मुस्लिम विरोध के कारण है भारत का इसराइल प्रेम?

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1974 में न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार बर्नड वेइनरौब ने कहा था कि भारत के लिए इसराइली राजनयिकों का वनवास ख़त्म नहीं हो रहा है. ज़ाहिर है इस वनवास की बुनियाद 1947 में संयुक्त राष्ट्र में भारत ने ही रखी थी.

भारत ने इसराइल के गठन के ख़िलाफ़ वोट किया था. यह वनवास पीवी नरसिम्हा राव ने 1992 में ख़त्म किया. भारत ग़ैर-अरब मुल्क के रूप में पहला देश था जिसने 1988 में फ़लस्तीन को मान्यता दी. दूसरी तरफ़ ग़ैर-अरब मुल्क के रूप में इसराइल के ख़िलाफ़ भारत एक मजबूत आवाज़ के रूप में लंबे समय तक बना रहा.

दोनों देशों के बीच राजनयिक वनवास ख़त्म होने के बाद से संबंध काफ़ी गहरे हो गए हैं. राजनयिक वनवास भले पीवी नरसिम्हा राव ने ख़त्म किया, लेकिन इसे परवान चढ़ाया बीजेपी की सरकार ने.

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 2003 में किसी भी इसराइली प्रधानमंत्री का पहला भारत दौरा हुआ तो नरेंद्र मोदी के रूप में पहले भारतीय प्रधानमंत्री का दौरा इसराइल का हुआ.

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हिन्दुवादी राजनीति के कारण इसराइल का संग?

2008 में भारतीय रक्षा सचिव विजय सिंह इसराइल के दौरे पर गए थे. इस दौरे को लेकर इसराइल के उदारवादी अख़बार हैरेत्ज़ ने दोनों देशों के संबंधों का मूल्यांकन किया था. इस अख़बार ने अपने विश्लेषण में लिखा था, ''भारत और इसराइल के बीच संबंध मजबूत तब होते हैं जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता है या फिर भारत की राजनीति में दक्षिणपंथ का उभार होता है या वहां के नेतृत्व में मुस्लिम विरोधी भावना बढ़ती है.''

इसराइली अख़बार ने अपने इसी विश्लेषण में लिखा है, ''1999 में करगिल को लेकर भारत और पाकिस्तान भिड़े तो भारत ने इसराइल से राजनयिक संबंधों को और मजबूत किया. विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार उस वक़्त इसराइल के रक्षा मंत्रालय के महानिदेशक अमोस यारोन हथियारों की एक आपातकालीन खेप के साथ भारत पहुंचे थे.''

अख़बार ने इसी विश्लेषण में आगे लिखा था, ''आधिकारिक रूप से इसराइल और भारत के बीच राजनयिक संबंध कांग्रेस की सरकार में शुरू किया गया, लेकिन जब राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी के नेतृत्व में 1998 से 2004 तक सरकार रही तो इस दौरान ही संबंध परवान चढ़े.''

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क्या यह सच है कि पाकिस्तान से तनाव बढ़ने या मुस्लिम विरोधी राजनीति के उभार के कारण भारत का संबंध इसराइल से मजबूत होता है?

मध्य-पूर्व मामलों के जानकार कमर आगा कहते हैं, ''ये ज़रूर है कि हम संकट की घड़ी में इसराइल के पास गए हैं. ऐसा इसलिए कि वहां से हमारी ज़रूरतें आसानी से पूरी हो जाती हैं. अब तक हम सामरिक मामलों में रूस पर निर्भर रहे हैं. ज़ाहिर है भाजपा इसराइल का समर्थक रही है.''

कमर आगा कहते हैं, ''वैश्वीकरण के दौर में हमारी ज़रूरतें अहम हो गई हैं और विचारधारा पीछे चली गई. भारत का इसराइल के साथ संबंध भी इसी आधार पर है. भारत की पूर्ववर्ती इसराइल नीति को लेकर उसे निराशा भी हुई है.''

''अरब देशों ने कश्मीर को लेकर लगातार भारत के ख़िलाफ़ मतदान किया है ऐसे में भारत को भी अपनी नीतियों पर स्वतंत्र रूप से विचार करने का हक़ है. जहां तक हिन्दुत्व या मुस्लिम विरोधी भावना का सवाल है तो यहां के हिन्दुवादी संगठन शुरू से ही इसराइल का खुलकर समर्थन करते रहे हैं. और मुझे लगता है कि ये उपद्रवी संगठन हैं और इनकी कोई स्थायी विचारधारा नहीं है. ये हिटलर के प्रति भी सहानुभूति दिखाते हैं और यहूदियों के प्रति भी. दोनों चीज़ें एक साथ कैसे हो सकती?''

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यहूदी-हिन्दू गठजोड़

विदेशों में जो भारतवंशी हैं और दूसरी तरफ़ जो यहूदी हैं उन्हें लगता है कि दोनों देशों का साझा दुश्मन इस्लामिक अतिवाद है. 2000 में इसराइली विदेश मंत्रालय ने एक सर्वे कराया था जिसमें पाया गया कि भारत दुनिया में अति इसराइल समर्थक देश है. यहां तक कि इस मामले में भारत अमरीका से भी ऊपर था. इस सर्वे के अनुसार फ़लस्तीनियों से सहानुभूति रखने के मामले में भारत दुनिया भर के देशों में सबसे निचले पायदान पर चला गया.

आख़िर ऐसा क्यों हुआ? 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में इसराइल की सहानुभूति भारत के साथ थी. इसके साथ भी भारत का यहूदियों के ख़िलाफ़ अत्याचार में कोई इतिहास नहीं रहा है. जब-जब कश्मीर का मामला आया तो अरब के देश चाहे वो शिया बहुल हों या सुन्नी बहुल सबने पाकिस्तान का साथ दिया.

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भारत की अपनी ज़रूरतें

1990 के बाद दुनिया ने भी नई करवट ली. शीत युद्ध के ख़त्म होने और सोवियत संघ के टूटने के बाद दुनिया भर के देशों की विदेश नीतियों में कई तरह की शिफ्टिंग हुई. सोवियत संघ के पतन के बाद भारत को भी नए साथी की ज़रूरत थी. इसके साथ ही कई विश्लेशक मानते हैं कि भारत में हिन्दू राष्ट्रवाद के उभार के कारण भी इसराइल को लेकर सहानुभूति बढ़ी.

हिन्दु्त्व के समर्थक और धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन करने वाले बेल्जियम के कोइनार्द इल्स्ट ने लिखा है, ''वीर सावरकर यहूदीवाद का एक हिन्दू प्रतिरूप थे. उन्होंने कहा था कि हिन्दुओं का एक राष्ट्र के रूप अपनी मातृभूमि से संबंध है न कि किसी धर्म से. यहूदियों की परिस्थितियों की कसौटी पर यह सिद्धांत बिल्कुल सही है. यहूदियों को अपनी मातृभूमि से विस्थापित होना पड़ा...और हिन्दुओं को अपने शासन के लिए केवल ग़ैर हिन्दुओं को निकालना पड़ा.'' वीर सावरकर ने भी इसराइल का खुलकर समर्थन किया था.

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इसराइल प्रेम मुस्लिम नफ़रत पर आधारित?

2009 में एटीएस ने एक आतंकी हमले में अन्य लोगों के साथ भारतीय सेना के एक अधिकारी श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को गिरफ़्तार किया था. पुरोहित ने अपने बयान में इसराइल से मदद मांगने की बात को स्वीकार किया था. पुरोहित ने कहा था कि इसराइल मुस्लिम विरोधी आतंकियों से निपटने में सबसे कारगर हो सकता है.

बहरीन और सऊदी अरब में भारतीय राजदूत रहे तलमिज़ अहमद कहते हैं, ''हमारे देश के जो हिन्दू अतिवादी हैं और इसराइल के जो यहूदी अतिवादी हैं उनकी सोच मुस्लिम विरोधी रहती है और उसी आधार पर दोनों देशों के क़रीब लाना चाहते हैं. इसराइल की यहूदी पहचान में अरब पुराना और ऐतिहासिक दुश्मन हैं. अब अरब में मुसलमान हैं तो ज़ाहिर है उन्हें मुसलमानों से समस्या है. फ़लस्तीन का समर्थन सारे मुस्लिम देश करते हैं. हमारे यहां तो अतिवादी हैं उनकी भी यही राय है और वो अपनी पहचान को मुस्लिम विरोध के रूप में बनाना चाहते हैं.''

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