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कर्नाटक विधानसभा चुनाव और मुस्लिम नेताओं की मांग

कर्नाटक चुनाव
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कर्नाटक सहित इस साल कुछ बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, जिनमें राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे अहम राज्य भी शामिल हैं.

चुनावी सरगर्मी के बीच मुस्लिम नेताओं की अपनी पार्टियों से मांग सामने आई है कि उन्हें चुनावों में अधिक सीटें दी जाएँ.

उनका दावा है कि राजनीति और समाज में उनका प्रतिनिधित्व घटता जा रहा है और मुस्लिम समुदाय हाशिए पर धकेला जा रहा है.

दिसंबर में 182 सीटों वाले गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आए. इस चुनाव में सिर्फ़ एक मुस्लिम उम्मीदवार की जीत हुई और वे थे कांग्रेस के इमरान खेड़ावाला.

पिछले विधानसभा चुनाव में गुजरात से तीन मुस्लिम विधायक चुने गए थे.

लेकिन इस बार लगभग 10 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले राज्य गुजरात में केवल एक मुसलमान विधायक चुना गया है.

लेकिन विधानसभाओं में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व की कमी गुजरात या सिर्फ़ भाजपा शासित राज्यों तक ही सीमित नहीं है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अब कुछ ग़ैर बीजेपी सरकारें और पार्टियाँ भी मुस्लिम उम्मीदवारों को हार के डर से टिकट देने या मंत्री बनाने से परहेज़ करने लगी हैं.

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कर्नाटक के मुस्लिम नेताओं की मांग

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कर्नाटक में अप्रैल या मई में विधानसभा की 224 सीटों के लिए मतदान होना है.

पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी 224 में से 104 सीटों पर जीत के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.

कांग्रेस को 80 सीटों पर और जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) को 37 सीटों पर जीत हासिल हुई थी.

कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर की मिली जुली सरकार बनी. लेकिन 15 विधायकों ने अपनी पार्टियों से विद्रोह करके बीजेपी में शामिल होने का फ़ैसला किया.

फिर बीजेपी ने सरकार बना ली. मुस्लिम समुदाय के केवल सात विधायक चुनाव जीत कर आए थे और वो भी सभी कांग्रेस पार्टी से.

इस बार कांग्रेस और जेडीएस के मुस्लिम नेताओं ने अपनी पार्टियों से मुस्लिम उम्मीदवारों को अधिक टिकट देने की मांग की है.

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राज्य में लगभग 20 से 23 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम वोट काफ़ी महत्वपूर्ण हैं.

कर्नाटक में मुसलमानों की आबादी 13 फ़ीसदी है.

कांग्रेस के मुस्लिम नेता विधानसभा की कुल 224 सीटों में से 21 से 23 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा करने की मांग कर रहे हैं.

उनके अनुसार पिछली बार की तरह इस बार भी अगर मुसलमानों को कांग्रेस ने 15-17 सीटें ही दीं, तो इससे समुदाय का का बड़ा नुक़सान होगा.

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कर्नाटक में कांग्रेस विधायक रिज़वान अरशद पार्टी के मौजूदा सात मुस्लिम विधायकों में से एक हैं.

वो कहते हैं, "आज हिंदुस्तान में जो माहौल बनाया गया है, समाज में जिस तरीक़े से माइनॉरिटी-मेजॉरिटी का खेल खेला जा रहा है और इसमें माइनॉरिटी को अलग करके मेजॉरिटी को जोड़ने की एक सियासत चल रही है, ये फ़ासिज़्म का जो मॉडल पहले चला है सब जगह, वो हिंदुस्तान में चल रहा है. जब आप माइनॉरिटी को अलग कर देंगे और मेजॉरिटी को आप अलग कर देंगे और आप चुनाव करवा देंगे, तो ज़ाहिर सी बात है कि माइनॉरिटी कैंडिडेट थोड़ा डिसएडवांटेज में रहेगा. जैसे-जैसे कॉम्युनल पॉलिटिक्स बढ़ती है, तो माइनॉरिटीज़ के लिए बहुत बड़े चैलेंजेज़ हो जाते हैं."

राज्य के धारवाड़ चुनावी क्षेत्र में कांग्रेस नेता इस्माइल टमटगर दो बार जेडीएस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन दोनों बार वो चुनाव हार गए. अब वो कांग्रेस पार्टी में हैं और धाड़वार से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं.

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वो कहते हैं, "मुस्लिमों को पिछली बार 17 सीटें दी गई थीं, जिनमें से सात उम्मीदवार जीते थे. जीत का प्रतिशत 41 फ़ीसदी है. कांग्रेस के टिकट पर कर्नाटक के अन्य प्रमुख समुदायों का जीत प्रतिशत 33 फ़ीसदी है. प्रतिशत दूसरों की तुलना में बेहतर है, तो ये उचित है कि हम पिछली बार की तुलना में 4-5 सीटों की अधिक मांग करें."

हिजाब के कारण पिछले साल कर्नाटक में बड़ा विवाद हुआ था.

मुस्लिम नेताओं का दावा है कि इस कारण उनका समुदाय सामाजिक और राजनीतिक तौर पर हाशिए पर आ गया है.

हिजाब का विरोध करने वाले हिन्दुओं का कहना है कि मुस्लिम लड़कियों को सरकारी स्कूलों में हिजाब पहन कर नहीं आना चाहिए, बल्कि दूसरे बच्चों की तरह उनको भी स्कूल यूनिफ़ॉर्म पहनना चाहिए.

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दावणगेरे शहर में जबीना ख़ानम एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.

वे बीड़ी मज़दूरों के अधिकारों के लिए लड़ती हैं. ये सभी मज़दूर ग़रीब मुस्लिम समुदाय से हैं.

उनका मानना है कि पिछले साल मुस्लिम समुदाय को अलग-थलग करने के लिए विवाद पैदा किए गए थे.

वो कहती हैं, "जब हिजाब विवाद समाप्त हुआ, तो हलाल मीट का बहिष्कार शुरू हो गया और जब वो विवाद ख़त्म हुआ तो अज़ान विवाद शुरू हो गया. परिणामस्वरूप मुस्लिम समुदाय भय में रहता है."

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राष्ट्रीय हिंदू सेना के संस्थापक प्रमोद मुतालिक ने पिछले साल राज्य में हिजाब विवाद के बाद मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार का आह्वान किया था.

वो दावा करते हैं कि मुसलमानों के राजनीतिक हाशिए पर जाने की ज़िम्मेदार कांग्रेस की तुष्टिकरण की पॉलिसी है.

वे कहते हैं, "चाहे विधायक का चुनाव हो या सांसद का, उनकी (मुसलमानों की) घटती संख्या देखी जा सकती है. कांग्रेस पार्टी शुरुआत से मुसलमानों का बहुत अधिक तुष्टीकरण किया, जिसके कारण हिंदू समाज एकत्रित होने लगा."

जबीन ख़ानम इसे सही नहीं मानतीं.

वो कहती हैं, "इंडिया में मुस्लिम आबादी 15 प्रतिशत है. उस हिसाब से न तो विधानसभा में हम आवाज़ हैं , न तो संसद में हमारी आवाज़ है. एक तरह से सियासत से दूर किया जा रहा है. वो चाहते हैं कि हम अपने मसले पर आवाज़ न उठाएँ, वो चाहते हैं कि दूसरे दर्जे के शहरी की तरह रहें. हमारे अधिकारों से हमें महरूम करना और हमारी समाजित हालत को बिगाड़ना."

कर्नाटक में मौजूदा विधानसभा में सभी सात निर्वाचित मुस्लिम विधायक कांग्रेस पार्टी से हैं.

ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों का विधानसभा में बेहतर प्रतिनिधित्व रहा है.

रहमान ख़ान कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं, जो पूर्व केंद्रीय मंत्री भी हैं.

वो कहते हैं, "1978 में हमारा प्रतिनिधित्व सबसे अधिक था, जब हमने 17 सीटें जीतीं. तब से यह कम हो रहा है. ये 12, 11, 9 पर गिरीं. अब हम सात पर आ गए हैं."

ध्रुवीकरण, परिसीमन और मनी पावर

मुस्लिम समुदाय के नेता ध्रुवीकरण, परिसीमन और मनी पावर को समुदाय के बढ़ते राजनीतिक हाशिए पर जाने का मुख्य कारण बताते हैं.

जैसा कि कांग्रेस विधायक रिज़वान अरशद दावा करते हैं.

वो कहते हैं, "जिस तरह की राजनीति इस देश में हो रही है, आप एक आम आदमी से, ख़ासकर अल्पसंख्यक समुदायों से, राजनीति में खुलकर भाग लेने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? आपने राजनीति को सांप्रदायिक बना दिया है, दूसरे आपने इसे कैश-रिच बना दिया है. एक आम आदमी के लिए चुनाव लड़ना बहुत महंगा हो गया है."

बीजेपी की बात करें, तो अमित शाह ने कई बार ये बात कही है कि उनकी पार्टी धर्म या जाति देख कर टिकट नहीं देती, बल्कि उम्मीदवार की जीतने की क्षमता देखकर टिकट देती है.

बीबीसी ने इस बारे में बीजेपी का पक्ष जानने की कई बार कोशिश की, लेकिन पार्टी नेताओं से संपर्क नहीं हो पाया.

कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्यूलर मुस्लिम उम्मीदवारों को अच्छी संख्या में सीटें देने की योजना बना रही है.

पार्टी प्रवक्ता केए थिप्पेस्वामी कहते हैं, "हम निश्चित रूप से अल्पसंख्यक समुदाय, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय से उम्मीदवारों का चयन करेंगे, जो निर्वाचन क्षेत्रों में लंबे समय से मौजूद हैं और हम अन्य समुदायों को भी प्रतिनिधित्व देंगे, बजाय यह कहने के कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं और हम केवल मुसलमानों के रक्षक हैं."

उनका कहना था कि उनकी पार्टी 12-13 मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारने की कोशिश कर रही है.

लेकिन प्रमोद मुतालिक कहते हैं कि मुसलमानों को काबू में रखना ज़रूरी है.

वे कहते हैं, "हिंदू समाज ने तय किया है कि तुष्टीकरण जो करते आ रहे हैं, उसे कम करना चाहिए. जो मुसलमान चुनाव में खड़ा होता है, उसे रोकना चाहिए. वो लोग आज हिजाब कहते हैं, कल बुर्का कहते हैं, परसों नमाज़ करने को कहते हैं, मस्जिद के लिए कहते हैं. ऐसे ही बढ़ती है मांगें. यही उनका इस्लाम सिखाता है. तो इसके लिए इनको रोकना चाहिए, नहीं तो ये एक ना एक दिन इस्लामीकरण कर जाएँगे."

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इस साल चुनाव राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी है.

इन राज्यों में 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में विजयी मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी थी.

राजस्थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 15 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें सात मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीते थे. बीएसपी के टिकट पर एक मुस्लिम विधायक की जीत हुई थी.

बीजेपी ने भी एक मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया था, लेकिन वो हार गए थे.

2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का कोई भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीता था.

मध्य प्रदेश विधानसभा में लगभग एक दशक बाद एक से अधिक मुस्लिम विधायक देखने को मिले. ये दोनों ही विधायक कांग्रेस पार्टी की ओर से जीते थे.

2008 और 2013 में मुस्लिम विधायक की संख्या केवल एक थी.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने दो मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था और बीजेपी ने एक मुस्लिम को उम्मीदवार बनाया था. यहाँ से केवल एक उम्मीदवार ही चुनाव जीत सका.

राज्य में मुस्लिम आबादी केवल दो प्रतिशत है.

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तेलंगाना में 119 विधानसभा सीटों में पार्टियों ने 26 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था.

ओवैसी की एआईएमआईएम के आठ और टीआरएस के एक मुस्लिम उम्मीदवार ने जीत हासिल की.

बीजेपी ने एक मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया था, लेकिन वो उम्मीदवार चुनाव हार गया था.

कांग्रेस ने 9 और टीडीपी ने एक-एक मुस्लिम उम्मीदवार को उतारा था. टीआरएस ने 8 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.

राजस्थान की राजधानी जयपुर में कांग्रेस पार्टी के एक बुज़ुर्ग मुस्लिम नेता ने कहा कि इस बार मुस्लिम मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से नाराज़ हैं और कांग्रेस का बीजेपी के साथ चुनावी मुक़ाबला कांटे का होगा.

वे कहते हैं, "इसलिए हमारी अधिक सीटों की मांग के बावजूद शायद हमें पिछली बार की तरह 15 या इससे भी कम सीटें मिलें."

उनका कहना था कि दक्षिण भारत के राज्यों में मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक हालत राजस्थान के मुसलमानों से कहीं बेहतर है.

उन्होंने कहा, "वो हमसे शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में आगे हैं और दक्षिण के राज्यों में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांस्कृतिक दूरियाँ कम हैं. हमारे राज्य के मुसलमान ग़रीब और कम पढ़े लिखे हैं, इसलिए देश की मुख्यधारा से कटे हुए हैं. उनको सहारे की ज़रूरत है."

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