RLD-BJP के बीच डील पक्की, लेकिन जयंत चौधरी की इस एक मांग ने बढ़ाई मोदी-शाह की टेंशन!
Jayant Chaudhary news: 'कोई कसर रहती है? आज मैं किस मुंह से इनकार करूं...', अपने इसी बयान से जयंत चौधरी ने आरएलडी-भाजपा गठबंधन पर मुहर लगाई है।
दरअसल, शुक्रवार को पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न सम्मान दिए जाने का ऐलान किया था, जिसके बाद जयंत चौधरी से भाजपा के साथ गठबंधन को लेकर सवाल पूछा गया।

हालांकि, एक सवाल अभी भी सामने खड़ा है कि जिस तरह से जयंत चौधरी ने खुले तौर पर भाजपा से गठबंधन की बात स्वीकार ली, उससे साफ है कि पिछले कई दिनों से दोनों दलों के बीच बातचीत चल रही थी, तो फिर ऐसे में सीट शेयरिंग का क्या फॉर्मूला तय हुआ है? या फिर, अभी भी सीटों के बंटवारे को लेकर पेच फंसा हुआ है?
क्या है आरएलडी-भाजपा की असली डील?
द प्रिंट की खबर के मुताबिक, आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी ने भाजपा नेताओं के सामने दो मांगें रखी थीं, पहली- चौधरी चरण सिंह के लिए भारत रत्न सम्मान और दूसरी- लोकसभा चुनाव में गठबंधन के तहत लड़ने के लिए चार सीटें। हालांकि, भाजपा की तरफ से आरएलडी को लोकसभा की दो और राज्यसभा की एक सीट का ऑफर दिया गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में चूंकि आरएलडी केवल तीन सीटों- मथुरा, बागपत और मुजफ्फरनगर पर लड़ी थी और इसी के आधार पर भाजपा ने अपना ऑफर तय किया।
मुजफ्फरनगर सीट पर फंसा मामला
आरएलडी को दिए अपने ऑफर में भाजपा ने जयंत चौधरी को बिजनौर और बागपत दो लोकसभा सीटें दी हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में बिजनौर सीट पर बीएसपी ने भाजपा को हराया था। वहीं, बागपत सीट पर भाजपा उम्मीदवार डॉक्टर सत्यपाल सिंह ने जयंत चौधरी को हराकर जीत हासिल की थी। दरअसल असली पेच फंसा है, मुजफ्फरनगर सीट को लेकर, जहां 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के संजीव बालयान ने चौधरी अजीत सिंह को महज 6,526 वोटों के अंतर से हराया था।
आरएलडी क्यों चाहती है ये सीट?
आरएलडी का दावा है कि मुजफ्फरनगर सीट पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत है, इसलिए गठबंधन में ये सीट भी उन्हें दी जाए। पार्टी अपने इस दावे के पीछे एक तर्क भी रख रही है। आरएलडी का कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दे की वजह से जबरदस्त मोदी लहर थी, लेकिन इसके बावजूद अजीत सिंह केवल 6,526 वोटों के मामूली अंतर से हारे।

आरएलडी-भाजपा गठबंधन से किसे फायदा?
2019 के लोकसभा चुनाव की अगर बात करें, तो उस वक्त आरएलडी यूपी की दो प्रमुख पार्टियों बसपा और सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी थी, लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। हालांकि, इन तीनों दलों के गठबंधन की वजह से वेस्ट यूपी में भाजपा को काफी नुकसान हुआ और उसे 8 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।
भाजपा की कोशिश है कि आरएलडी के साथ गठबंधन से पिछले लोकसभा चुनाव में हुए नुकसान की भरपाई की जाए। वहीं, अगर आरएलडी का पिछला रिकॉर्ड देखें, तो चाहे 2002 का लोकसभा चुनाव हो या फिर 2009 का, उसे भाजपा के साथ गठबंधन से फायदा ही हुआ है। ऐसे में आरएलडी और भाजपा का ये गठबंधन, दोनों पार्टियों के लिए फायदे वाली डील साबित हो सकता है।
वहीं, चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न सम्मान देने से ना केवल हिंदी भाषी राज्यों में जाटों के बीच भाजपा की पहुंच बढ़ेगी, बल्कि जयंत चौधरी भी मोदी सरकार के प्रति किसानों के नाराजगी के बावजूद, वोटरों में अपनी बात मजबूती से रख पाएंगे।












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