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Kargil Vijay Diwas 2024:कारगिल युद्ध की वीरगाथा, -30 डिग्री में भी नहीं मानी हार, Tiger Hill पर फहराया तिरंगा

Kargil Vijay Diwas: भारत और पाकिस्तान के बीच 1947 के बाद तीन युद्ध हुए हैं। पहला युद्ध 1965, दूसरा 1971 और तीसरा 1999 में हुआ था। इन तीनों में से सबसे लंबा 1999 का युद्ध चला था, जिसमे पाकिस्तान ने धोखे से भारत पर हमला किया था। लेकिन बावजूद इसके भारतीय सेना ने पाकिस्तान को युद्ध में उसकी जगह दिखाते हुए विजय प्राप्त की थी।

जिस बहादुरी से भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान की घुसपैठ का जवाब दिया उसे कभी नहीं भूला जा सकता है। आज से 25 साल पहले 26 जुलाई 1999 को भारतीय सैनिकों ने इस युद्ध में विजय प्राप्त की थी। आज के दिन को कारगिल विजय दिवस के रूप में हर वर्ष मनाया जाता है।

kargil vijay diwas

Tiger Hill Kargil पर तिरंगा

आज के ही दिन 26 जुलाई 1999 को भारतीय सैनिकों ने टाइगर हिल और प्वाइंट 4875 और 5140 सहित पाकिस्तानी सेना द्वारा कब्जा की गई सभी पर्वत चोटियों पर सफलतापूर्वक अपना नियंत्रण हासिल किया था।

आज की तारीख पाकिस्तान को उसकी जगह एक बार फिर से दिखाने और भारत की जीत का प्रतीक है। आज की तारीख हमारे सैनिकों के पराक्रम और बहादुरी को दर्शाती है। हर साल इस दिन हम उनके बलिदान को याद करते हैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

कारगिल से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ने के अभियान को ऑपरेशन विजय का नाम दिया गया था। इस मिशन के दौरान भारतीय सेना ने टोलोलिंग टॉप को दुश्मन के कब्ज़े से आजाद कराने के लिए अपने सैनिकों को अभिमन्यु, भीम और अर्जुन नाम के तीन समूहों में विभाजित किया था।

युद्ध के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा

कैप्टन विक्रम बत्रा को कौन भूल सकता है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बगैर तिरंगे के सम्मान को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने सैनिकों का नेतृत्व किया और 7 जुलाई 1999 को शहीद हो गए।

अपनी शहादत से पहले भी उन्होंने पांच दुश्मन सैनिकों को ढेर कर दिया था। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

तीन महीने तक चला युद्ध

इस युद्ध में इजरायल ने भारत को गोला-बारूद, ड्रोन और अन्य सैन्य उपकरण प्रदान किए थे, जिसने युद्ध में भारत की काफी मदद की थी। कारगिल युद्ध मई 1999 में शुरू हुआ था और तकरीबन तीन महीने तक चला था।

इस युद्ध की शुरुआत की बात करें तो पाकिस्तानी घुसपैठियों ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार करके लद्दाख के कारगिल जिले में अहम रणनीतिक ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया। लेकिन भारतीय जवानों ने अपनी कुर्बानी देकर धीरे-धीरे इन ठिकानों पर फिर से अपना कब्जा वापस प्राप्त कर लिया था।

527 जवान शहीद

इस युद्ध में कई बहादुर सैनिकों ने अपनी जान दी थी। आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि 527 भारतीय सैनिकों ने इस युद्ध में अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया था। जबकि 1363 जवान घायल हुए थे और एक सैनिक को युद्ध बंदी के रूप में पकड़ लिया गया था।

मुश्किल हालात

कारगिल में हालात काफी मुश्किल थे, यहां की परिस्थितियां काफी जोखिमभरी थीं, जिसकी वजह से भारतीय सैनिकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

यहां पहाड़ी की ऊंचाई, जबरदस्त ठंड और ऊबड़-खाबड़ इलाके की वजह से सैनिकों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था, यहां तक कि सैनिकों के हथियार भी उनका साथ नहीं दे रहे थे। लेकिन इन तमाम विषम परिस्थितियों के बाद भी भारतीय जवानों ने अपना हौसला नहीं खोया।

-30 डिग्री था पारा

यहां सर्दियों में तापमान -30 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता था। तेज सर्द हवाएं, ऑक्सीजन की कमी के चलते सैनिकों का शरीर सुन्न पड़ जाता था। हथियार और एयरक्राफ्ट भी ठीक से काम नहीं कर पाते थे। लेकिन इन सब के बावजूद भारतीय जवानों ने कारगिल की चोटियों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार भगाने में सफलता हासिल की और कारगिल पर फिर से तिरंगा लहराया था।

युद्ध के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री थे। भारत की जीत के बाद उन्होंने ऑपरेशन विजय को सफल घोषित किया और पाकिस्तान के साथ भविष्य की बातचीत के लिए शर्तें रखीं। उस समय नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे।

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