Karnataka Assembly Elections: दक्षिण के दुर्ग में 80 साल के येदियुरप्पा का सहारा, BJP के पास दूसरा चेहरा नहीं!

दक्षिण भारतीय सूबा कर्नाटक BJP के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन सकता है। वेटरन राजनेता बीएस येदियुरप्पा को BJP अपना चेहरा बनाएगी। अब लगता है कि पूर्व सीएम और 80 साल के राजनेता येदियुरप्पा ही BJP की नाव के खेवनहार बनेंगे।

Karnataka Assembly Elections

Karnataka Assembly Elections बीजेपी के लिए बेहद अहम होने वाले हैं। पूर्वोत्तर भारत में त्रिपुरा के बहुमत और मेघालय और नागालैंड में सरकार बनाने में शामिल रहने से उत्साहित भाजपा दक्षिण का दुर्ग कहे जाने वाले कर्नाटक में भी सियासी सफलता की रणनीति बनाने में जुटी है। रिपोर्ट्स के अनुसार भाजपा 80 साल के बीएस येदियुरप्पा के चेहरे पर चुनावी समर में उतरेगी।

कर्नाटक चुनाव से जुड़ी रिपोर्ट्स के अनुसार चुनावी राजनीति से पहले ही अपनी सेवानिवृत्ति की घोषणा कर चुके 80 वर्षीय बुजुर्ग येदियुरप्पा के कद का कोई नेता बीजेपी के खेमे में नहीं है। ऐसे में कर्नाटक में सत्ताधारी पार्टी के साथ-साथ कई केंद्रीय नेता भी उन्हें सीएम पद पर बिठाने की मांग कर रहे हैं। इसी बीच समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार भाजपा ने बीएस येदियुरप्पा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक प्रमुख चुनावी चेहरा बनाकर 'चेहरे' के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने का प्रयास किया है।

येदियुरप्पा को ही भाजपा के चुनावी अभियान में सबसे ऊपर क्यों धकेला गया? इसकी पड़ताल बेहद रोचक है। ऐसा इसलिए क्योंकि, चार बार के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने जमीनी स्तर से पार्टी का जनाधार बढ़ाया। उनके पास शानदार जन अपील और जुड़ाव भी है। विशेष रूप से राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लिंगायत समुदाय के बीच भाजपा या किसी अन्य दल के नेता का कद येदियुरप्पा जैसा नहीं है।

भाजपा के प्रचार अभियान से भी यह स्पष्ट है कि पार्टी "येदियुरप्पा फैक्टर" पर निर्भर है। उनके रसूख का लाभ उठाकर बीजेपी 80 साल के वेटरन येदियुरप्पा को "पोस्टर बॉय" के रूप में पेश कर रही है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल के दिनों में कर्नाटक दौरे किए। सभी नेताओं को जनसभाओं के दौरान येदियुरप्पा की तारीफों के पुल बांधते देखा गया।

बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सियासत पर नजर रखने वालों का मानना है कि अक्सर ऐसा होता नहीं है कि पीएम के कार्यक्रम में कोई और सुर्खियों में छाया रहे, लेकिन 27 फरवरी को शिवमोग्गा में एक जनसभा का नजारा अलग था। इसमें ऐसा लगा कि मोदी खुद कर्नाटक बीजेपी के कद्दावर नेता येदियुरप्पा को उनकी कर्मभूमि में "गौरवशाली जगह" दे रहे हों।

बता दें कि येदियुरप्पा के 80वें जन्मदिन के अवसर पर शिवमोग्गा हवाई अड्डे के उद्घाटन के अवसर पर जनसभा हुई थी। इसमें पीएम मोदी ने सार्वजनिक जीवन में येदियुरप्पा के योगदान को 'प्रेरणादायक' करार दिया। पीएम ने मंच पर उनका अनोखे अंदाज में अभिनंदन भी कराया क्योंकि उन्होंने जनसभा में शामिल लोगों से येदियुरप्पा के सम्मान में अपने मोबाइल फोन की फ्लैश लाइट ऑन करने की अपील की। प्रधानमंत्री के आह्वान पर सभा से उत्साहजनक प्रतिक्रिया भी मिली।

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    इस रैली को फॉलो करने वाले लोगों ने कहा, लिंगायत बाहुबली जैसा ओहदा रखने वाले येदियुरप्पा ने जैसे ही अपना भाषण समाप्त किया, पीएम मोदी ने खड़े होकर उनकी सराहना की। हाल ही में कर्नाटक विधानसभा में येदियुरप्पा के अंतिम भाषण को प्रोमोट किया जा रहा है। पीएम खुद इस भाषण का बार-बार जिक्र कर येदियुरप्पा को सार्वजनिक जीवन में हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा बता चुके हैं।

    अमित शाह ने भी हाल ही में एक जनसभा में लोगों से पीएम मोदी और येदियुरप्पा में विश्वास जताने और राज्य में भाजपा को सत्ता में वापस लाने की अपील करते दिखे थे। नड्डा और राजनाथ सिंह भी हाल ही में चुनाव प्रचार के दौरान इसी तरह की टिप्पणी करते सुने गए। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों और भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, येदियुरप्पा को प्रोजेक्ट करने के लिए पार्टी के कदम का उद्देश्य एंटी-इनकंबेंसी को कम करना, लिंगायत वोट-बेस को बरकरार रखना और विपक्षी कांग्रेस का मुकाबला करना है। कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। कर्नाटक ट्रांसपोर्ट के कई लोग प्रधानमंत्री तक भी कंप्लेन कर चुके हैं।

    अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के राजनीतिक विश्लेषक ए नारायण ने कहा कि भाजपा शुरुआत में येदियुरप्पा को सक्रिय भूमिका में रखे बिना चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थी। हालांकि, पार्टी के लिए स्थानीय स्तर पर भरोसा करने लायक लीडरशिप नहीं थी, ऐसे में बीजेपी के पास 80 साल के येदियुरप्पा को फिर से तैयार करना और उन्हें पार्टी के चेहरे के रूप में पेश करना जरूरी हो गया। यही कारण है कि बीजेपी यह साबित करने की हर संभव कोशिश कर रही है कि पार्टी की तरफ से 2021 में येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने को नहीं कहा गया। पार्टी ने उन्हें नाराज नहीं किया।

    नारायण ने कहा कि "उन्होंने (बीजेपी) ने येदियुरप्पा के बिना लिंगायत वोटर के समर्थन को सुरक्षित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे इसके बारे में बहुत आश्वस्त नहीं हैं। यही कारण है कि वे ऐसा कर रहे हैं। बीजेपी को कुछ लिंगायत वोट गंवाने का डर था, लेकिन उसे कुछ अन्य समुदायों के समर्थन की आशा थी। हालांकि, इनके बारे में भी भाजपा बहुत आश्वस्त नहीं जिस कारण येदियुरप्पा के साथ वे जनता का समर्थन हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं।

    बता दें कि येदियुरप्पा ने 26 जुलाई, 2021 को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। इसे भाजपा में 75 साल के ऊपर वाले नेताओं को सक्रिय राजनीति से अलग रखने का अलिखित नियम माना गया। साथ ही, इसे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति भी माना गया, जिसके तहत विधानसभा चुनाव से पहले नया नेतृत्व विकसित करने का प्रयास किया जाना था। 2018 के चुनाव प्रचार में येदियुरप्पा सीएम उम्मीदवार और बीजेपी का चेहरा थे। इस बार भाजपा ने सामूहिक दृष्टिकोण का विकल्प चुना है, हालांकि शुरुआत में उन्होंने मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व को प्रोजेक्ट करने की कोशिश की थी।

    कर्नाटक की राजनीति पर नारायण ने कहा, "बीजेपी ने बोम्मई के माध्यम से लिंगायतों को जीतने की कोशिश की, लेकिन वे वोट बैंक बरकरार रखने के बारे में आश्वस्त नहीं दिखे, क्योंकि आरक्षण जैसे मुद्दों पर असंतोष बढ़ रहा है।" उन्होंने कहा कि जब तक येदियुरप्पा हैं किसी अन्य लिंगायत नेता के लिए लिंगायत वोटर्स का समर्थन हासिल करना संभव नहीं है। खासतौर पर तब जब येदियुरप्पा को एक नाखुश व्यक्ति माना जा रहा है। ऐसे में स्पष्ट रूप से बीजेपी येदियुरप्पा को खुश रखना चाहती है।

    भाजपा अब येदियुरप्पा को चुनावी अभियान में सबसे आगे रखने का प्रयास कर रही है। ऐसे में बोम्मई की हिस्सेदारी और दावेदारी कमजोर होती दिख रही है। चुनाव पर्यवेक्षकों और भाजपा के कुछ लोगों के अनुसार, पार्टी के भीतर एक वर्ग उन्हें जन-समर्थक योजनाओं का श्रेय देता है। अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण में वृद्धि और सर्व समावेशी बजट पेश करने को लेकर बोम्मई की अलग छवि बनी है। पार्टी के एक अन्य पदाधिकारी के अनुसार, बीएस येदियुरप्पा को सीएम का चेहरे नहीं घोषित करने के बावजूद लिंगायत वोट बैंक को बिखरने से बचाना काफी अहम और शायद बीजेपी का असली मकसद है। भाजपा के लिए पूर्ण बहुमत से चुनाव जीतने के लिए ये बेहद जरूरी भी है। यही कारण है कि पार्टी प्रमुख लिंगायत समुदाय को आश्वस्त करना चाहती है, कि वह अभी भी इसके लिए प्रासंगिक है।

    उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर लिंगायत समुदाय के एक वर्ग, विशेष रूप से 'पंचमसाली लिंगायतों' के बीच असंतोष की ओर इशारा किया और कहा कि यह एक खतरा पैदा कर सकता है, और इसे तुरंत कम करने की जरूरत भी है। बीजेपी पदाधिकारी के अनुसार, "यह प्रभावी ढंग से बताया जाना चाहिए कि भाजपा के शीर्ष संसदीय बोर्ड के सदस्य होने के साथ-साथ अभी भी कर्नाटक में बीजेपी का चेहरा येदियुरप्पा ही हैं।" भाजपा के राज्य महासचिव एन रवि कुमार ने कहा कि येदियुरप्पा कर्नाटक में एक बड़े जननेता हैं और वह ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने राज्य में पार्टी का निर्माण और पोषण किया।

    रवि कुमार के अनुसार, "वह चार बार सीएम और दो बार विपक्ष के नेता हैं, वह राज्य के कोने-कोने को जानते हैं, वह लिंगायतों सहित सभी समुदायों के नेता हैं, और सभी वर्गों के लोग उनका सम्मान करते हैं। उन्हें स्वाभाविक रूप से एक चेहरे के रूप में पेश किया जाता है।" उन्होंने पूछा कि इसमें गलत क्या है? उन्होंने कहा, "कुछ मात्रा में एंटी-इनकंबेंसी हो सकती है, मैं इसे पूरी तरह से खारिज नहीं कर रहा हूं, सभी सरकारों के साथ ऐसा होता है। हालांकि, बोम्मई ने अच्छा बजट और अच्छे कार्यक्रम दिए हैं... यह कांग्रेस की देन है। अब तक येदियुरप्पा के बारे में सकारात्मक बात नहीं करते थे, लेकिन अब कर रहे हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि कांग्रेस की रणनीति येदियुरप्पा के समर्थक और उनके प्रति सकारात्मक जनमत को अपने पक्ष में आकर्षित करना है।

    बता दें कि येदियुरप्पा ने भी अपनी ओर से हाल ही में प्रमुख वीरशैव-लिंगायत समुदाय से आगामी विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा को अपना समर्थन जारी रखने और राज्य में अपनी जीत सुनिश्चित करने की अपील की थी। विपक्षी कांग्रेस और जनता दल (सेकुलर) (JDS) की तरफ से यह बयान देने के प्रयास हुए कि बीजेपी येदियुरप्पा को दरकिनार कर रही है, क्योंकि इसका मकसद संख्यात्मक और राजनीतिक रूप से प्रभावी समुदाय को लुभाने की कोशिश की है।

    एक अनुमान के अनुसार, कर्नाटक में वीरशैव-लिंगायत राज्य की आबादी का लगभग 17 प्रतिशत हैं। इनका भाजपा के मजबूत वोट बैंक में बड़ा असर है। येदियुरप्पा को "सबसे बड़ा" वीरशैव-लिंगायत नेता माना जाता है और समुदाय पर उनकी पकड़ बनी हुई है। ऐसा लगता है कि बदले में पूर्व मुख्यमंत्री अपने बेटों के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह घोषणा करते हुए कि वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, येदियुरप्पा ने उसी सांस में कहा था कि वह अपनी शिकारीपुरा विधानसभा सीट खाली कर देंगे। अगर आलाकमान सहमत होता है तो यहां से उनके छोटे बेटे और पार्टी के राज्य उपाध्यक्ष बी वाई विजयेंद्र चुनाव लड़ेंगे। रिपोर्ट्स के अनुसार येदियुरप्पा, 2021 में सीएम के रूप में पद छोड़ने के तुरंत बाद, एमएलसी मार्ग से विजयेंद्र को मंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन अपने प्रयासों में सफल नहीं हुए। उनके बड़े बेटे, बी वाई राघवेंद्र शिवमोग्गा से सांसद हैं।

    ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि कर्नाटक के दुर्ग में गहरी पैठ रखने वाले भले ही येदियुरप्पा 80 साल के हो चुके हैं। रिटायरमेंट का ऐलान भी कर चुके हैं, लेकिन इस वेटरन का तोड़ या रिप्लेसमेंट बीजेपी के पास फिलहाल नहीं है और आने वाले चंद महीने बेहद दिलचस्प होने वाले हैं, क्योंकि लड़ाई सीधे तौर पर येदियुरप्पा और कांग्रेस की मानी जा रही है। लिंगायत मठ जैसे कई फैक्टर वोट के लिहाज से अहम हैं, ऐसे में येदियुरप्पा फैक्टर से बीजेपी को कितनी मदद मिलेगी, इसका पता चुनावी नतीजों के ऐलान पर ही चलेगा।

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