बिहार में JDU ने एक साल पहले दिया चुनावी नारा, 'क्यों करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार'

नई दिल्ली- बिहार में सत्ताधारी जेडीयू ने विधानसभा चुनाव से एक साल पहले ही चुनावी बिगुल फूंक दिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी ने पटना में अपने दफ्तर के बाहर एक बड़ी सी होर्डिंग लगाई है, जिसपर पार्टी का नया नारा लिखा है- 'क्यों करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार'। गौरतलब है कि अभी बिहार में जेडीयू का बीजेपी के साथ गठबंधन है और लोकसभा चुनाव वहां एनडीए के घटकर दल आपसी तालमेल के साथ लड़े थे और 40 लोकसभा सीटों में से 39 पर कब्जा कर लिया था। खास बात ये है कि 2015 में भी जेडीयू ने चुनाव से पहले ऐसा ही एक ठेठ स्थानीय अंदाज वाला नारा दिया था, जो काफी कामयाब रहा था। अलबत्ता तब जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस का गठबंधन था और वे बीजेपी के विरोध में चुनाव लड़े थे।

विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू

विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू

'क्यों करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार'.....मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गहन चिंतन वाली तस्वीर के साथ ठेठ स्थानीय अंदाज में लिखे हुए जेडीयू के चुनावी नारे के कई संकेत हो सकते हैं। वैसे जेडीयू प्रवक्ता संजय सिंह एक चैनल को दिए इंटरव्यू में बता रहे थे कि 'ये हमारा स्लोगन नहीं है..... बिहार की 12 करोड़ जनता की आवाज है। गांव में चले जाइए, शहर में घूमिए लोग कहते हैं, नीतीश कुमार तो ठीक ही हैं, दूसरे की वैकेंसी कहां है.....।' जब उन्हें पूर्व सीएम और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा जीतन राम मांझी की उस सलाह की याद दिलाई गई कि नीतीश को अब भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ लेना चाहिए तो उन्होंने कहा कि मांझी की बातों को कोई भी गंभीरता से नहीं लेता। उन्होंने कहा कि बीजेपी के साथ हमलोगों का गठबंधन अटूट है और आरजेडी के साथ जाने का तो सवाल ही नहीं उठता।

'बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो'

'बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो'

जेडीयू 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव भी यह प्रयोग कर चुकी है। लेकिन, तब नीतीश कुमार लालू यादव की पार्टी आरजेडी और कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ रहे थे। उस चुनाव में जेडीयू का ये नारा बिहार में खूब लोकप्रिय हुआ था- 'बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो'। कहते हैं कि तब नीतीश की छवि का फायदा कांग्रेस के साथ-साथ आरजेडी को भी मिला था। पिछले विधानसभा चुनाव में बिहार की 243 सीटों में से जेडीयू को 71, आरजेडी को 80, भाजपा को 53 और कांग्रेस को 27 सीटें मिली थीं। बाद में नीतीश महागठबंधन का बंधन तोड़कर वापस एनडीए में आ गए थे और तबसे बीजेपी के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं।

लोकसभा चुनाव में चला एनडीए का जादू

लोकसभा चुनाव में चला एनडीए का जादू

इस साल हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी के एनडीए ने आरजेडी की अगुवाई वाले महागठबंधन का पूरी तरह से सफाया कर दिया था। लोकसभा चुनाव में 40 में से 17 सीटें बीजेपी, 16 जेडीयू, 6 एलजेपी जीती थी और महागठबंधन में सिर्फ 1 सीट कांग्रेस को मिली थी। जबकि, 2015 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी आरजेडी का खाता भी नहीं खुला था। लेकिन, लोकसभा चुनाव के बाद से जेडीयू और बीजेपी के बीच तालमेल का अनुभव सिर्फ मीठा ही नहीं रहा है। नीतीश की पार्टी अभी केंद्र की मोदी सरकार में शामिल नहीं है और उसने तीन तलाक और आर्टिकल 370 खत्म करने जैसे बड़े मुद्दे पर भी बीजेपी का साथ नहीं दिया है। यही वजह है कि नीतीश की पार्टी ने अगर एक साल पहले से ही अकेले-अकेले चुनावी माहौल बनाना शुरू कर दिया है तो इसके कई और सियासी मायने भी हो सकते हैं।

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