भारत को तिब्बत की आजादी से ही मिलेगा चीन की दगाबाजी से छुटकारा, जानिए कैसे
नई दिल्ली- भारत को चीन की दगाबाजी से हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा चाहिए तो अब तिब्बत की आजादी का अभियान शुरू करने का समय आ गया है। क्योंकि, अब तिब्बत की आजादी में ही भारत की भलाई है। सच्चाई ये है भारत और चीन के बीच कभी कोई सीमा-विवाद रहा ही नहीं। चीन जिस जमीन के जरिए भारत में घुसपैठ करता है, वह कभी उसका हिस्सा था ही नहीं। वह तो तिब्बत की जमीन है, जिसपर 60 साल से भी ज्यादा वक्त से ड्रैगन कुंडली मारकर बैठा है और भारत, नेपाल और भूटान तक पर अपनी विस्तारवादी नजर गड़ाए हुए है। आइए समझते हैं कि क्यों अब तिब्बत की आजादी की मांग शुरू करने में भारत को फायदा ही फायदा है।

चीन जिस जमीन के जरिए भारत में घुसपैठ करता है वह तो उसकी है ही नहीं
अगर 1959 में विस्तारवादी चीन ने हिमालय की ऊंचाइयों पर स्थित खूबसूरत तिब्बत पर गैर-कानूनी कब्जा न किया होता तो आज भारत और चीन के बीच कोई सीमा विवाद ही न होता। भारत और चीन के बीच आज अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम से लेकर लद्दाख तक जितने भी सीमा विवाद हैं, उसकी वजह सिर्फ और सिर्फ यही है कि तिब्बत पर चीन ने जबर्दस्ती कब्जा कर रखा है और तिब्बत की कानूनी सरकार पिछले 6 दशकों से भी ज्यादा वक्त से भारत में निर्वासितों का जीवन बिता रही है। सच्चाई ये है कि भारत और चीन के बीच ऐसी कोई सीमा ही नहीं है, जिसको लेकर दोनों देशों में ऐसा कोई विवाद हो। सीमा तो भारत और तिब्बत के बीच की है, जो आज की नहीं हजारों वर्षों पुरानी है।

1559 में तिब्बत पर चीन के आक्रमण के चलते शुरू हुई समस्या
सेंट्रल तिब्बत एडमिनिस्ट्रेशन के प्रेसिडेंट लोबसैंग सैंगे भी अब वही बात दोहरा रहे हैं, जो उनके आध्यात्मिक गुरु और पूर्व शासकीय प्रमुख दलाई लामा पिछले 60 वर्षों से भी ज्यादा समय से कहते आए हैं। सैंगे ने हाल में भारत-चीन तनाव को लेकर कई इंटरव्यू दिए हैं। ईटी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि 'भारत ने कभी भी चीन के साथ सीमा साझा नहीं किया, यह तो भारत-तिब्बत सीमा है। तिब्बत ने तो हजारों वर्षों से भी ज्यादा वक्त तक बफर के रूप में भारत और चीन के बीच शांति के क्षेत्र के रूप में काम किया है। 1950 के दशक में तिब्बत पर चीन के आक्रमण के बाद यह स्थिति बदल गई है।' तिब्बत के प्रशासनिक प्रमुख ने बिना साफ शब्दों में कहे जो इशारा कर दिया है, वह एकमात्र यही है कि अब भारत को तिब्बत की मुक्ति का आंदोलन छेड़ना ही चीन से हमेशा के लिए छुटकारा पाने का एकमात्र जरिया बचा है। क्योंकि,चीन की विस्तारवादी मानसिकता के रहते उसके साथ कभी न तो एलएसी का निपटारा होना है और न ही कभी अंतरराष्ट्रीय सीमा का।
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तिब्बत की आजादी से ही मिलेगा चीन से छुटकारा
भारत के पास पूर्वी पाकिस्तान (हालांकि, पूर्वी हो या पश्चिमी पाकिस्तान तो हमेशा से भारत की ही अभिन्न हिस्सा था।) का उदाहरण मौजूद है। अगर भारत ने पूर्वी पाकिस्तान को सक्रिय सहयोग देकर बांग्लादेश नहीं बनाया होता तो क्या आज उसकी सीमा पर भी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख वाले हालात नहीं होते। बांग्लादेश बनने के साथ ही वह नासूर हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। हालांकि, बांग्लादेश की वजह से भी समस्याएं हैं, लेकिन पाकिस्तान की तुलना में वो कुछ भी नहीं हैं; और न ही बांग्लादेश से तिब्बत की तुलना ही की जा सकती है। इसलिए, इसमें दो राय नहीं कि अगर तिब्बत के लोगों को उनका अधिकार मिल जाय तो भारत की चीन के साथ जो भी मूल समस्याएं हैं, वह खुद ही खत्म हो जा सकती हैं। खासकर गलवान घाटी की घटना के बाद चीन ने भारत के उस कूटनीतिक मजबूरी को भी मिटा दिया है, जिसके चलते भारत, तिब्बत के मसले पर चीन के खिलाफ खुलकर उचित बात कहने से बचता था। आज भारत को वह मौका भी मिल गया है और उसी में उसकी भलाई भी नजर आ रही है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हैं भारत-तिब्बत के संबंध
अब एक नजर भारत और तिब्बत के ऐतिहासिक संबंधों पर डाल लेते हैं। तिब्बती उस बौद्ध परंपरा से जुड़े हैं, जिसकी पैदाइश तकरीबन 2,500 वर्ष पूर्व भारत में हुई है। यह देश ऐतिहासिक रूप से, भौगोलिक रूप से, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक रूप से हमेशा-हमेशा से भारत से जुड़ा हुआ है। जब से तिब्बत पर चीन ने अवैध कब्जा किया है, तिब्बत की पूरी की पूरी निर्वासित सरकार और लोग भारत में भारतीय के रूप में अपनी विशेष पहचान बनाए रखकर निवास कर रहे हैं। दलाई लामा खुद को भारत माता का बेटा कहते हैं। तिब्बत के लोग भी चाहते हैं कि भारत को अब तिब्बत के प्रति अपने कूटनीतिक नजरिए में बदलाव की जरूरत है, जिसमें दोनों ही देशों का कल्याण छिपा है।

ड्रैगन अपनी चालबाजी कभी बंद नहीं करेगा
यकीन मान लीजिए कि गलवान घाटी में पीएलए के 40 से भी ज्यादा (कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक) अफसरों और जवानों का खून पीकर भी ड्रैगन का भूख शांत नहीं रहने वाला। वह किसी भी वक्त कोई नया मोर्चा खोलने से परहेज नहीं करने वाला। क्योंकि, चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी की शी जिनपिंग सरकार उसी पीपुल्स रिब्लिक ऑफ चाइना के संस्थापक माओ जेडोंग या माओत्से तुंग के खतरनाक दिमाग की उपज है, जिसने 'हथेली और पांच उंगलियों' वाले विस्तारवादी सिद्धांत का बीज बोया था। लोबसैंग पहले से ही कह चुके हैं, 'जब तिब्बत पर कब्जा किया गया था, तब माओ जेडोंग और दूसरे चीनी नेताओं ने कहा, "तिब्बत तो हथेली है जिसे तो हमें कब्जा करके रखना ही है, उसके बाद हम पांचों उंगलियों के लिए आगे बढ़ेंगे।" पहली उंगली लद्दाख है। बाकी चार हैं- नेपाल, भूटान, सिक्कम और अरुणाचल प्रदेश। ' पिछले वर्षों में चीन ने इन सबके बारे में अपना एजेंडा जाहिर भी कर दिया है।
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