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आजादी का अमृत महोत्सव : जानिए, मां भारती के सपूत जीत सिंह की शौर्यगाथा, हिमाचल में हुआ जन्म

Unsung Heroes की कहानी में आज बात हिमाचल के सपूत जीत सिंह की। 1919 में जन्मे जीत सिंह को सेकेंड वर्ल्ड वॉर में कई सालों तक कैद रखा गया था। जानिए, आजादी के बाद भारत लौटे जीत सिंह की कहानी

कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश), 31 जुलाई : भारत के स्वाधीनता संग्राम में असंख्य वीर विभूतियों का योगदान रहा है। देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। भारत सरकार ने इसे आजादी का अमृत महोत्सव बताया है। गत एक साल से आजादी के अमृत महोत्सव के तहत अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। इससे लोगों के बीच स्वतंत्रता के प्रति अलख जगाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी कड़ी में वनइंडिया हिंदी भारत की आजादी की लड़ाई में अतुल्य योगदान देने वाले गुमनाम वीर सपूतों के बारे में बता रहा है। आज कहानी जीत सिंह की।

देश सेवा का दुर्लभ सौभाग्य

देश सेवा का दुर्लभ सौभाग्य

1919 में जन्मे जीत सिंह ने 68 साल तक देश सेवा की। पिता हरि सिंह और माता कलावती के घर जन्मे जीत सिंह का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था, लेकिन जीत शारीरिक रूप से काफी मजबूत थे। जीत सिंह की शिक्षा पूरी नहीं हो सकी, लेकिन शारीरिक विशेषता के कारण उन्हें देश की सेवा करने का दुर्लभ सौभाग्य मिला।

देखिए, सपूत जीत सिंह की फाइल फोटो (सौजन्य- amritmahotsav.nic.in)

1940 में सेना में भर्ती

1940 में सेना में भर्ती

साल 1940 में जब बड़ी संख्या में सेना में भर्ती हो रही थी और लोगों को द्वितीय विश्व युद्ध के लिए तैयार किया जा रहा था, उसी समय जीत सिंह ने भी सेना में भर्ती होने का प्रयास किया। 1940 में जीत सिंह सेना में भर्ती हो गए और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इन्होंने अंग्रेजी सेना की ओर से लड़ाई लड़ाई लड़ी। हालांकि, जीत के रास्ते में कई चुनौतियां आने वाली बाकी थीं। इसी चैलेंज में एक जापान में जीत को बंदी बना लिया जाना भी था। लंबे अरसे तक कैद में रहने के बाद जीत आजादी के बाद भारत लौटे।

ऑल इंडिया INA कमेटी के सदस्य होने का प्रमाण (फोटो क्रेडिट-amritmahotsav.nic.in)

12 साल तक विदेशी जेलों में रहे

12 साल तक विदेशी जेलों में रहे

दरअसल, सेकंड वर्ल्ड वॉर के समय जीत सिंह को जापान में बंदी बना लिया गया। इसके बाद जीत को नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ने का सौभाग्य मिला। बतौर सिपाही आजाद हिंद फौज में भर्ती हुए जीत सिंह को बाकी आजादी के दीवानों की तरह शुरुआत में काफी यातनाएं झेलनी पड़ीं। 12 साल तक सिंगापुर और मलाया की जेल में रहे में । जीत सिंह के पारिवारिक साक्षात्कार में पता लगा कि जेलों के एक बाड़े में चारों तरफ करंट लगाकर खुला छोड़ दिया जाता था ताकि कोई भाग न सके। खाने के लिए बहुत कम भोजन मिलता था। कभी-कभी तो कई दिनों तक भोजन नहीं मिलने के कारण घास भी खाकर गुजारा करना पड़ता था।

देखिए बैंक अकाउंट की तस्वीर (फोटो क्रेडिट- amritmahotsav.nic.in)

37 साल पहले विदा हो गए जीत

37 साल पहले विदा हो गए जीत

वर्ष 1947 में भारत की आजादी के बाद जापान से भारत लौटे जीत सिंह जब घर बापस लौटे तो कलावती से उनकी शादी हुई। जीत ने जीवनयापन के लिए अमृतसर की एक कपडे की फैक्ट्री में काम शुरू किया। शुरुआती तौर पर उनको उस समय 25 रूपये पेंशन मिलती रही। 1967 में जीत सिंह को पक्षाघात यानी पैरालिससि अटैक आया। उनके शरीर का लगभग एक तिहाई हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। 18 साल तक जिंदगी और मौत की जंग लड़ने के बाद 1985 में जीत सिंह चिरनिद्रा में सो गए।

योगदान को सम्मान देखिए दुर्लभ फोटो (सौजन्य- amritmahotsav.nic.in)

योगदान को सम्मान

योगदान को सम्मान

भारत सरकार की ओर से स्वतंत्रता के चालीसवीं वर्षगांठ के मौके पर जीत के स्मरणीय योगदान में ताम्र पत्र भेंट किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जीत सिंह को मरणोपरांत ताम्र पत्र भेंट किया जिससे आजादी में इनके योगदान से युवा पीढ़ी भी रूबरू हो सके। अब आजादी के अमृत महोत्सव में भारत सरकार आजादी के गुमनाम दीवानों के बारे में सूचनाएं देने के लिए वेबसाइट का संचालन कर रही है। आजादी की 75वीं सालगिरह के मौके पर अमृत महोत्सव डॉट एनआईसी डॉट इन (amritmahotsav.nic.in) नाम का पोर्टल चल रहा है। यहां अनसंग हीरोज़ यानी गुमनाम सितारों और मां भारती के वीर सपूतों के बारे में जानकारी दी गई है।

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