क्या चौटाला की तरह झारखंड में सत्ता की चाबी अपने पास रखना चाहते हैं बाबूलाल मरांडी?

क्या झारखंड में सत्ता की चाबी अपने पास रखना चाहते हैं बाबूलाल मरांडी?

नई दिल्ली। बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री हैं। वे प्रदेश के सबसे सुलझे नेताओं में एक हैं। झारखंड की राजनीति में खंडित जनादेश एक स्थायी प्रवृति रही है। अब तक हुए विधानसभा चुनावों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। 2014 के चुनाव में भाजपा को भी अकेले बहुमत नहीं मिला था। उसे 37 सीटें ही मिलीं थीं। भाजपा से गठबंधन कर चुनाव लड़ने वाले आजसू ने पांच सीटें जीत कर बहुमत का आंकड़ा जुटाया था। मिली जुली सरकार या गठबंधन की सरकार झाऱखंड की नियति है। बाबूलाल मरांडी ने भविष्य की राजनीति को ध्यान में रख 2019 में अकेले चुनाव लड़ने का इरादा बनाया है। उन्होंने खुद को महागठबंधन से अलग कर लिया है। बाबूलाल मरांडी ने सभी 81 सीटों पर उम्मीदवार उतारने के संकेत दिये हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी, झारखंड विकास मोर्चा को 8 सीटें मिलीं थीं। अगर इस बार भी झाविमो को इसके आसपास सीटें मिल गयी और त्रिशंकु विधानसभा की नौबत आ गयी तो मरांडी किंगमेकर बन सकते हैं। किस्मत मेहरबान हुई तो भाजपा विरोध के नाम पर वे किंग भी बन सकते हैं। हरियाणा के दुष्यंत चौटाला की तरह बाबूलाल मरांडी भी झारखंड की राजनीति में अनिवार्य बन जाएंगे।

मरांडी महागठबंधन के रवैये से नाखुश

मरांडी महागठबंधन के रवैये से नाखुश


बाबूलाल मरांडी झारखंड में बनने वाले महागठबंधन के रवैये से नाखुश हैं। सीट बंटवारा पर झारखंड मुक्तिमोर्चा, कांग्रेस और अन्य दलों के पूर्वाग्रह को देख कर झाविमो ने अपने कदम वापस खींच लिये। उनका कहना है कि महागठबंधन के सहयोगी दल सीट बंटवारे पर ईमानदारी से बात करने के लिए उत्सुक नहीं हैं। इसके पहले जब भी बैठक हुई तो उसमें चाय-पानी के अलावा और कुछ सकारात्मक नहीं हुआ। भाजपा को हराने के लिए महागठबंधन की बात तो होती है लेकिन जब समय आता है तो घटल दल इसे साकार नहीं कर पाते। माना जा रहा है कि मरांडी ने 20 से 25 सीटों पर अपना दावा पेश किया था जब कि झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस उन्हें 10 से अधिक सीटें नहीं देना चाहती। परिस्थितियों का आकलन कर मरांडी ने अकेले ही चुनाव में जाने का मन बनाया है। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि उसकी अभी भी बाबूलाल मरांडी से बातचीत चल रही है।

नीतीश के साथ भी नहीं जाएंगे मरांडी

नीतीश के साथ भी नहीं जाएंगे मरांडी

विधानसभा चुनाव घोषणा के पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बाबूलाल मरांडी के बीच गठबंधन की चर्चा थी। नीतीश झारखंड में भाजपा से अलग चुनाव लड़ रहे हैं। मरांडी और नीतीश ने एक दूसरे की तारीफ की थी। नीतीश झारखंड में किसी नये साथी की तलाश में थे। लेकिन अब मरांडी ने साफ कर दिया कि वह जदयू के साथ मिल कर चुनाव नहीं लड़ेंगे। मरांडी हेमंत सोरेन को भी नेता मानने के पक्ष में नहीं हैं। अगर वे महागठंबधन में शामिल होते तो उन्हें हेमंत सोरेन के नेतृत्व में चुनाव लड़ना पड़ता। हेमंत सोरेन की राजनीति योग्यता यही है कि वे झारखंड के दिशोम गुरु शिबू सोरेन के पुत्र हैं। राजनीति जानकारों का भी मानना है कि हेमंत सोरेन की तुलना में बाबूलाल मरांडी राजनीतिक रूप से अधिक अनुभवी और स्वीकार्य हैं।

भाजपा को ध्वस्त करने का मंसूबा

भाजपा को ध्वस्त करने का मंसूबा

भाजपा को ध्वस्त करने के लिए बाबूलाल मरांडी कई बार टूटे हैं लेकिन हिम्मत नहीं हारी। वे पहले भाजपा में ही थे। भाजपा ने ही उन्हें 2000 में झारखंड का पहला मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन आत्मसम्मान के नाम पर उन्होंने 2006 में भाजपा से किनारा कर लिया था। तब से वे भाजपा को धूल चटाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाये हुए हैं। 2009 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने 11 सीटों पर जीत हासिल की थी। 2014 का विधानसभा चुनाव उनकी पार्टी के लिए तो अच्छा रहा लेकिन खुद उनके लिए बहुत बुरा रहा। झाविमो ने 8 सीटें जीत कर कांग्रेस को भी पछाड़ दिया लेकिन पार्टी अध्यक्ष मरांडी विधानसभा चुनाव हार गये। वे दो जगहों से खड़ा हुए थे और दोनों ही जगहों पर उनकी हार हुई थी। उनकी व्यक्तिगत हार ने पार्टी के मनोबल पर असर पड़ा। बाद में 8 में से 6 विधायक भाजपा में चले गये। इससे मरांडी की राजनीति को झटका लगा।

 कई बार गिर कर उठे हैं मरांडी

कई बार गिर कर उठे हैं मरांडी

बाबूलाल मरांडी झारखंड की राजनीति में कई बार गिर कर उठे हैं। 25 सितम्बर को रांची के प्रभात तारा मैदान (जगन्नाथ मैदान) में झारखंड विकास मोर्चा का जनादेश समागम हुआ था। इस रैली में उन्होंने भाजपा की तरफ इशारा करते हुए कहा था, दिल्ली से लेकर रांची तक उन्हें मिटाने की कोशिश हुई लेकिन कमयाबी नहीं मिली। मैं जनता के दिलों में रहता हूं, मुझे मिटाना आसान नहीं। इस रैली में जुटी भीड़ ने मरांडी की राजनीति को नयी ताकत दी है। मरांडी अधिक अधिक सीटों पर लड़ कर अपने लिए संभावनाओं के दरवाजे खोलना चाहते हैं। अगर मरांडी सभी 81 सीटों पर लड़े तो त्रिकोणीय मुकाबले में कई दलों का गेम प्लान बिगड़ सकता है और कुछ भी हो सकता है।

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