तीन नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। इसलिए बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस सभी दलों को लगने लगा है कि जिस भी पार्टी ने पुराने मैसूर की बाजी जीती, बैंगलुरु की कुर्सी उसकी!

पुराने मैसूर क्षेत्र का किंग, कर्नाटक का किंग?
पुराने मैसूर के इलाके में पारंपरिक तौर पर जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस के बीच चुनावी लड़ाई होती रही है। लेकिन, इस बार यहां पर बीजेपी ने भी अपना पूरा जोर लगा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक इसी इलाके में बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की शुरुआत करके आ चुके हैं। इसलिए इसबार यहां त्रिकोणीय मुकाबला तय हो गया है। यह क्षेत्र पारंपरिक तौर पर वोक्कालिगा समाज के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है और तीनों ही प्रमुख दलों ने इनका वोट लेने के लिए अपनी रणनीति तैयार की है। क्योंकि, तीनों को ही लग रहा है कि जो भी पार्टी पुराने मैसूर क्षेत्र में बढ़त बनाएगी, बैंगलुरु की गद्दी उसे ही मिलेगी।

पुराने मैसूर में कम से कम 35 सीटें जीतने का भाजपा का लक्ष्य
कर्नाटक के कोलार, चिक्काबल्लापुर, बैंगलुरु ग्रामीण, तुमकुरु,रामनगर, मांड्या, मैसुरु, चामराजनगर और हासन जिले में 52 सीटें हैं, जो कि इसबार की चुनावी लड़ाई के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। मांड्या सीट की निर्दलीय सांसद सुमलता अंबरीश ने भाजपा को समर्थन दिया है, जो कि लोकप्रिय स्टार अंबरीश की पत्नी हैं और इलाके में इनकी अच्छी छवि है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह यहां पर रोड शो करके बता चुके हैं कि बीजेपी के लिए इस क्षेत्र के मायने क्या हैं। जानकारी के मुताबिक भाजपा ने इस इलाके में कम से कम 35 सीटें जीतने की योजना बना रखी है।

जेडीएस का गढ़ रहा है पुराने मैसूर का इलाका
भाजपा को भरोसा है कि उसने ऐतिहासिक मायसुगर फैक्ट्री और पांडवपुरा कोऑपरेटिव सुगर फैक्ट्री को फिर से खोलकर दिखाया है तो चुनावों में उसे इसका लाभ जरूर मिलेगा। वहीं, जेडीएस इसे अपना गढ़ मानती है। बावजूद इसके 93 साल की उम्र में भी पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा सबसे पहले यहां सड़कों पर उतरकर चुनावी लड़ाई का आगाज कर चुके हैं। वहीं उनके बेटे और पूर्व सीएम एचडी कुमारस्वामी भी पंचतंत्र यात्रा लेकर इस इलाके में अपने वोट बैंक को एकबार फिर से जगाने की कोशिश करते देखे गए हैं। वैसे कई सारे राजनीति विश्वेषकों का मानना है कि जेडीएस किसी तरह 30-40 सीट लाने के ही जुगाड़ में लगी हुई है, ताकि वह एकबार फिर से किंगमेकर की भूमिका में आ सके। क्योंकि, बीजेपी के उभार के बाद उसका पूरे कर्नाटक में प्रभाव नहीं रह गया है।
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कांग्रेस भी बड़ी लड़ाई के लिए तैयार है
जहां तक कांग्रेस की बात है तो पूर्व सीएम सिद्दारमैया के लिए यह चुनाव निजी तौर पर भी प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी है। वह चामुंडेश्वरी से चुनाव हार गए थे। उनके लिए इस क्षेत्र से बड़ी जीत दर्ज करना अब चुनौती बन चुकी है। वह इसबार अपनी पारंपरिक सीट वरुणा से चुनाव लड़ने के लिए कमर कस चुके हैं, लेकिन यहां उनकी टक्कर दिग्गज भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के बेटे बीवाई विजयेंद्र से हो सकती है। वोक्कलिका समाज पर प्रभाव डालने के लिए कांग्रेस पूरा जोर लगा रही है, जिनपर पिछले चुनाव तक जेडीएस का प्रभाव देखा गया था। लेकिन, 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां भी अपनी दस्तक देकर दिखाई थी।

पुराना मैसूर तय करेगा कर्नाटक की नई सरकार?
इस तरह से पुराने मैसूर के क्षेत्र में मुख्यमंत्री पद के तीन-तीन दावेदार नजर आ रहे है। कांग्रेस के दोनों बड़े नेता सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार यहीं से हैं और एचडी कुमारस्वामी का तो यह गढ़ ही माना जाता है। शिवकुमार और कुमारस्वामी दोनों वोक्कालिगा समाज के हैं, जो अबकी बार अपनी बिरादरी से वोट के लिए भावनात्मक अपील कर रहे हैं। इस तरह से पुराने मैसूर के कई सीटों पर इस बार कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है और यहां से जो पार्टी आगे निकली, बैंगलुरु की गद्दी पर उसे ही बैठने का मौका मिल सकता है।













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