झारखंड: आदिवासी महिलाओं की ज़िदगी महकाने वाली अगरबत्ती

आदिवासी
Ravi Prakash/BBC
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झारखंड के दुमका जिले में एक गांव है बेदिया. 2011 की जनगणना के मुताबिक इस गांव में सिर्फ 75 घर हैं और यहां रहने वालों में 99 फ़ीसदी लोग आदिवासी.

इस गांव के तमाम खपरैलों के बीच एक खपरैल चांदमुनी हांसदा का भी है. वो संथाली जनजाति से ताल्लुक रखती हैं.

चांदमुनि पिछले महीने तक 'हड़िया' (एक तरह की शराब) बेचकर रोजी कमाती थीं लेकिन अब वो ये काम नहीं करतीं.

अब वो मंदिर के फूलों और बेलपत्र अगरबत्ती बनाने का काम करती हैं और अपने इस नए काम से काफी ख़ुश हैं.

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काम बदलने से मिली खुशी

चांदमुनि ने बीबीसी से कहा, '' घर चलाने के लिए पहले 'हड़िया' बेचना पड़ता था. उससे आमदनी तो हो जाती थी, लेकिन वह काम अच्छा नहीं लगता था. मन कचोटता था कि यह काम क्यों कर रहे हैं, जहां नशा कर रहे मर्दों के साथ बैठना पड़ता है."

अच्छा न लगने के बावजूद उन्हें शराब बेचनी पड़ती थी. इस कारोबार के लिए ज़्यादा पैसों की ज़रूरत नहीं पड़ती.

वो कहती हैं, "हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि हम दूसरे काम के लिए पूंजी जुटा सकें. मेरे पति भी खेतों में काम करते थे. दोनों की कमाई से हमारा घर चलता था."

चांदमुनि बताती हैं, "पिछले महीने मैंने घर के बगल वाले प्राइमरी स्कूल में कुछ लोगों की भीड़ देखी. पता चला कि यहां अगरबत्ती बनाने की ट्रेनिंग मिलेगी. मैंने उसका फ़ॉर्म भरा. 10 दिनों की ट्रेनिंग ली और अब पूरे दिन अगरबत्ती बनाती हूं."

अगरबत्ती बनाने के काम में चांदमुनि का मन लगता है क्योंकि अब उन्हें नशेड़ी मर्दों को नहीं झेलना पड़ता और अगरबत्ती बनाना भी बहुत आसान है.

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बेहतर ज़िंदगी की आस

चांदमुनि के साथ 35 दूसरी औरतों ने भी अगरबत्ती बनाने की ट्रेनिंग ली थी और अब वो सब मिलकर ये काम करती हैं.

चांदमुनि कहती हैं,"ट्रेनिंग देने वाले 'दादा' (भैया) ने कहा है कि सावन में अगरबत्ती ज्यादा बिकेगी, तो हमें हज़ारों रुपयों की एकमुश्त आमदनी हो जाएगी. अब इसी आस में काम कर रहे हैं."

चांदमुनि के पति बिट्टु मरांडी पहले पटना में मजदूरी करते थे. मजदूरी से उन्हें हर महीने तकरीबन 3,000 रुपये मिलते थे.

वो अपनी मां की इकलौती संतान हैं. साल 1992 में मां की मौत के बाद उन्हें गांव वापस लौटना पड़ा, तो वह आमदनी भी बंद हो गई.

तब से घर चलाने के लिए इस दंपति ने कड़ी मेहनत की लेकिन अब उन्हें जिंदगी सुधरने की उम्मीद है.

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आदिवासियों का सखी मंडल

बिट्टू कहते हैं, "अनाप-शनाप (ज्यादा) पैसा आएगा. अगरबत्ती का सेंट भी अच्छा है. खूब बिकेगा. देवघर भी सप्लाई करेंगे. अब कभी दिक्कत नहीं होगी."

अगरबत्ती निर्माण में लगी अधिकतर महिलाएं आदिवासी हैं. इन लोगों ने 'सखी मंडल' नामका समूह बनाकर अगरबत्ती बनाना शुरू किया है.

पड़ोसी गांव चोरखेड़ा की रेणु कुमारी इन्हें ट्रेनिंग दिलवाने की पहल की थी. उन्होंने बताया कि बेदिया में हड़िया बेचना आम बात थी.

हालात देखकर उन्होंने गांव की बेरोजगार महिलाओं से बात की और 35 महिलाओं का पहला स्वयं सहायता समूह बनाया.

पहले उन्हें मैन्युअल मशीन पर ट्रेनिंग दी गई. इसके बाद उन्हें ऑटोमेटिक मशीन पर भी काम करने का तरीका बताया.

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सरकार करेगी ब्रैंडिंग

रेणु ने बताया, ''अब हमलोग दूसरे समूह की ट्रेनिंग शुरू कर रहे हैं. यह गांव में ही हो रहा है, इसलिए इनके घरवाले भी सपोर्ट कर रहे हैं.''

झारखंड सरकार ने इस अगरबत्ती की ब्रैंडिंग की पहल की है. पिछले दिनों इसकी लॉन्चिंग के बाद दुमका के डीसी मुकेश कुमार ने मुख्यमंत्री रघुवर दास और मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी से मिलकर उन्हें यह अगरबत्ती तोहफ़े में दी थी.

तब मुख्यमंत्री ने मीडिया से कहा कि सरकार इसकी बिक्री में सपोर्ट करेगी.

जरमुंडी के बीडीओ राजेश डुंगडुंग ने बीबीसी को बताया कि ये अगरबत्तियां बासुकिनाथ मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाए गए बेलपत्र और फूल से बनाई जा रही हैं. इसलिए इनका नाम 'बासुकि अगरबत्ती' रखा गया है.

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बाबाधाम (देवघर) और बासुकिनाथ धाम (जरमुंडी) में सालों भर लोग आते रहते हैं. सावन में रोज लाखों लोगों की भीड़ होती है. ऐसे में यहां अगरबत्ती का बड़ा मार्केट उपलब्ध है.

चूंकि ये अगरबत्तियां मंदिर मे चढ़ाए गए बेलपत्र और फूल से बना रही हैं इसलिए स्वाभाविक तौर पर लोगों की आस्था इस ब्रैंड से जुड़ी है.

इससे अगरबत्ती के मार्केटिंग में भी मदद मिलने की उम्मीद है. दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में ऐसे प्रयोग पहले ही सफल हुए हैं.

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