ईरानी फ़िल्मकार मेहनाज़ ने भारतीय फ़िल्म समारोह में ऐसे किया ईरान को शर्मसार
मेहनाज़ मोहम्मदी 2008 में ईरान छोड़कर तुर्क़ी में बसने के कारणों पर बनाई अपनी डॉक्यूमेंट्री में मुख्य भूमिका निभा सकती थीं, क्योंकि वो आख़िरकार ख़ुद भी इस पलायन के लिए मजबूर हुईं.

ईरान की फ़िल्मनिर्माता और महिला अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाली ये कार्यकर्ता बीते सप्ताह इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल ऑफ़ केरल (IFFK) में 'स्पिरिट ऑफ़ सिनेमा' अवॉर्ड लेने के लिए भारत नहीं आ सकीं. इसकी वजह थी कुछ वक़्त पहले उनका ईरान से भागना. महनाज़ को भारत का वीज़ा नहीं मिल पाया.
हालांकि, भारत के दक्षिणी राज्य केरल में आयोजित हो रहे इस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में मेहनाज़ 'बालों के गुच्छे' के ज़रिए मौजूद रहीं. भारत में हिजाब पहनने की मांग के उलट ईरान की महिलाएं हिजाब पहनने के लिए अपने मुल्क़ की सख़्त नीतियों के विरोध में बालों के गुच्छे का ही इस्तेमाल करती रही हैं.
बीबीसी को ईमेल पर दिए साक्षात्कार में मोहम्मदी ने कहा, "जब आप बंदूक न उठाना चाहें और आप अपने लोगों को बचा भी न सकें, तब ये बाल 'महिलाओं की आज़ादी' की आवाज़ बनते हैं. इसका मतलब समाज के हर उसे हिस्से की ख़ुशी है, जो इसे मानता है."
उन्होंने कहा, "कटे बाल उस त्रासदी का प्रतीक हैं जिनका सामना हम हर पल हर दिन करते हैं. मेरी नज़रों के सामने भविष्य को ख़त्म किया जा रहा है. 23 साल के मोहसिन शेकरी को 8 दिसंबर को फांसी पर चढ़ा दिया गया. उसका ग़ुनाह विरोध करना था."
मोहम्मदी ने बताया कि जिस दिन ग्रीक फ़िल्मनिर्माता और IFFK की जूरी सदस्य एथीना रचेल ने उनकी जगह पुरस्कार लिया और बालों के उस गुच्छे पर दर्शकों से मिल रही सराहना का नज़ारा उन्हें दिखाया, तो 47 वर्षीय मेहनाज़ अपने आंसू नहीं रोक सकीं. ये पुरस्कार केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने दिया.
मोहम्मदी को मिला स्पिरिट ऑफ़ सिनेमा पुरस्कार
बीते साल IFFK में स्पिरिट ऑफ़ सिनेमा अवॉर्ड की शुरुआत उन फ़िल्म निर्माताओं को सम्मानित करने के मक़सद से हुई थी, "जो तमाम अड़चनों का सामना करने के बावजूद सिनेमा बनाना जारी रखते हैं."
मेहनाज़ मोहम्मदी कहती हैं कि प्रदर्शनकारियों के प्रति अपने रुख को लेकर उन्हें पहले से ही ये मालूम था कि वो भारत नहीं आ पाएंगी. उन्होंने कहा कि 'कभी-कभी राजनेता हमें ग़ुलाम समझ लेते हैं."
मोहम्मदी अपनी कई डॉक्यूमेंट्री और फ़िल्मों के लिए पुरस्कार जीत चुकी हैं. उनकी फ़िल्म 'सन-मदर' को 14वें रोम फ़िल्म फ़ेस्टिवल में स्पेशल जूरी अवॉर्ड मिला था. ये फ़िल्म 44वें टोरंटो इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी प्रदर्शित की गई थी.
मोह्म्मदी को पहली बार सुर्खि़यां 'वीमेन विदाउट शैडोज' नाम की एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म की वजह से मिली थी. ये फिल्म सरकारी 'शेल्टर होम' में रहने वाली बेघर और बहिष्कृत महिलाओं की ज़िदगी पर आधारित थी. इस फिल्म के रिलीज़ होने के बाद उन पर देश से बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी.
इससे ठीक एक साल पहले वो दूसरी महिला अधिकार कार्यकर्ताओं पर मुक़दमों के खिलाफ़ प्रदर्शन के लिए गिरफ़्तार की गई थीं. इस दौरान वो 26 साल की निदा आग़ा सुल्तान की क़ब्र पर श्रद्धांजलि देने गई थीं. निदा नाम की उस महिला को ईरान के महमूद अहमदीनेज़ाद के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन के दौरान गोली मार दी गई थी.
"ईरान सड़े-गले विचारों से भरी जेल"
साल 2014 में ईरान की सत्ता के खिलाफ़ विरोध के सुर बुलंद करने के लिए मोहम्मदी को 5 साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी.
वो बताती हैं, "अब तक की मेरी पूरी ज़िंदगी पाबंदियों के बीच गुजरी है. इस दौरान मिले अनुभवों के आधार पर मैं ये कह सकती हूं कि क़ैद में बीते उन सालों की कोई अहमियत नहीं, क्योंकि हम पैदा ही क़ैदनुमा इस्लामिक गणराज्य में हुए हैं. ये सड़े-गले और डरे हुए विचारों से भरी ऐसी जेल है जो अब तक दुरुस्त नहीं हो सकी है."
पूरे ईरान में तमाम महिलाएं आज सड़क पर हैं. ये उन सरकारी सख़्तियों का विरोध कर रही हैं जो हिजाब नहीं पहनने वाली महिलाओं पर बरती जा रही हैं. 24 साल की मेहसा अमीनी सिर्फ इसलिए मार दी गईं क्योंकि उसने हिज़ाब इस्लामिक सलीक़े के मुताबिक नहीं पहना था. इस घटना से ये बात छवि बनी कि सरकार की ऐसी सख़्तियों से पुरुष नहीं केवल महिलाएं प्रभावित होती हैं.
मोहम्मदी कहती हैं, "दोनों के बीच कोई तुलना नहीं. पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष लाभार्थी बनते हैं और कई बार वो इस सिस्टम के हथियार बनते हैं. पुरुष अगर कभी गुजरते भी हैं तो सिर्फ़ आर्थिक शोषण से लेकिन महिलाएं सिर्फ़ अपने जेंडर की वजह से बंधुआ बनकर रह जाती हैं."
मोहम्मदी बताती हैं, "ये सिर्फ हिजाब के मामले में नहीं है. हिजाब तो कई सारे भेदभाव का प्रतीक भर है. मेरे लिए हिजाब का बिलकुल अलग मतलब है. हिजाब हमारे ऊपर 7 साल की उम्र में ही स्कूल में थोपा गया था. इसका असर केवल हमारे शरीर पर नहीं हुआ, बल्कि इसने हमारे विचारों को भी ढंक लिया. ये ऐसे क़ायदे कानून बनाते हैं कि अगर आपने उनके विश्वास से अलग कुछ और सोचा भी तो आपको सज़ा दी जाएगी लेकिन आज ईरान का समाज ऐसी हर तरह की तानाशाही के खिलाफ खड़ा हो रहा है "
ईरान में चल रहे प्रदर्शनों पर मोहम्मदी कहती हैं, "प्रदर्शनकारी ये पूरी तरह समझ चुके हैं कि लोकतंत्र और महिलाओं के अधिकार 'इस्लामिक रिपब्लिक' जैसी धार्मिक व्यवस्था में मुमकिन नहीं. तब ये और भी नामुमकिन है जब सरकार बुनियादी मांगों पर ध्यान देने की बजाय प्रदर्शनों में गोलियां चलाती है, एक साथ सैकड़ों लोगों को गिरफ़्तार करने के साथ उन्हें यातनाएं देती है."
मोहम्मदी कहती हैं मोहसिन शेकारी को फांसी की सज़ा ईरान का आखिरी मामला नहीं है. "सरकार ने पहले ही एलान कर दिया है कि उनके पास फांसी की सज़ा दिए जाने वाले लोगों की लंबी सूची है. हमें ये कतई नहीं भूलना चाहिए कि 1980 के दशक में ईरान की जेलों में 5 हजार से अधिक लोगों को या तो फांसी पर लटका दिया गया या उन्हें गोली मार दी गई. आज मैं जिन प्रदर्शनकारियों को सड़क पर देख रही हूं, उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है. क्योंकि मौजूदा सरकार की तानाशाही ने उनके सामने कोई विकल्प नहीं छोड़ा. वो अपनी ज़िदगी में खुद ही संघर्ष कर रहे हैं. जिस तरह मौत का खतरा उठाकर ये लोग अन्याय के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं, वो क़ाबिल-ए-तारीफ़ है."
भारत के हिजाब विवाद पर क्या बोलीं मोहम्मदी?
हिजाब पहनने की ज़िद पर अड़ी भारतीय मुस्लिम छात्रों पर अपनी राय रखते हुए मोहम्मदी ने कहा- "हमें हिजाब का विरोध नहीं करना चाहिए. हमें महिलाओं के साथ खड़े होना चाहिए ताकि वो तय कर सकें कि उन्हें हिजाब पहनना है या नहीं."
मोहम्मदी ने कहा कि वो क़ुरान की विशेषज्ञ नहीं हैं लेकिन एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में उन्होने सिर ढंकने वाले कपड़ों के चलन के इतिहास के बारे में काफ़ी कुछ रिसर्च किया.
उनके मुताबिक़, "हिजाब का जिक्र क़ुरान में 5 जगहों पर मिलता है, जिसका मतलब काफ़ी व्यापक है. तो इसके लिए कोई समान्य कानून कैसे बना सकता है? मुझे लगता है हिजाब का मामला सिर्फ़ सिर ढंकने तक सीमित नहीं रह गया है. ये महिलाओं की पूरी ज़िंदगी को नियंत्रित करने का प्रतीक बन चुका है."
मोहम्मदी की ज़्यादातर फिल्में लोगों की पीड़ा को दर्शाती हैं. तो क्या वो इससे कुछ अलग तरह की फिल्में बनाना चाहती हैं?
इस सवाल पर मोहम्मदी बताती हैं, "एक इंसान होने के नाते मैं जिस पितृसत्तात्मक समाज में रहती हूं, उसमें महिलाओं की पीड़ा को पर्दे पर उतारा है. जिस दिन मैं पितृसत्तात्मक समाज की क़ैद से आज़ाद हो जाऊंगी, मैं ज़रूर इस पर भी फ़िल्म बनाऊंगी. "
पासपोर्ट एक्सपायर होने पर उनकी आगे की योजना क्या होगी, इस सवाल पर मोहम्मदी ने कहा "मैं एक ईरानी नागरिक हूं. मैं इसे हमेशा सहेज कर रखूंगी. अगर मैं बेमुल्क़ हो जाऊं तब भी."
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