अनंत की ‘अवज्ञा’ : तो सवा करोड़ ‘मूर्ख’ और डेढ़ करोड़ पर ‘खतरा’!
अहमदाबाद। इस देश में सवा करोड़ लोग अधिकृत मूर्ख हैं और करीब डेढ़ करोड़ लोग ऐसे हैं, जो कम से कम नौ महीने से तो अधिकृत रूप से लगातार खतरे में जी रहे हैं। यह कोई सरकारी आँकड़ा नहीं है, परंतु यदि ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता अनंतमूर्ति की भावनाएँ यदि सही हैं, तो फिर इस आंकड़े को सरकारी ही नहीं, बल्कि संवैधानिक रूप से भी अधिकृत कहा जा सकता है।
दरअसल ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कन्नड़ लेखक डॉ यू आर अनंतमूर्ति की मानें तो नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना इस देश को खतरे में डालने के बराबर होगा। अब यह बताने की कोई जरूरत तो है नहीं कि लोकतंत्र में कोई प्रधानमंत्री कैसे और कब बन सकता है? बाकायदा चुनाव होंगे और यदि भाजपा की ओर से स्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित किए गए नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा को न्यूनतम 272 सीटें मिलेंगी, तभी मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे। अनंतमूर्ति के अनुसार मोदी अगर प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वे देश छोड़ देंगे।

खैर, यह तो भविष्य के गर्त में है कि मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं और अनंतमूर्ति उसके बाद क्या करेंगे? लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस देश में किसी व्यक्ति का पंचायत-पालिका अध्यक्ष होना या महापौर होना या मुख्यमंत्री या फिर प्रधानमंत्री होना लोकतंत्र के लिहाज से कोई मायने नहीं रखता? जैसा कि हमने ऊपर कहा कि बहुमत के लायक सीटें मिलने पर ही कोई व्यक्ति लोकतंत्र में मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री जैसे पदों पर पहुँचता है और उस व्यक्ति को सबसे ज्यादा लोगों का समर्थन हासिल होता है। यदि इस प्रक्रिया को पूर्ण करते हुए कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता है, तो उसे उस पद तक पहुँचाने वाले बहुसंख्य लोग मूर्ख कहलाएँगे? क्या उस व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ वोट देने वाले खतरे में पड़ जाएँगे?
मोदी फिलहाल प्रधानमंत्री तो नहीं हैं, लेकिन वे लोकतांत्रिक भारत के एक राज्य गुजरात के लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए मुख्यमंत्री हैं और इस आलोक में देखा जाए, तो अनंतमूर्ति का बयान संविधान की अवज्ञा से कमतर नहीं है, जो एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को लेकर इस प्रकार का बयान दे रहे हैं। यदि अनंतमूर्ति की आशंका सही मान ली जाए, तो फिर गुजरात में नरेन्द्र मोदी और भाजपा के पक्ष में वोट देने वाले 1 करोड़ 31 लाख 19 हजार 579 लोग मूर्ख हैं, नादान हैं। इसी प्रकार मोदी और भाजपा के अलावा कांग्रेस सहित अन्य दलों को वोट देने वालों की संख्या 1 करोड़ 42 लाख 97 हजार 466 है। इसका मतलब तो ये हुआ कि मोदी विरोधी मत या सोच रखने वाले गुजरात में खतरे में हैं।
इतना ही नहीं, अनंतमूर्ति की सोच के मुताबिक तो देश के वो करोड़ों लोग भी मूर्ख और नादान हैं, जो प्रत्येक सर्वेक्षणों में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखने की राय दे रहे हैं। चलिए मान भी लिया जाए कि सर्वेक्षण पूरे देश की तसवीर नहीं कहते, परंतु जिन दो-पाँच हजार लोगों की राय से यह सर्वेक्षण तैयार किए जाते हैं, कम से कम उन तमाम लोगों में केवल भाजपा समर्थक या मोदी समर्थक नहीं, बल्कि एक आम नागरिक की राय भी होती है।
वास्तव में ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता होने के बावजूद अनंतमूर्ति यदि इस प्रकार का बयान देते हैं, तो फिर उनमें और अमर्त्य सेन में क्या फर्क रह गया। नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य ने भी इसी प्रकार का कुतर्क किया था। अमर्त्य सेन ने कहा था कि वे नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते। सेन यदि इतना ही कहते, तो कोई आपत्ति नहीं थी। पहली बात तो यह है कि वे एक नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री हैं और यदि वे मोदी तथा उनसे जुड़े दंगों के साथ भारतीय नागरिकता को कसौटी पर रखें, तो मामला और गंभीर बन जाता है। उन्होंने कहा कि एक भारतीय नागरिक के रूप में वे मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं सकते।












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