भारत में पहली बार नहीं हो रहा हिंदी का विरोध

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नई दिल्ली। तमिलनाडु सरकार की ओर से हिंदी के विरोध में सुर और तेज होते दिख रहे हैं। जयललिता के बाद तमिलनाडु की अन्य प्रमुख पार्टियों ने भी हिन्दी के विरोध में मुहिम छेड़ दिया है। जिनमें से दो भाजपा की सहयोगी पार्टियां भी हैं। पीएमके और एमडीएमके, एनडीए के दो घटक दल नरेन्द्र मोदी के इस कदम का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

लेकिन यह पहली बार नहीं है कि भारत में हिंदी को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। तमिलनाडु में उठ रहे इस विवाद से पहले, पिछले वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय में भी उत्तर-पूर्वी छात्रों ने हिंदी को लेकर जबरदस्त प्रदर्शन किया था। छात्रों ने विश्वविद्यालय के इस निर्देश का विरोध किया था, जिसमें हिंदी या मॉर्डन हिंदी को हर छात्र के एक अनिवार्य विषय बनाने की बात कही गई थी।

दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी को अनिवार्य विषय बनाए जाने पर वहां पढ़ रहे उत्तर-पूर्वी छात्रों ने इसे हिंदी थोपे जाने की शुरुआत करार दिया। उनके अनुसार यह नियम उत्तर-पूर्व से आए उन छात्रों के प्रति अन्याय है, जिनकी आधिकारिक भाषा हिंदी नहीं है। लिहाजा, उत्तर-पूर्व के 200 से ज्यादा विद्यार्थियों ने हिंदी को अनिवार्य विषय बनाए जाने पर विरोध प्रदर्शन निकाला था।

तमिलनाडु में अछूते हैं हिंदी भाषी

हिंदी भाषा पर राजनीति के चलते तमिलनाडु के कई जिलों में तो हिंदीभाषी लोगों का अछूत माना जाता है, यानी उनके साथ भेदभाव किया जाता है। एक बार नहीं कईयों बार डीएमके अध्यक्ष करुणानिधि ने तमिलनाडु में हिंदी के प्रयोग को लेकर आवाज उठाई है। वहीं, जयललिता तमिल को आधिकारिक भाषा बनाए जाने की लंबी लड़ाई लड़ रही हैं।

भारत की भाषाएं

भारत में कुल 438 भाषा बोली जाती है। हालांकि, संविधान सिर्फ 22 अनुसूचित भाषाओं को मान्यता देती है। लिहाजा, भाषा संबंधी यह राजनीतिक लड़ाई भारत में दशकों से होती आई है। देखना यह है कि हिंदी बनाम तमाम भाषाओं से जुड़ा यह विवाद कहां जाकर खत्म होता है।

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