इंडियन आर्मी के सैनिकों के पास खाने से लेकर सर्दी के कपड़े तक नहीं

सर्दी से बचाने वाले कपड़ों से लेकर, इंडियन आर्मी के सैनिकों के पास गोलियों से बचाने वाली यूनिफॉर्म तक नहीं है। आर्मी डिजाइन ब्‍यूरों (एडीबी) की एक रिपोर्ट में सामने आया सच।

नई दिल्‍ली। दुनिया का टॉप फाइव ताकतवर सेनाओं में से एक इंडियन आर्मी और इसके सैनिकों के पास न तो गोलियों से बचाने वाली बुलेट प्रूफ जैकेट है, न ही बेहतर क्‍वालिटी का खाना सैनिकों को मिल पाता है और न ही सियाचिन जैसी जगहों पर ठंड से बचा सकने वाले कपड़े हैं। चौंकिएगा मत अगर आपको पता लगे इंडियन आर्मी के सैनिक सिर्फ खाने की समस्‍या से ही नहीं बल्कि 50 समस्‍याओं का सामना कर रहे हैं।

हकीकत पर आपको यकीन नहीं होगा

पिछले दिनों बॉर्डर सिक्‍योरिटी फोर्स (बीएसएफ) के एक जवान के बाद इंडियन आर्मी के भी एक जवान ने सोशल मीडिया पर अपना वीडियो रिलीज किया। वीडियो में जवान ने खाने की खराब क्‍वालिटी के साथ ही दूसरी और बातों का जिक्र भी किया। अगर आप आर्मी डिजाइन ब्‍यूरों (एडीबी) की रिपोर्ट के बारे में जानेंगे तो आपको यकीन नहीं होगा। इंग्लिश डेली हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ने इस रिपोर्ट के हवाले से उन समस्‍याओं के बारे में जानकारी दी है जिसका सामना जवान पिछले कई वर्षों से करने को मजबूर हैं। एडीबी की स्‍थापना पिछले वर्ष ही हुई और इसका मकसद देश में बनने वाले हथियारों के उत्‍पादन को बढ़ावा देना है।

119 पेज की रिपोर्ट में 50 समस्‍याएं

119 पेज की रिपोर्ट में 50 समस्‍याएं

यह रिपोर्ट 119 पेज की है और इन 119 पेजों पर उन 50 समस्‍याओं का जिक्र है जिनका सामना बॉर्डर या लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) पर खड़े जवानों को करना पड़ता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन समस्‍याओं को जल्‍द से जल्‍द दूर करना पड़ेगा ताकि सीमा पर खड़े जवानों को सर्वश्रेष्‍ठ सुरक्षा मिल सके। रिपोर्ट में हथियारों को तेज गति से डेवलप करने की सलाह भी दी गई है। इस रिपोर्ट में जवानों को भावी टेक्‍नोलॉजी की कमी की वजह से आने वाली परेशानियों के बारे में भी बताया गया है। नए आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत ने पिछले दिनों इस रिपोर्ट का अध्‍ययन किया है और उन्‍होंने वादा किया है कि इन परेशानियों को जल्‍द से जल्‍द दूर किया जाएगा।

खाने की समस्या

खाने की समस्या

सेना का कहना है कि हाई कैलोरी फूड, जिसे भारतीय स्‍वाद के मुताबिक बेहतर बनाया गया है, उसे ऊंचाई पर तैनात सैनिकों की आपरेशनल क्षमता बढ़ाने के लिए और ज्‍यादा बेहतर करने की जरूरत है। रिपोर्ट में लिखा है, 'वर्तमान समय में ऊंचाई पर तैनात ट्रूप्‍स को डब्‍बाबंद खाना और कुछ रेडी टू ईट मील दिया जाता है। लेकिन यह भारतीय स्‍वाद के मुताबिक नहीं हैं और इनकी वजह से किसी की जिंदगी भी ताक पर रखी जा सकती है।' रिपोर्ट में दूसरे देशों का जिक्र है कि कैसे वहां पर सैनिकों को उनके स्‍वाद की पसंद के मुताबिक खाना दिया जाता है।

गोलियों से बचाने के लिए कवच नहीं

गोलियों से बचाने के लिए कवच नहीं

जवान जो यूनिफॉर्म पहनकर एलओसी या बॉर्डर पर खड़े होते हैं वह उन्‍हें गोलियों से बचाने में नाकाफी है। इस बात पर जनरल रावत ने भी चिंता जाहिर की है। आर्मी चीफ का कहना है कि सैनिकों को आगे और उनकी पीठ की तरफ से सुरक्षित रखने के लिए उन्‍हें बुलेट प्रूफ जैकेट मुहैया कराई जाएगी। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि साइड और उनकी गर्दन को भी पूरी सुरक्षा दी जाएगी। एडीबी की रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान समय में जो बुलेट प्रूफ जैकेट्स हैं वे काफी भारी हैं, असुविधाजनक हैं और अतंराष्‍ट्रीय मानकों के विपरीत हैं।

सैनिकों पास हेलमेट तक नहीं

सैनिकों पास हेलमेट तक नहीं

बुुलेट प्रूूफ हेलमेट 1.7 किलो का है और काफी भारी है। यह जवानों के सिर को सिर्फ साइड से कवर करता है यानी टॉप खुला रहता है। रिपोर्ट के मुताबिक माथे पर जो प्‍लेट लगाई जाती है वह 7.62 एमएम के हथियार से सुरक्षा प्रदान करती है लेकिन साइड प्‍लेट्स नौ एमएम के हथियार से उन्‍हें सुरक्षा प्रदान करती है। फिलहाल इस समस्‍या को दूर करने में दो से तीन वर्ष तक का समय लग सकता है। सेना की ओर से नई बुलेट प्रूफ जैकेट्स और बैलेस्टिक हेलमेट की खरीद के लिए कोशिशें शुरू हो गई हैं।

सियाचिन में सर्दी के कपड़ों की तंगी

सियाचिन में सर्दी के कपड़ों की तंगी

सियाचिन ग्‍लेशियर जो दुनिया का हाइएस्‍ट वॉर जोन है वहां पर तैनात सैनिकों के पास बेहतरीन क्‍वालिटी के कपड़े नहीं हैं जो सैनिकों के सर्दी से बचा सकें। रिपोर्ट के मुताबिक सेना की ओर से जिस विंटर क्‍लोदिंग का प्रयोग किया जाता है वे काफी भारी हैं, मूवमेंट में दिक्‍कतें पैदा करते हैं और सैनिक भारी उपकरण जैसे रेडियो सेट को लेकर चलने में काफी दिक्‍कतें होती हैं। सैनिकों को अपनी जान बचाने के लिए बाजार से हल्‍के कपड़े खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। सिर्फ इतना ही नहीं यहां पर तैनात जवानों के पास वर्ल्‍ड क्‍लास स्‍नाइपर स्‍कोप तक नहीं हैं। ऐसे में सैनिक ठीक से निशाना भी नहीं लगा पाते हैं। स्‍नाइपर फायर भी मौसम की वजह से सही नहीं है और अगले चार वर्षों में इनकी खरीद की बात कही गई है।

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