कर्नाटक में बुरी फंस गई बीजेपी, लोकसभा चुनाव से पहले बढ़ी मुश्किल?
कर्नाटक में बीजेपी किसी भी सूरत में लोकसभा चुनावों में विधानसभा चुनावों वाला हाल होने देना नहीं चाहती। इसलिए पार्टी ने विरोधी-जेडीएस से भी हाथ मिलाने से परहेज नहीं किया है।
लेकिन, पिछले दिनों पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जिस तरह के फैसले लिए हैं, उससे पार्टी की स्थिति फिलहाल डांवाडोल नजर आ रही है। पार्टी के आंतरिक मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।

विधानसभा चुनावों से पहले सरकार से हटाए गए थे येदियुरप्पा
कर्नाटक विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले भाजपा ने पूर्व सीएम येदियुरप्पा को सरकार से हटाया था और संसदीय बोर्ड जैसे संगठन के सर्वोच्च संस्था में जगह दी थी। पार्टी ने लिंगायत येदियुरप्पा की जगह, लिंगायत बसवराज बोम्मई की ताजपोशी भी कराई। लेकिन, विधानसभा चुनावों में करारी हार को वह फिर भी रोक नहीं पाई।
येदियुरप्पा फिर से कर्नाटक बीजेपी में सबसे शक्तिशाली बने
लेकिन, लोकसभा चुनावों से पहले लगता है कि येदियुरप्पा फिर से कर्नाटक भाजपा में केंद्रीय भूमिका में आ चुके हैं। उनके बेटे और पार्टी एमएलए बीवाई विजयेंद्र येदियुरप्पा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। यही नहीं, 6 महीने से खाली पड़े विधानसभा में विपक्ष के नेता पद देने का मौका आया तो भी येदियुरप्पा के भरोसेमंद आर अशोक (वोक्कालिगा) पर ही विश्वास जताया गया।
येदियुरप्पा की भूमिक बढ़ते ही कुछ वरिष्ठ नेताओं में दिखी नाराजगी
कर्नाटक के कुछ प्रमुख बीजेपी नेता इन फैसलों से निश्चित तौर पर नाखुश हो गए हैं। पिछले कुछ दिनों में बीजेपी एमएलए बसनगौड़ा पाटिल यतनाल और अरविंद बेलाड के अलावा पूर्व मंत्री सीटी रवि और अरविंद लिंबावली जैसे लोग इन नियुक्तियों की आलोचना कर चुके हैं।
येदियुरप्पा और बीएल संतोष कैंप में बंटी बीजेपी?
खुद को अनुशासित कहने वाली पार्टी में पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से मायूसी की खबरें सामने आ रही है, उससे लगता है कि कर्नाटक बीजेपी येदियुरप्पा खेमे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष कैंप में बंट गया है। क्योंकि, जो नेता पार्टी की हालिया नियुक्तियों से असंतोष जता रहे हैं, उनमें से ज्यादातर संतोष खेमे से ही हैं।
'बीजेपी को एक परिवार की पार्टी नहीं बनना चाहिए'
अशोक को नेता विपक्ष चुनने के लिए बीजेपी विधायक दल की बैठक से एमएलए रमेश जारकीहोली के साथ बाहर निकल चुके यतनाल पहले ही कह चुके हैं, 'बीजेपी को एक परिवार की पार्टी नहीं बनना चाहिए। कार्यकर्ता इसे नहीं स्वीकार करेंगे।'
यतनाल और बेलाड दोनों ही विरोधी दल के नेता पद के दावेदार माने जा रहे थे। वैसे उन्होंने पार्टी हित में अशोक की नियुक्ति का स्वागत तो किया है, लेकिन उनका तर्क था कि अगर विपक्ष का नेता उत्तर कर्नाटक से होता तो लोकसभा चुनावों में भाजपा ज्यादा सीटें जीत सकती थी।
ये दोनों नेता भी लिंगायत समुदाय से ही हैं और उत्तर कर्नाटक में उनका काफी दबदबा है। कई बार भाजपा के महासचिव रह चुके लिंबावली पिछले हफ्ते कह चुके हैं कि पार्टी के लोग पूछ रहे हैं कि विजयेंद्र के पास प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए येदियुरप्पा के बेटे होने के अलावा क्या योग्यता है। इसी तरह से जारकीहोली भी प्रदेश बीजेपी के उन वरिष्ठ नेताओं में से हैं, जिन्हें विजयेंद्र को लेकर आपत्ति रही है।
पार्टी नेताओं को जल्द ही सबकुछ ठीक हो जाने की उम्मीद
भाजपा समर्थकों में इस बात की चिंता है कि वरिष्ठ नेताओं को जिस तरह से किनारे होना पड़ा है, उससे लोकसभा चुनावों में पार्टी को नुकसान न हो जाए। लेकिन, बीजेपी नेताओं को यकीन है कि लोकसभा चुनाव आने तक सबकुछ ठीक रहेगा और सभी मिलकर पार्टी को जिताने में जुटे दिखेंगे।
राय-विचार करेक समाधान निकालेंगे-विजयेंद्र
मसलन, रविवार को विजयेंद्र येदियुरप्पा ने प्रदेश बीजेपी को लेकर चल रही अटकलबाजियों को लेकर कहा कि यतनाल ने जो कुछ भी कहा उसे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा, 'वे अपनी राय रखने के लिए स्वतंत्र हैं....हो सकता है कि उन्होंने अपनी शिकायतें रखी हों। हम वरिष्ठ और राष्ट्रीय नेताओं से राय-विचार करेक समाधान निकालेंगे।'
कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं और बीजेपी उनमें से पिछली बार 25 पर जीती थी। जेडीएस से गठबंधन का उसका एकमात्र मकसद सभी 28 सीटों पर कब्जा करना है। ऐसे में अगर पार्टी ने आंतरिक मतभेदों पर जल्द काबू नहीं पाया तो उसके लक्ष्य की लंका भी लग सकती है।












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