नेता नहीं अभिनेता है जेएनयू का कन्हैया कुमार

जेएनयू की धुंध में रोहित वेमुला कहीं खो गया है। इसी धुंध के बीच से जब कन्हैया कुमार निकला, तो बहुतों को शहंशाह मूवी का अमिताभ बच्चन याद आ गया। कन्हैया के नये तेवर देख साफ लग रहा है कि मन ही मन वो एक ही डायलॉग बोल रहा है, "रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं, नाम है कन्हैया...."

JNU's Kanhaiya Kumar is actor not leader

जी हां जो कन्हैया इस वक्त टीवी चैनलों, न्यूज वेबसाइट और इंटरनेट पर छाया हुआ है, असल में वो नेता नहीं अभिनेता है। मुद्दों का, विचारधारा का, लोगों का कोई सबसे बड़ा हिमायती, गरीबों का मसीहा टाइप बनकर जिस तरह से कन्हैया ने जेनएनयू कैम्पस में माइक थामा वह किसी हिंदी फिल्म के हीरो की एंट्री से कम नहीं था। और तो और कन्हैया के भाषण का अंदाज और बॉडी लैंगवेज से भी साफ नजर आ रहा था कि अब वो इस मुद्दे को नहीं खुद को हिट करना चाहता है।

रिहाई के बाद सभा हुई। जहां उस 28 वर्षीय कथित ''मसीहा'' ने बोलबचन किया। तो जमकर वाह-वाही हुई। खूब तालियां पीटी गईं। सोशल मीडिया पर पोस्ट, कमेंट के साथ शेयर के विकल्प में कन्हैया ही कन्हैया। आखिर कल तक जेएनयू में राजनीति करने वाला, देशद्रोही नारों के साथ खड़ा रहने वाला भारत की राजनीति के भविष्य के तौर पर जो देखा जाने लगा।

कन्हैया के भाषण पर राजनीति के जानकारों का मत

जेएनयू के लिए और न ही देश के लिए यह भाषण कोई नया नहीं है। पर नया तो ये है कि लोग किस तरह से महज तख्तीबाजों को नेशनल हीरो बना देते हैं। सोशल मीडिया पर कन्हैया कुमार के भाषण के बाद लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया 'हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की', तो कुछ लोग यहाँ तक कह रहे थे कि आज की तारीख में यह लड़का में चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी को कहीं भी हरा देगा।

ये आंकलन किसलिए? क्या महज इस आधार पर कि कन्हैया कुमार ने जोर-जोर से आजादी की खातिर गुहार लगाई। भ्रष्टाचार से आजादी मांगी, भुखमरी से आजादी के लिए चीखा चिल्लाया। वैसे क्या आपको ये नया लगा। याद कीजिए अन्ना का वो आंदोलन जिसमें भ्रष्टाचार से आजादी समेत कई मुद्दे शामिल थे। आंदोलन हुआ और केजरीवाल उसे भुनाते हुए दिल्ली की सत्ता में काबिज हो गए। अब कौन कितना खुश और नाखुश है वो खुद ब खुद ही तय करे।

कन्हैया को क्यों मिला लाइव कवरेज

कन्हैया से पहले भी जेएनयू में वक्ता हुए हैं। जिसमें से आनंद कुमार, बत्तीलाल बैरवा, सीताराम येचुरी, शकील अहमद खान और प्रणय कृष्ण जैसे छात्र नेताओं के पास न केवल जनता की भाषा थी बल्कि मुद्दों को पेश करने की और लोगों से जुड़ जाने की बेहतरीन क्षमता थी। लेकिन अब तक किसी को एक भी चैनल ने कभी लाइव नहीं दिखाया। और जेनएनू के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ।

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