मिलिये ताशी नामबियाल से, जिनके याक ने बचाया कारगिल को

द्रास से करीब 150 किमी दूर बसे एक गांव घरकोन में रहने वाले ताशी से मुलाकात के लिए मैं निकली और उनसे जानने की कोशिश कि आखिर पूरी कहानी थी क्या और कैसे उन्हें इस बात का अंदाजा हुआ कि बर्फ की आड़ में कुछ गलत चल रहा था। ताशी ने करीब 30 मिनट की मुलाकात में हमें 2 मई 1999 और उसके बाद की पूरी कहानी के बारे में बताया।
2 मई 1999 को ताशी ने देखे पाकिस्तानी
वनइंडिया से मुलाकात में ताशी ने अपने उस अनुभव को बयां किया, जो उन्हें 15 साल पहले हुआ था। उन्होंने कहा, "मेरा याक यहां पास ही एक घरकुंड नाला है, उसके पास गुम हो गया था। मैं अपने याक को तलाशने के लिए निकला। मेरे हाथ में दूरबीन थी और याक को तलाशने के लिए पहाड़ पर चढ़ गया। उस समय पहाड़ पर काफी बर्फ थी। दूरबीन से जब मैं अपने याक को तलाशने की कोशिश कर रहा था तो मुझे बर्फ के बीच से रास्ता दिखाई दिया।"
ताशी ने कहा, "मुझे लगा कि शायद मेरा याक वहां गया हो गया। पहाड़ के ऊपर हमारे तिब्बतियों का एक मंदिर है, मैंने वहां पर छह लोगों को देखा। वह पत्थर तोड़ रहे थे और बर्फ भर रहे थे। मुझे लगा कि शायद आर्मी के जवान पेट्रोलिंग पर होंगे। मैं 10-15 मिनट वहीं पर बैठा रहा। मुझे उनकी हरकतें काफी अजीब लगी और मैं वहां से नीचे चला आया।"
सेना को दी जानकारी
ताशी ने आगे बताया, "इसके बाद मैं यहां से थोड़ी ही दूर पर बने सुरह नाले पर गया जहां पर उस समय सेना बैठती थी। उस समय पंजाब यूनिट यहां पर थी। मैंने पंजाब यूनिट में हवलदार नंदू सिंह को बताया कि साहब मैंने ऊपर तिब्बतियों के मंदिर में कुछ लोगों को देखा है। उन्होंने मुझसे सवाल किया कि मैं वहां पर क्या करने गया था तो मैंने बता दिया कि मैं अपना याक ढूढ़ने के लिए वहां गया था।"
इसके बाद उन्होंने बताया कि हमारी टीम पेट्रोलिंग पर गई थी लेकिन उन्होंने तो कुछ भी नहीं देखा। उस समय वहां पर आर्मी इंटेलीजेंस के भी दो लोग थे। इसके बाद बटालिक में फोन किया गया लेकिन फोन किसी ने उठाया नहीं। इसके बाद हवलदार ने बटालिक जाकर सीओ को पूरी जानकारी दी। इसके बाद मुझे बताया गया कि मुझे कहीं घर पर ही रहना है क्योंकि सुबह पांच बजे मुझे बटालिक जाने के लिए कहा गया था।'
आठ दिन बाद शुरू हुई कारगिल की जंग
एक लेफ्टिनेंट और जेसीओ समेत सेना के 25 जवान ताशी के साथ घरकोन नाले पर गए और वहां पर उन्होंने जो देखा वह वाकई सच साबित हुआ। इसके बाद फिर से एक जेसीओ और 25 जवानों के साथ ताशी अल्डोर गए और यहां से थरू गए। थरू में ताशी ने फिर से सफेद कपड़े में लोगों को देखा। इसके बाद वह लोग पहाड़ी पर चढ़े और वहां पर जो कुछ देखा वह होश उड़ाने के लिए काफी था।
सैकड़ों पाकिस्तानी घुसपैठिए पहाड़ी की आड़ में छिपे थे और उन्होंने अपनी एक पूरी पोस्ट यहां पर तैयार कर ली थी। उस समय कारगिल में सिर्फ एक ही ब्रिगेड थी और कम्यूनिकेशन भी कम था। किसी तरह से उस समय सेना ने वायरलेस सेट की व्यवस्था कर एक दूसरे को इस बारे में जानकारी दी। ताशी की ओर से दी गई जानकारी के आठ दिन के बाद लड़ाई शुरू हुई।
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