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ईरान में हिजाब पर महिलाएं उठा रहीं आवाज, क्या ये सिर्फ पहनावे की लड़ाई है या एक नई क्रांति का आगाज?

Iran Hijab Protest: ईरान में हिजाब का मुद्दा अब केवल एक धार्मिक परिधान की बाध्यता नहीं, बल्कि महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। हाल ही में राजधानी तेहरान में अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले के दौरान ईरान के एक रूढ़िवादी नेता अली मोताहारी ने पत्रकारों से कहा, "हिजाब को लेकर सरकार की मौजूदा नीति कोई सख्त नियमों के पालन के लिए नहीं है।

अली मोताहारी ने बताया कि पुलिस को केवल गंभीर उल्लंघन की स्थिति में ही हस्तक्षेप करना चाहिए। उन्होंने कहा, "आपको पता होना चाहिए कि 1979 की क्रांति से पहले शाह के जमाने में भी अगर महिलाएं सार्वजनिक तौर पर ठीक से कपड़े नहीं पहनती थीं, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता था।"

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Iran Hijab Protest: ईरान में हिजाब के खिलाफ बगावत

अली मोताहारी का ये बयान ईरान में हिजाब के खिलाफ आवाज उठा रहीं महिलाओं के हक में था। हालांकि, मोताहारी उन रूढ़िवादी नेताओं में से एक हैं जो सितंबर 2022 में पुलिस हिरासत में जीना महसा अमीनी की मौत के बाद हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों से पहले प्रदर्शनकारी महिलाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते थे। ये महिलाएं हिजाब का विरोध करने के साथ ही ड्रेस कोड से जरा भी हटकर कपड़े पहनती थीं।

मोताहारी ने 2014 में बयान दिया था कि "औरतों को कोट के नीचे पैंट पहनने की अनुमति क्यों दी जा रही है?" उन्होंने अधिकारियों से ऐसी महिलाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की अपील की थी।

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान में हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया था। तब से अब तक यह नियम ईरानी महिलाओं के जीवन का एक अटूट हिस्सा बन चुका था। लेकिन सितंबर 2022 में 22 वर्षीय कुर्द महिला जीना महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत ने पूरे देश को हिला दिया। हिजाब सही ढंग से न पहनने के संदेह में गिरफ्तार की गई महसा की मौत ने उन भावनाओं को भड़काया जिन्हें दशकों से दबा कर रखा गया था।

ईरान में बदलाव की आहट: 'वुमन, लाइफ, फ्रीडम'

तेहरान की एक जेंडर रिसर्चर और पत्रकार ने डीडब्ल्यू से बात करते हुए कहा, "पिछले तीन सालों में हमने जो हासिल किया है, उसे अब सरकार हमसे छीन नहीं सकती है।" उन्होंने डीडब्ल्यू से उनका नाम ना छापने की अपील की क्योंकि उन्हें अकसर उनके विचारों के लिए सरकार से चेतावनी मिलती रहती है और अनजान लोग उन्हें जान से मारने की धमकी भी देते रहते हैं।

वह उन महिलाओं में से एक हैं, जो ना केवल सार्वजनिक रूप से हिजाब पहनने से इनकार करती हैं, बल्कि दूसरी महिलाओं को भी यह फैसला लेने के लिए प्रेरित करती हैं कि वह सच में हिजाब पहनना चाहती हैं या नहीं।

एक गौर करने वाली बात ये भी है कि जीना महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान में काफी बदलाव हुआ है। अब आम महिलाएं भी हिजाब का विरोध कर रही हैं। सबसे आश्चर्य करने वाली घटना 12 मई को देखने को मिला जब ईरानी लेखिका और कवयित्री, शिवा अरिस्तोई का जनाजा महिलाओं ने बिना हिजाब के उठाया।

ईरान में भी पारंपरिक रूप से जनाजा उठाना पुरुषों का काम माना जाता है। लेकिन "वुमन, लाइफ, फ्रीडम" (महिला, जिंदगी, आजादी) आंदोलन के बाद से अब अधिक से अधिक महिलाएं अनिवार्य हिजाब के बिना जनाजों में शामिल हो रही हैं और अपने प्रियजनों का जनाजा भी खुद उठा रही हैं।

Iran Hijab Protest में महिला पत्रकारों और लेखिकाओं की बढ़ती भूमिका

हालांकि अभी भी अधिकतर महिलाएं अंतरराष्ट्रीय मीडिया से दूरी बनाकर रखती हैं। ईरान में अंतरराष्ट्रीय मीडिया से किसी भी तरह का संपर्क रखना "शासन के खिलाफ प्रोपेगेंडा", "दुश्मन सरकार का सहयोग" और "विदेशी आदेश का पालन" तहत अपराध माना जाता है। और ऐसा पत्रकार, नीलोफर हमेदी के केस में देखने को भी मिला जिनको सरकार ने हाल में निशाना बनाया। 2022 में जीना महसा अमीनी की मौत पर रिपोर्ट करने के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय सराहना मिली थी।

बता दें कि नीलोफर हमेदी की रिपोर्ट ने पूरी दुनिया का ध्यान खिंचा। इसमें अमीनी के माता-पिता की एक तस्वीर भी थी जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई और पूरे देश में फैले विरोध-प्रदर्शनों की पहचान बन गई। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यह विरोध-प्रदर्शन ईरान का सबसे बड़ा आंदोलन बन गया।

हमेदी को 'शासन के खिलाफ प्रोपेगेंडा' और अन्य आरोपों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। जिसके बाद उन्हें 13 साल की जेल की सजा सुनाई गई हालांकि, 17 महीने बाद, जनवरी 2024 में उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। और फरवरी 2025 में ईरान के सर्वोच्च नेता, अयातोल्लाह अली खामेनेई ने उन्हें और उनकी सहयोगी, इलाहेह मोहम्मदी को माफ कर दिया।

देश को हिला देने वाली उस रिपोर्ट के 2,800 दिन बाद, 11 मई को एक बार फिर उनका नाम ईरान के प्रमुख फारसी अखबार, शरघ में एक लेख के साथ दिखाई दिया। नीलोफर हमेदी को अब ईरान में फिर से पत्रकार के रूप में काम करने की अनुमति मिल गई है। सरकार के पास इस बदलाव को रोकने की ताकत नहीं है'

ईराम में महिलाओ के पहनावे पर इलेक्ट्रॉनिक निगरानी का जाल

ईरान में महिलाओं के कपड़ों पर सार्वजनिक निगरानी के लिए भी एक विवादास्पद कानून लाने पर बहस चल रही है। इस कानून में उन महिलाओं के लिए सजाएं तय होंगी, जो सार्वजनिक रूप से हिजाब पहनने से इनकार करती हैं। इस कानून की ओर इशारा करते हुए महिला एक्टिविस्ट का कहना है कि, "सरकार के लिए अब समय को पलटना मुमकिन नहीं है"

संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक रिपोर्ट में पाया गया कि ईरान सार्वजनिक स्थानों पर अनिवार्य हिजाब पहनने से इनकार करने वाली महिलाओं के बारे में सूचना देने के लिए इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और जनता पर अधिक निर्भर हो रहा है, जबकि कट्टरपंथी लोग इस कानून का विरोध करने वालों के लिए कठोर दंड की मांग कर रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, "सितंबर 2022 में विरोध प्रदर्शन शुरू होने के ढाई साल बाद भी ईरान में महिलाओं और लड़कियों को कानून और व्यवहार में व्यवस्थित भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, जो उनके जीवन के सभी पहलुओं में व्याप्त है, विशेष रूप से अनिवार्य हिजाब के प्रवर्तन के संबंध में।"

ईरान में महिलाओं की बदलती सोच

ईरान एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ वे रूढ़िवादी शक्तियां हैं, जो दशकों पुरानी परंपराओं और नियंत्रण को बनाए रखना चाहती हैं। दूसरी तरफ हैं वो महिलाएं, जो अब अपने शरीर और जीवन पर पूर्ण स्वायत्तता चाहती हैं।

यह लड़ाई केवल हिजाब की नहीं है यह असल में पहचान, आज़ादी, और समानता की लड़ाई है। इस लड़ाई में महिलाएं पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अब यह ईरानी सरकार पर है कि वह समय की मांग को समझे या फिर इतिहास में खुद को एक ऐसे शासन के रूप में दर्ज कराए, जो अपने ही नागरिकों के खिलाफ खड़ा रहा।

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