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कर्नाटक में कुर्सी के चक्कर में नेता फैला रहे हैं जातीय 'उन्माद'! कसूरवार कौन?

Karnataka Congress Politics: कर्नाटक में कांग्रेस के सत्ता में आए करीब 14 महीने ही हुए हैं। लेकिन, यहां पार्टी के नेताओं के बीच घोषित-अघोषित कुर्सी संघर्ष कभी भी बड़े विवाद की वजह बन सकता है। इसका खामियाजा कर्नाटक की जनता को ही भुगतना पड़ेगा।

लोकसभा चुनावों के बाद से कांग्रेस संगठन और प्रदेश सरकार के भीतर बहुत ही भयानक सत्ता संघर्ष की स्थिति पैदा होती जा रही है। राज्य में दावों के विपरीत पार्टी को चुनावों में बहुत बड़ा झटका लगा है और ऐसे में कांग्रेस नेताओं का विभिन्न गुट सियासत के गरम लोहे पर अपने-अपने हिसाब से चोट करने के लिए उतावला है।

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अहिंदा सम्मेलन या सिद्दारमैया का शक्ति प्रदर्शन?
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया इस समय मैसूर के एक कथित 4,000 करोड़ रुपए के जमीन घोटाले को लेकर विपक्ष के निशाने पर हैं। दूसरी तरफ उनकी पार्टी के अंदर की खेमेबाजी भी खुलकर सामने आ रही है। ऐसे में अहिंदा समुदायों की ओर से की गई एक घोषणा प्रदेश की सियासी गर्मी को और बढ़ा रहा है।

कौन हैं अहिंदा?
कर्नाटक में अहिंदा- अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम, पिछड़े वर्ग और दलितों का एक चुनावी समीकरण है। यह इस सदी की शुरुआत में सीएम सिद्दारमैया की एक सियासी सोच की ही उपज है, जिसकी राजनीतिक रोटी वे अबतक सेंक-सेंक कर खाते रहे हैं।

उनके इसी अहिंदा समर्थकों की ओर से अगस्त में हुबली में एक विशाल सम्मेलन की तैयारी शुरू कर दी गई है। माना जा रहा है कि इसके पीछे खुद सिद्दारमैया हैं, जो इसके बहाने पार्टी में अपने विरोधियों को अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास दिलाना चाहते हैं।

नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के बीच अहिंदा सम्मेलन
दरअसल, पिछले साल जब कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में आई थी, तभी से सियासी गलियारों में एक चर्चा आम रही है कि सिद्दारमैया ढाई-ढाई साल वाले फॉर्मूले के तहत पहले मुख्यमंत्री बने हैं और उन्हें बाद में उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार को कुर्सी सौंप देनी है।

नेतृत्व परिवर्तन न करने की सख्त चेतावनी
इस चर्चा के तहत कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन का यह समय अगले साल बजट पेश होने के बाद के लिए तय है। यही वजह है कि इस बात की संभावना जताई जा रही है कि सिद्दारमैया पर डीके को सत्ता सौंपने का भारी दबाव पड़ना शुरू हो चुका है।

अहिंदा के प्रदेश अध्यक्ष प्रभुलिंगा दोड्डामनी के मुताबिक सिद्दारमैया को सीएम की कुर्सी से हटाने का वे लोग पूरजोर विरोध करेंगे। इसी को देखते हुए अगस्त में एक प्रदेश स्तरीय अहिंदा सम्मेलन आयोजित करने की योजना है। संभावना है कि 12 अगस्त को सिद्दारमैया के जन्मदिन के आसपास इसका आयोजन हो सकता है।

'सिद्दारमैया को हटाया तो कर्नाटक से कांग्रेस का सूपड़ा साफ'
दोड्डामनी ने चेतावनी दी है कि अगर सिद्दारमैया को पूरे कार्यकाल से पहले हटाया गया तो वे आंदोलन शुरू कर देंगे। उन्होंने कहा, 'मुख्यमंत्री बदलने को लेकर कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए। सिद्दारमैया को पांच वर्षों तक सीएम रहना चाहिए, नहीं तो कर्नाटक से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाएगा।'

वोक्कालिगा संत सिद्दारमैया से हटने की कर चुके हैं मांग
अगर अहिंदा राजनीति के बीच कर्नाटक में कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद को लेकर हो रही हालिया राजनीति को देखें तो हालात बहुत ही असामान्य होते जा रहे हैं। कुछ समय पहले ही प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय के एक संत श्री चंद्रशेखर स्वामी ने सार्वजनिक तौर पर सीएम और डिप्टी सीएम की मौजूदगी में शिवकुमार के लिए सिद्दारमैया को कुर्सी खाली करने के लिए कह दिया था।

लिंगायत समुदाय के एक संत भी अपनी बिरादरी के लिए कर चुके हैं दावा
इसके बाद एक और प्रभावशाली लिंगायत समुदाय के संत ने भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी बिरादरी का स्वाभाविक दावा जता दिया था। यही नहीं, राज्य में जातीय आधार पर उपमुख्यमंत्रियों की संख्या बढ़ाने की वकालत राज्य के कैबिनेट मंत्रियों की ओर से ही सार्वजनिक तौर पर हो रही है।

कर्नाटक में जिस तरह से मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के पद के लिए जातीय आधार पर दावेदारी का माहौल बनाया जा रहा है, वह बहुत ही चिंताजनक है और अगर यह सब किसी नेता के निजी स्वार्थ की वजह से हो रहा है तो प्रदेश के लिए बहुत ही घातक है।

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