कर्नाटक में महिला नेताओं पर दांव से परहेज! आंकड़े बेहद चौंकाने वाले, इसी राज्य से महिला आरक्षण का बिगुल बजा था
कर्नाटक की राजनीति में परुषों का जबरदस्त रसूख है। इसका अंदाजा इसी से होता है कि कुल दाखिल नामांकन में का 10 फीसद भी महिलाओं ने नहीं भरा। प्रधानमंत्री के आह्वान के बावजूद क्यों है महिलाओं की ऐसी कम भागीदारी? जानिए

Karnataka Election 2023 के लिए नामांकन दाखिल हो चुके हैं। 3600 से अधिक नामांकन पत्रों में केवल 304 Mahila Candidate ने दाखिल किए हैं। ये आंकड़ा बेदह चौंकाने वाला है क्योंकि तीनों प्रमुख पार्टियों ने महिलाओं पर दांव लगाने में कंजूसी दिखाई है।
एक उम्मीदवार चार नामांकन
दक्षिण का दुर्ग कहे जाने वाले कर्नाटक में राजनीति के इस समीकरण को दक्षिण की सियासत का जुदा अंदाज कहें या पर्याप्त महिलाओं को मौके न मिलना। जवाब कठिन है। नियमों के आधार पर उम्मीदवार अधिकतम चार नामांकन दाखिल कर सकता है।
Women Representation नाम मात्र का
दरअसल, कर्नाटक में धनबल का भी बेजा इस्तेमाल हो रहा है। चुनाव आयोग प्रत्याशियों की तरफ से डिजिटल तरीकों से दिए जा रहे प्रलोभन की चुनौती से निपटने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहा है। इसी बीच Women Representation केवल नाम मात्र का दिखा।
3600 से अधिक एफिडेविटि
नामांकन पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया 13 अप्रैल को चुनाव अधिसूचना जारी होने के साथ शुरू हुई थी। चुनाव अधिकारियों ने कहा कि 3,600 से अधिक उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किए।

टोटल 304 नामांकन महिलाओं के
कुल नामांकन में से 3,327 पुरुष उम्मीदवारों द्वारा 4,710 और 304 महिला उम्मीदवारों द्वारा 391 नामांकन दाखिल किए, जबकि एक उम्मीदवार की एफिडेविट में अन्य लिंग का जिक्र है। सबसे अधिक बीजेपी की तरफ से नामांकन दाखिल किए गए हैं।
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224 में कुल 10 फीसद भी महिलाएं नहीं
224 सदस्यों वाले कर्नाटक विधानसभा में भाजपा की सरकार है। भले ही बीजेपी की टिकट पर 700 से अधिक लोगों ने नामांकन दाखिल किया है, लेकिन जिन महिला नेताओं को टिकट मिला है, इनकी संख्या बहुत मुश्कित से दोहरे अंकों में जाती है।
- बीजेपी उम्मीदवार के रूप में 707 नामांकन
- 651 कांग्रेस नेता MLA बनने की कतार में
- 455 जद (एस) नेताओं ने भी नामांकन दाखिल किया
आधी आबादी के बीच भाजपा ने गिनती के टिकट बांटे
भाजपा ने 189 नेताओं की पहली सूची में भाजपा की केवल 8 महिलाओं को टिकट मिले। कांग्रेस की पहली लिस्ट में केवल छह महिला कैंडिडेट हं। नेेटिजन्स इस पर कई सवाल पूछ रहे हैं।

कांग्रेस की पहली लिस्ट में 6 महिला उम्मीदवार कौन
पहली सूची में कांग्रेस ने महिलाओं ने जगह बनाई है- कनीज फातिमा, लक्ष्मी रवींद्र हेब्बलकर (बेलगाम ग्रामीण), डॉ. अंजलि निंबालकर (खानापुर), रूपकला एम (केजीएफ), कुसुमा एच (राजाराजेश्वरनगर), सौम्या आर (जयनगर)।
किन फैक्टर पर मिलते हैं टिकट
महिला उम्मीदवारों की संख्या कुल नामांकन का 10 प्रतिशत से भी कम है। इसके पीछे जातिगत समीकरणों, क्षेत्रीय संतुलन, पुराने चेहरों बनाम नए चेहरों जैसे कई मापदंडों के आधार पर मिलने वाले टिकट हैं।
AAP में सबसे अधिक महिला उम्मीदवार
पार्टियां जब उम्मीदवारों की सूची तैयार करती हैं, तो महिलाएं प्राथमिकता नहीं होतीं। पार्टी 'आधी आबादी' को 'जीतने योग्य' नहीं पाती हैं। भाजपा ने 14 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस में नौ, जद (एस) में सात और आप में 20 महिला उम्मीदवार हैं।
वोटर महिला उम्मीदवारों को पसंद नहीं करते
कर्नाटक चुनाव 2023 पर डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, जमीनी स्तर के सर्वेक्षण के आधार पर राजनीतिक दल मानते हैं कि अधिकांश मामलों में वोटर महिला उम्मीदवारों को पसंद नहीं करते।
सर्वेक्षण का नतीजा और महिलाओं के ठगे होने का एहसास
सर्वेक्षण का नतीजा स्थानीय कैडर के अलावा, निर्वाचन क्षेत्र के निवासियों के क्रॉस-सेक्शन की राय के आधार पर निकाला जाता है। सभी दलों की महिलाएं ठगा हुआ महसूस कर रही हैं।
जीतने का मतलब पैसा खर्च करना
गोपनीयता की शर्त पर कांग्रेस नेता के हवाले से डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट में कहा गया, कर्नाटक में जीतने का मतलब पैसा खर्च करने की क्षमता है। इसे एक पैरामीटर के रूप में रखते हुए, सभी पार्टियां महिलाओं को टिकट देने से इनकार करती हैं।
बेंगलुरु में चुनाव लड़ने के लिए 20 करोड़!
एक अन्य नेता के अनुसार, उम्मीदवार को बेंगलुरु में चुनाव लड़ने के लिए कम से कम 20 करोड़ रुपये की संपत्ति चाहिए। महिलाओं के पास आमतौर पर उनके नाम पर पारिवारिक संपत्ति पंजीकृत नहीं होती।
बिना पुरुषों को समर्थन के टिकट नहीं!
चुनाव में धनबल के अलावा बाहुबल का भी भरपूर इस्तेमाल होता है। इस मोर्चे पर भी महिलाएं पुरुषों की तुलना में बीस साबित नहीं होतीं। जब तक उन्हें पार्टी और स्थानीय कैडर में पुरुष नेताओं का जोरदार समर्थन नहीं मिलता है, तब तक उन्हें टिकट मिलने की संभावना कम है।
महिलाओं के लिए आरक्षण से सुधरेंगे हालात
वर्तमान राजनीतिक हालात के मद्देनजर महिलाओं के लिए आरक्षण ही इस गतिरोध से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है। कर्नाटक कांग्रेस की महिला शाखा की प्रमुख पुष्पा अमरनाथ दो बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं।
रिजर्वेशन नहीं मिलता तो राजनीति संभव नहीं
अपना उदाहरण देते हुए पुष्पा कहती हैं कि अगर स्थानीय निकायों के चुनावों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण नहीं दिया जाता तो वह राज्य स्तर की राजनीति में कभी नहीं आ पातीं।
पूर्व PM ने महिला आरक्षण का जिक्र किया
कर्नाटक में नगण्य Mahila Candidate होने के बीच ये जानना भी काफी रोचक है कि इसी राज्य से आने वाले पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने पहली बार 1996 में महिला आरक्षण विधेयक पर बात की थी।
27 साल पहले आया बिल, कानून नहीं बना
हालांकि, देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल सेकुलर (JDS) ने भी इस बार केवल 7 महिला नेताओं को टिकट दिया है। संसद में 27 साल पहले महिला आरक्षण की मांग रखी गई, लेकिन देवेगौड़ा के समर्थन वाला विधेयक पारित नहीं हुआ।
क्या 2024 से पहले महिला आरक्षण को मिलेगी हरी झंडी
देवेगौड़ा ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विधेयक को पारित कराने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था। उनकी बहू अनीता कुमारस्वामी पार्टी की अकेली मौजूदा महिला सदस्य हैं। आम चुनाव में लंबा वक्त है ऐसे में पीएम मोदी का रूख दिलचस्प हो सकता है।
फंड की समस्या का समाधान कैसे होगा
कर्नाटक की क्षेत्रीय पार्टी रूथ मनोरमा के अनुसार, महिलाओं के लिए फंडिंग की समस्या होगी। परिवार उन्हें चुनाव लड़ने के लिए आर्थिक रूप से समर्थन नहीं देना चाहेंगे। ऐसे में पार्टियों को महिला उम्मीदवारों के लिए फंड उपलब्ध कराना चाहिए।
महिलाओं का इस्तेमाल करते हैं, टिकट नहीं देते
राजनीतिक पार्टियां प्रचार, रैलियों और वर्कहॉर्स के रूप में महिलाओं का उपयोग करती हैं, लेकिन उन्हें टिकट से वंचित करती हैं। इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता तारा कृष्णास्वामी गुस्से का इजहार करती हैं।
दागी होने पर भी पुरुषों को मिल जाते हैं टिकट
इनका मानना है कि, महिलाएं चुनाव लड़ने और जीतने में सक्षम हैं। फिर भी, पार्टियां उन्हें ऐसे पुरुषों को टिकट देने के लिए दरकिनार करती हैं जो पोर्न देखते हैं, आपराधिक आरोप लगे हैं। सीनियर सीटिजन भी हो चुके हैं।
महिलाओं को टिकट के लिए कानून बने
कई पुरुष एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से भी चुनाव लड़ते हैं। हमें एक ऐसे कानून की जरूरत है जो पार्टियों को महिलाओं को एक खास संख्या में टिकट देने के लिए बाध्य करे। हालांकि, बीजेपी महासचिव एन रविकुमार पार्टी में महिलाओं को कम टिकट बंटवारे को सही मानते हैं।
किसी भी हाल में चुनाव जीतना है
रविकुमार के अनुसार, चुनाव जीतने की क्षमता एकमात्र पैमाना है। अगर हम कुल टिकटों का 33 फीसदी हिस्सा महिलाओं को दे भी दें तो उनमें से कितनी विजेता बनेंगी। इस बार हमने 14 टिकट दिए हैं। भविष्य में संख्या बढ़ेगी।












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