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India- Sri Lanka Fishermen issue: क्या सच में 2014 के बाद तेजी से बदल रहे हैं हालात?

भारत और श्रीलंका के बीच पांच दशक पहले हुए समझौते के बावजूद समुद्री विवाद रह-रहकर सुर्खियों में आता रहता है। पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका में जो घरेलू हालात हैं, शायद उस वजह से भी अभी यह स्थानीय राजनीति की दिशा मोड़ने के लिए सियासी हथकंडे की तरह इस्तेमाल होता रहता है।

लेकिन, अगर हम तुलनात्मक रूप से समझने की कोशिश करें तो पिछले एक दशक में फिर भी श्रीलंकाई नौसैनिकों पर हम लगाम कसने में ज्यादा सफल रहे हैं। अगर कोई भी भारतीय मछुआरा और उसकी नाव पकड़ लिए जाते हैं तो इतना भरोसा जरूर कायम हुआ है कि वह अपने देश लौटकर जरूर आएंगे।

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भारतीय मछुआरों की रिहाई हो रही है सुनिश्चित
यही वजह है कि अगर श्रीलंकाई नौसेना भारतीय मछुआरों खासकर तमिलनाडु और पुडुचेरी के मछुआरों को श्रीलंकाई समुद्री सीमा के कथित उल्लंघन के नाम पर पकड़ते भी हैं तो उनकी अब कानूनी प्रक्रियाओं की तहत तेजी से रिहाई मुमकिन हो रही है।

इस साल भी मछुआरों की सुरक्षित रिहाई का सिलसिला कायम
इसी साल जनवरी में दो बार में श्रीलंकाई नौसेना के हाथों कथित रूप से उसकी समुद्री सीमा के उल्लंघन के नाम पर पकड़े गए 21 भारतीय मछुआरों को पहले हफ्ते में रिहा करके भारत पहुंचाया गया। फिर तीसरे हफ्ते में वहां की जेलों में बंद 32 मछुआरे अपने देश वापस लौट सके हैं।

2014 से पहले 500 से ज्यादा मछुआरों की हुई थी मौत
तथ्य यह है कि 2014 के बाद से श्रीलंकाई नौसेना के हाथों बंदी बनाए गए भारतीय मछुआरों की तेजी से रिहाई ही नहीं सुनिश्चित की गई है, बल्कि पहले उनके हाथों हमारे मछुआरों की हत्याएं हो जाती थीं, जिसपर लगभग पूरी तरह से अब ब्रेक लग चुका है।

पिछले साल केंद्रीय मत्स्य राज्यमंत्री एल मुरुगन के हवाले से जानकारी सामने आई थी कि 2014 से पहले 500 से ज्यादा भारतीय मछुआरों की मौत हो गई थी।

यानी उन्हें हम बचा नहीं पाए थे। लेकिन, आज की तारीख में न सिर्फ हमारे मछुआरे सुरक्षित हैं, बल्कि यह निश्चित है कि वह जल्द से जल्द स्वदेश लौटकर जरूर आएंगे। आगे तीन ग्राफिक्स दिए हैं, जिससे जाहिर होता है कि पिछले 10 वर्षों में कैसी मछुआरों की सफल रिहाई सुनिश्चित की गई है।

ऐसा भी समय आया, जब एक भी भारतीय मछुआरे नहीं थे बंधक
आज की तारीख में क्या बदलाव आया, उसे समझने के लिए हमें 24 मार्च, 2023 को राज्यसभा में केंद्रीय विदेश मामलों के मंत्री से पूछे गए सवालों के जवाब को देखना पड़ेगा।

इसमें जब सरकार से श्रीलंका की जेलों में कैद भारतीय मछुआरों पर प्रश्न पूछा गया तो विदेश राज्यमंत्री वी मुरलीधरन ने स्थिति स्पष्ट कर दी।

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उन्होंने बताया कि 'अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के उल्लंघन और श्रीलंकाई जल क्षेत्र में मछली पकड़ने के कथित आरोपों में श्रीलंका सरकार भारतीय मछुआरों को अक्सर गिरफ्तार करती रहती है। बीते वर्षों में भी ये गिरफ्तारियां हुई हैं। लेकिन, सरकार की लगातार कोशिशों की वजह से इन सभी मछुआरों को रिहा करा लिया गया है; और फिलहाल, कोई भी भारतीय मछुआरा श्रीलंकाई हिरासत में नहीं है।'

सरकार की प्राथमिकता से बदल रही है तस्वीर
श्रीलंकाई सरकार के बर्ताव में आए बदलाव की वजह यह मानी जा सकती है कि भारतीय मछुआरे का मुद्दा इन वर्षों में दोनों देशों के सर्वोच्च स्तर पर उठाया गया है, जिसमें खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सितंबर, 2020 में वर्चुअल द्विपक्षीय सम्मेलन में हिस्सा ले चुके हैं।

केंद्र सरकार ने भारतीय मछुआरों की सुरक्षा और कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की कोशिश की है। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों को इस प्रक्रिया में शामिल किए जाने की पहल हुई है और उसका बेहतर परिणाम भी मिल रहा है।

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सवाल उठने से पहले मछुआरों की रिहाई हो रही सुनिश्चित
भारतीय मछुआरों की हिफाजत के लिए सरकार किस सक्रियता के साथ काम कर रही है, इसका उदाहरण पिछले साल लोकसभा में पूछे गए एक सवाल और उसके उत्तर में मिल सकता है।

28 जुलाई, 2023 को विदेश मामलों के मंत्रालय से श्रीलंका सरकार की ओर से 15 भारतीय मछुआरों और उनकी नावों को लेकर जानकारी मांगी गई। श्रीलंकाई नौसैनिकों ने एक बार फिर से उन्हीं रटे-रटाए आरोपों में नेदुनथीवु के पास से हमारे मछुआरों को 8 जुलाई, 2023 की रात को बंदी बना लिया था।

लेकिन, जब सरकार को 20 दिन बाद संसद में जवाब देने का मौका मिला तो उसने देश के सामने जो तथ्य रखा वह बदले हालात को बयां करने के लिए काफी है। सरकार ने बताया कि गिरफ्तार किए गए सभी 15 मछुआरे अब रिहा कराए जा चुके हैं।

कुल मिलाकर देश को यह तसल्ली मिली है कि पड़ोसी मुल्क को यह अंदाजा लग चुका है कि भारत अपने एक भी मछुआरे के जीवन से समझौता नहीं कर सकता।

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अगर श्रीलंका की नौसेना संभवत: स्थानीय राजनीति की वजह से भारतीय मछुआरों, खासकर तमिल मछुआरों को निशाना बनाने की गुस्ताखी करते तो उनके पास उन्हें सम्मानजनक तरीके से रिहा करने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं रह गया है।

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