Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

अमेरिका को चकमा देकर भारत ने किया था दूसरा परमाणु परीक्षण

आज से 25 साल पहले भारत ने पोखरण में अपना दूसरा परमाणु परीक्षण किया था. विवेचना में रेहान फ़ज़ल बता रहे हैं उस दिन क्या-क्या हुआ था.

एनडीए सरकार के सत्ता में आने के कुछ दिनों के अंदर ही नरसिम्हा राव ने नए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाक़ात कर कहा था, "सामग्री तैयार है. आप आगे बढ़ सकते हैं."

संसद में विश्वास मत प्राप्त करने के एक पखवाड़े के अंदर ही वाजपेयी ने डॉक्टर कलाम और डॉक्टर चिदंबरम को बुलाकर परमाणु परीक्षण की तैयारी करने के निर्देश दे दिए थे.

तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन 26 अप्रैल से 10 मई तक दक्षिण अमेरिकी देशों की यात्रा पर निकलने वाले थे. उनसे चुपचाप कहा गया कि वो अपनी यात्रा कुछ दिनों के लिए टाल दें.

डॉक्टर चिदंबरम की बेटी की शादी 27 अप्रैल को होने वाली थी. उस शादी को भी कुछ दिनों के लिए टाला गया क्योंकि शादी में चिदंबरम की ग़ैर-मौजूदगी से ये संकेत जाता कि कुछ बड़ा होने जा रहा है.

डॉक्टर कलाम ने सलाह दी कि विस्फोट बुद्ध पूर्णिमा के दिन किया जाए जो 11 मई, 1998 को पड़ रही थी.

ये भी पढ़ें:- पोखरण: जब कृष्ण ने उंगली पर उठाया पहाड़ को

वैज्ञानिकों को सेना की वर्दी पहनने को दी गई

भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) के शीर्ष वैज्ञानिकों को 20 अप्रैल, 1998 तक भारत के परमाणु विस्फोट करने के फ़ैसले के बारे में बता दिया गया था. उन लोगों ने छोटे-छोटे समूह में पोखरण की तरफ़ जाना शुरू कर दिया था.

उन लोगों ने अपनी पत्नियों को बताया था कि वो या तो दिल्ली जा रहे हैं या ऐसी जगह सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं जहाँ अगले 20 दिनों तक उनसे फ़ोन से संपर्क नहीं किया जा सकेगा.

मिशन को गुप्त रखने के लिए हर वैज्ञानिक नाम बदलकर यात्रा कर रहा था और सीधे पोखरण जाने के बजाए काफ़ी घूमकर वहाँ पहुँच रहा था. कुल मिलाकर बार्क और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान (डीआरडीओ) की टीम में कुल 100 वैज्ञानिक थे.

जैसे ही वे लोग पोखरण पहुँचे उन सबको सेना की वर्दी पहनने के लिए दी गई. उन सबको कम ऊँचाई वाले कमरों में ठहराया गया जिनमें लकड़ी के पार्टीशन लगे हुए थे और उन कमरों में मात्र एक पलंग रखने भर की जगह थी.

वैज्ञानिकों को सेना की वर्दी पहनने में दिक़्क़त हो रही थी क्योंकि उन्हें स्टार्च लगे कपड़े पहनने की आदत नहीं थी.

ये भी पढ़ें:- पोखरण-2 पर बढ़ा अंतर्विरोध - BBC News हिंदीhttps---www.bbc.com › 2009-09 › 0..-

टेनिस गेंद का धोखा

परमाणु बमों का कोडनेम था-'कैंटीन स्टोर्स'. बम विस्फोटों को हरी झंडी मिलने के बाद सबसे बड़ी समस्या थी कि किस तरह मुंबई के भूमिगत वॉल्ट में रखे इन बमों को पोखरण तक पहुँचाया जाए.

इन वॉल्ट्स को 80 के दशक में बनाया गया था और उन्हें हर साल विश्वकर्मा पूजा के दिन ही खोला जाता था.

उस दिन वैज्ञानिक और मज़दूर पूजा करके वॉल्ट्स के दरवाज़ों पर भभूत लगाते थे. कभी-कभी जब प्रधानमंत्री बार्क के दौरे पर आते थे तो उन्हें वो वॉल्ट्स दिखाए जाते थे.

एक बार थल सेनाध्यक्ष जनरल सुंदरजी को भी वो वॉल्ट दिखाया गया था. छह प्लूटोनियम बमों को गेंद की शक्ल में बनाया गया था जो कि टेनिस बॉल से थोड़ी-ही बड़ी थीं.

इन गेंदों का वज़न तीन से आठ किलो के बीच था. इन सबको एक काले बक्से में रखा गया था. इन बक्सों की शक्ल सेबों के क्रेट से मिलती-जुलती थी, लेकिन उनके अंदर पैकिंग इस ढंग से की गई थी कि पोखरण ले जाने के दौरान विस्फोटकों को कोई नुक़सान न पहुंचे.

बार्क के वैज्ञानिकों का सबसे बड़ा सिरदर्द था इन गोलों को अपने ही सुरक्षाकर्मियों को बिना बताए वहाँ से हटवाना. सुरक्षाकर्मियों को बताया गया कि कुछ ख़ास उपकरणों को दक्षिण में दूसरे परमाणु संयंत्र में ले जाना है. इसके लिए रात में विशेष गेट से ट्रकों का एक काफ़िला आएगा.

ये भी पढ़ें:- एक ऐसा मुल्क़ जिसने अपने परमाणु हथियार ख़ुद नष्ट कर दिए

चार ट्रकों से गोलों को एयरपोर्ट पहुँचाया गया

मुंबई में आधी रात के बाद भी काफ़ी चहल-पहल रहती है, इसलिए तय किया गया कि ट्रैफ़िक जाम से बचने और शक़ की गुंजाइश न छोड़ने के लिए सुबह 2 से 4 बजे के बीच इन ट्रकों को बुलाया जाएगा.

वरिष्ठ पत्रकार राज चेंगप्पा अपनी किताब 'वेपेंस ऑफ़ पीस द सीक्रेट, स्टोरी ऑफ़ इंडियाज़ क्वेस्ट टु बी अ न्यूक्लियर पावर' में लिखते हैं, "एक मई की सुबह तड़के चार ट्रक चुपचाप बार्क संयंत्र पहुँच गए. हर ट्रक पर पाँच सशस्त्र सैनिक सवार थे."

"ट्रकों पर आर्मर्ड प्लेट लगी हुई थी ताकि उस पर किसी तरह का बम हमला न किया जा सके. दो काले क्रेटों को दूसरे उपकरणों के साथ तुरंत एक ट्रक पर लाद दिया गया. डीआरडीओ टीम के एक वरिष्ठ सदस्य उमंग कपूर के मुँह से निकला, हिस्ट्री इज़ नाऊ ऑन द मूव."

ये चारों ट्रक तेज़ रफ़्तार से मुंबई हवाई अड्डे की तरफ़ बढ़े जो वहाँ से 30 मिनट की दूरी पर था.'

ये भी पढ़ें:- होमी भाभा की मौत परमाणु कार्यक्रम रोकने की साज़िश या हादसा थी?

एयरपोर्ट पर बिना उद्देश्य बताए पहले से ही सारे ज़रूरी क्लीयरेंस ले लिए गए थे. ट्रकों को सीधे हवाई पट्टी पर ले जाया गया जहाँ एक एएन 32 ट्रांसपोर्ट विमान उनका इंतज़ार कर रहा था.

हवाई जहाज़ के अंदर सिर्फ़ चार सुरक्षाकर्मियों को रखा गया था. बाहरी दुनिया को ये आभास दिया जा रहा था कि ये सेना का एक रुटीन मूवमेंट है.

किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उस विमान में जो कुछ रखा था वो पूरे मुंबई शहर को मिनटों में तबाह कर सकता था. सुबह तड़के एएन32 विमान ने मुंबई हवाई अड्डे से टेक ऑफ़ किया. दो घंटे बाद उसने जैसलमेर हवाई अड्डे पर लैंड किया. वहाँ पर ट्रकों का एक और काफ़िला उनका इंतज़ार कर रहा था.

हर ट्रक पर हथियारों समेत सैनिक बैठे हुए थे. जब वो ट्रकों से उतरे तो उन्होंने अपने हथियार तौलियों से छिपा लिए. पोखरण के लिए जैसलमेर हवाईअड्डे से जब ट्रक निकले तो सुबह हो चुकी थी.

राज चेंगप्पा लिखते हैं, "पोखरण में ये ट्रक सीधे 'प्रेयर हॉल' में पहुंचे जहाँ इन बमों को असेंबल किया गया. जब प्लूटोनियम गेंदे वहाँ पहुंच गईं तो भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष राजागोपाला चिदंबरम की जान में जान आई. वो उनका बहुत बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे.

उनको याद था कि इस बार चीज़ें 1971 की तुलना में कितनी अलग थीं. तब परमाणु डिवाइस को उन्हें ख़ुद अपने साथ पोखरण लाना पड़ा था."

ये भी पढ़ें:- जब बना था चाँद पर परमाणु बम फोड़ने का 'क्रेज़ी प्लान'

आर चिदम्बरम
Getty Images
आर चिदम्बरम

बिच्छू, बुलडोज़र और घिरनी

परीक्षण से कुछ दिन पहले बार्क के निदेशक अनिल काकोडकर के पिता का निधन हो गया था. उन्हें उनके अंतिम संस्कार के लिए पोखरण छोड़ना पड़ा, लेकिन काकोडकर दो दिन के अंदर ही पोखरण वापस लौट आए.

जिस दिन कुंभकर्ण शाफ़्ट को विस्फोट के लिए तैयार किया जा रहा था, एक सैनिक जवान के हाथ में बिच्छू ने डंक मार दिया. लेकिन उसने बिना शोर मचाए और मेडिकल सहायता लिए बग़ैर अपना काम जारी रखा. जब उसके हाथ में सूजन बढ़ गई तब लोगों का ध्यान उसकी तरफ़ गया और उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया.

'ताजमहल' शाफ़्ट में बालू निकाल रहे बुलडोज़र ने ग़लती से एक बड़े पत्थर को टक्कर मार दी जो बहुत तेज़ी से शाफ़्ट के मुँह की तरफ़ लगा. अगर वो शाफ़्ट के अंदर गिर जाता तो वहाँ लगे तारों का नुक़सान होना तय था.

एक जवान ने डाइव लगाकर उस लुढ़कते हुए बड़े पत्थर को 150 मीटर गहरे शाफ़्ट के अंदर जाने से रोका. चार और जवानों ने अपनी ज़िंदगी को ख़तरे में डालते हुए उस पत्थर को रोकने में अपनी पूरी ताक़त लगा दी.

परीक्षण से कुछ दिन पहले जब घिरनी यानी 'पुली सिस्टम' से शाफ़्ट को नीचे उतारा जा रहा था तो अचानक बिजली चली गई और वो लोग शाफ़्ट के अंदर फँसे रह गए. बिजली वापस आने में घंटों लग गए और उन लोगों ने आपस में चुटकुले सुनाते हुए अपना समय बिताया.

बार-बार बिजली का जाना काम में अड़चन पैदा कर रहा था. बिजली रहने पर भी उसमें बहुत उतार-चढ़ाव हो रहा था जिससे उपकरणों के जल जाने का ख़तरा लगातार बना हुआ था.

आख़िर में तय किया गया कि जेनेरेटर को जिसका कोडनेम 'फ़ार्म हाउस' था उस जगह शिफ़्ट किया जाए जहाँ काम चल रहा था.

ये भी पढ़ें:- 7000 परमाणु हथियार किस देश के पास?

तेज़ आँधी और बिजली गिरने का ख़तरा

पोखरण का मौसम भी वैज्ञानिकों के सामने परेशानी खड़ी कर रहा था. एक रात कड़कती बिजली के साथ भयानक तूफ़ान आया. सारे वैज्ञानिक कुछ ही समय पहले 'प्रेयर हॉल' से लौटे थे जहाँ वो परमाणु डिवाइस को असेंबेल कर रहे थे.

वैज्ञानिक एसके सिक्का और उनकी टीम के लोगों को चिंता थी कि अगर प्रेयर हॉल पर बिजली गिर गई तो उससे न सिर्फ़ डिवाइस को नुक़सान पहुंच सकता था बल्कि उनके समय से पहले फट जाने का ख़तरा भी था. एक रात इतनी ज़ोर से आँधी आई कि कुछ भी दिखना बंद हो गया.

प्रेयर हॉल में दुर्घटनावश आग लगने की आशंका से बचने के लिए एयरकंडीशनिंग की अनुमति नहीं दी गई थी और वैज्ञानिकों को बहुत मुश्किल परिस्थितियों में काम करना पड़ रहा था. गर्मी का आलम ये था कि वैज्ञानिक हमेशा पसीने से तर-ब-तर रहते थे.

मदद करने वाले स्टाफ़ को जान-बूझ कर कम रखा गया था, इसलिए सिक्का जैसे वरिष्ठ वैज्ञानिक भी स्क्रू कस रहे थे और तार ठीक कर रहे थे.

ये भी पढ़ें:- भारत-पाकिस्तान संबंध: क्या परमाणु हथियार ने दोनों देशों के बीच पारंपरिक युद्ध का ख़तरा टाल दिया है?

काकोडकर को पहचान लिया गया

जब ये सब तैयारियाँ चल रही थीं तो वैज्ञानिकों को पता चला कि पास में ही एक निजी कंपनी तेल खोजने के लिए खुदाई कर रही है. अनिल काकोडकर ने तय किया कि वो वहाँ जाएँगे और देखेंगे कि वो किस तकनीक से खुदाई कर रहे हैं.

काकोडकर अपनी आत्मकथा 'फ़ायर एंड फ़्यूरी' में लिखते हैं, "हम सब वहाँ सेना की वर्दी में पहुँचे. वहाँ काम करने वाले एक शख़्स ने मेरी टीम के एक सदस्य विलास कुलकर्णी को अलग ले जाकर मेरी तरफ़ इशारा करते हुए पूछा कि ये काकोडकर साहेब तो नहीं हैं?

कुलकर्णी ने उसे लाख समझाया कि मैं काकोडकर नहीं हूँ, लेकिन वो शख़्स कहता रहा कि मैं डोम्बीविली का रहने वाला हूँ और मैंने काकोडकर को कई बार देखा है. हमें लगा कि वहाँ से निकल जाने में ही भलाई है."

वहीं दूसरी तरफ़ दिल्ली में अचानक प्रधानमंत्री वाजपेयी ने वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को अपने यहाँ बुलवा भेजा.

यशवंत सिन्हा अपनी आत्मकथा 'रेलेंटलेस' में लिखते हैं, "वाजपेयी मुझसे अपने कार्यालय में नहीं मिले. मुझे उनके शयनकक्ष में ले जाया गया. मुझे तुरंत अंदाज़ा हो गया कि वो मुझे बहुत महत्वपूर्ण और गोपनीय बात बताने जा रहे हैं. जैसे ही मैं बैठा उन्होंने मुझे भारत के परमाणु परीक्षण की तैयारियों के बारे में बताया."

"उन्होंने कहा कि हो सकता है कि दुनिया की ताक़तें इसके लिए भारत के ख़िलाफ़ कुछ आर्थिक प्रतिबंध लगाएँ इसलिए हमें हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए, इसीलिए मैंने सोचा कि आपको पहले से इस बारे में ख़बरदार कर दूँ, ताकि जब ऐसा हो तो आप इसके लिए पहले से तैयार रहें."

अमेरिकी उपग्रहों की नज़र से बचकर

पोखरण में वैज्ञानिकों की टीम सिर्फ़ रात में ही काम कर रही थी ताकि ऊपर से गुज़रने वाले उपग्रह उन्हें देख न सकें. उन दिनों की तारों भरी रातें उनकी यादों का हिस्सा बन गई थीं.

राज चेंगप्पा लिखते हैं, "एक रात वैज्ञानिक कौशिक को रात में एक उपग्रह दिखाई दिया. तीन घंटे के अंदर उन्होंने चार उपग्रहों को वहाँ से गुज़रते हुए गिना. उन्होंने डीआरडीओ टीम के सदस्य कर्नल बीबी शर्मा से कहा, सर, लगता है उन्हें शक़ हो गया है कि हम कुछ कर रहे हैं, वर्ना एक रात में इतने सारे उपग्रहों के गुज़रने का क्या मतलब है? शर्मा ने कहा, हमें और सावधानी बरतनी चाहिए. हम कोई जोख़िम उठाना गवारा नहीं कर सकते."

सन् 1995 में जब नरसिम्हा राव ने परमाणु विस्फोट करने का फ़ैसला लिया था तो अमेरिकी उपग्रहों को ताज़ा बिछाए गए तारों से भारत के इरादों के बारे में पता चल गया था.

उस समय अमेरिकी उपग्रहों की नज़र शाफ़्ट को बंद करने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में बालू के इस्तेमाल पर भी गई थी. वहाँ पर बड़ी संख्या में वाहनों के मूवमेंट ने भी अमेरिकियों को सतर्क कर दिया था.

वर्ष 1998 में भी सीआईए ने पोखरण के ऊपर चार उपग्रह लगा रखे थे, लेकिन परीक्षण से कुछ समय पहले सिर्फ़ एक उपग्रह पोखरण की निगरानी कर रहा था और वो भी सुबह 8 बजे से 11 बजे के बीच उस क्षेत्र के ऊपर से गुज़रता था.

परीक्षण से एक रात पहले उपग्रह से प्राप्त चित्रों की समीक्षा के लिए सिर्फ़ एक अमेरिकी विश्लेषक की ड्यूटी लगाई गई थी. उसे पोखरण से खींची गई कुछ तस्वीरों को अगले दिन अपने अधिकारियों को दिखाने के लिए चुना भी था, लेकिन जब तक अधिकारी उन तस्वीरों का मुआयना करते तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

ये भी पढ़ें:- अमरीका: परमाणु पावर प्लांट पर साइबर हमला

दोपहर 3 बज कर 45 मिनट पर हुए विस्फोट

11 मई को परीक्षण वाले दिन एपीजे अब्दुल कलाम ने प्रधानमंत्री निवास पर ब्रजेश मिश्रा को फ़ोन कर बताया कि हवा की रफ़्तार धीमी पड़ रही है और अगले एक घंटे में परीक्षण किया जा सकता है. कंट्रोल रूम में प्लास्टिक स्टूल पर बैठे पोखरण में विस्फोट से जुड़े वैज्ञानिक बेसब्री से मौसम की रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे थे.

दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास में ब्रजेश मिश्रा बहुत नर्वस दिखाई दे रहे थे. वाजपेयी के सचिव शक्ति सिन्हा वाजपेयी के पास कुछ ज़रूरी फ़ाइलें लेकर आ रहे थे. उस दिन शक्ति सिन्हा का जन्मदिन भी था लेकिन वो जान-बूझ कर उन्हें बधाई देने वालों का मोबाइल कॉल नहीं ले रहे थे.

उधर पोखरण में मौसम विभाग की रिपोर्ट आ गई थी कि सब कुछ ठीक है. ठीक 3 बज कर 45 मिनट पर मॉनीटर पर लाल रोशनी आई और एक सेकेंड के अंदर तीनों मॉनीटरों पर चौंधियाने वाली रोशनी दिखाई दी.

अचानक सभी तस्वीरें फ़्रीज़ हो गईं, जो बता रहा था कि शाफ़्ट के अंदर लगाए गए कैमरे विस्फोट से नष्ट हो गए हैं. धरती के अंदर का तापमान लाखों डिग्री सेंटिग्रेड तक पहुंच गया.

'ताजमहल' शाफ़्ट में विस्फोट ने हॉकी के मैदान के बराबर बालू को हवा में उठा दिया. उस समय हैलिकॉप्टर से हवा में उड़ रहे डीआरडीओ के कर्नल उमंग कपूर ने भी धूल के सैलाब को उठते हुए देखा.

ये भी पढ़ें:- 'परमाणु बम का बटन मेरी डेस्क पर ही लगा है'

भारत माता की जय के नारे

नीचे वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि उनके पैर के नीचे धरती बुरी तरह से हिल रही है. वहाँ और देश भर में मौजूद दर्जनों सीस्मोग्राफ़्स की सुइयाँ बुरी तरह से हिलीं. वैज्ञानिक अपने बंकरों से निकलकर बाहर की तरफ़ दौड़े ताकि वो रेत की दीवार को उठने और गिरने के न भुलाये जाने वाले दृश्य अपनी आँखों से देख सकें.

सुरक्षित दूरी से ये दृश्य देख रहे सैकड़ों सैनिकों ने रेत का ग़ुबार उठते ही नारा लगाया 'भारत माता की जय.' वहाँ मौजूद वैज्ञानिक के संथानम ने बीबीसी को बताया, "पूरा मंज़र देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए."

ये भी पढ़ें:- हमने उड़ाया था सीरिया का परमाणु संयंत्र: इसराइल

चिदंबरम ने बहुत ज़ोर से कलाम से हाथ मिलाते हुए कहा, "मैंने आपसे कहा था हम 24 साल बाद भी ये काम दोबारा अंजाम दे सकते हैं."

कलाम के मुँह से निकला, "हमने दुनिया की परमाणु शक्तियों का प्रभुत्व समाप्त कर दिया है. अब एक अरब लोगों के हमारे देश को कोई नहीं कह सकता कि उसे क्या करना है. अब हम तय करेंगे कि हमें क्या करना है."

उधर प्रधानमंत्री निवास में फ़ोन के बग़ल में बैठे ब्रजेश मिश्रा ने पहली घंटी पर फ़ोन उठाया.

उन्होंने रिसीवर पर कलाम की काँपती हुआ आवाज़ सुनी, 'सर, वी हैव डन इट.' मिश्रा फ़ोन पर ही चिल्लाए, 'गॉड ब्लेस यू.'

ये भी पढ़ें:- सऊदी अरब बनाएगा पहला परमाणु रिएक्टर

पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा
Getty Images
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा

बाद में वाजपेयी ने कहा, "उस क्षण का वर्णन कर पाना मुश्किल है, लेकिन हमें अत्यंत ख़ुशी और पूर्णता का एहसास हुआ."

बाद में अटल बिहारी वाजपेई के सचिव रहे शक्ति सिन्हा ने अपनी किताब 'वाजपेयी द इयर्स दैट चेंज्ड इंडिया' में लिखा, "वाजपेयी मंत्रिमंडल के चार मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फ़र्नांडिस, यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह वाजपेयी के निवास में डायनिंग टेबिल के चारों ओर बैठे हुए थे. सोफ़े पर बैठे हुए प्रधानमंत्री वाजपेयी गहरी सोच में डूबे हुए थे. कोई किसी से कुछ नहीं बोल रहा था."

सिन्हा लिखते हैं, "वहाँ मौजूद लोगों के चेहरे पर ख़ुशी साफ़ पढ़ी जा सकती थी. लेकिन न तो कोई उछला और न ही किसी से किसी को गले लगाया या पीठ थपथपाई. लेकिन उस कमरे में मौजूद लगभर हर शख़्स की आँखों में आँसू थे.

"बहुत देर बाद वाजपेयी के चेहरे पर मुस्कान दिखाई दी थी. तनाव से मुक्त होने के बाद उन्होंने एक ज़ोर का ठहाका भी लगाया था."

ये भी पढ़ें:- उत्तर कोरिया ने दी परमाणु हमले की चेतावनी

दो दिन बाद दो और विस्फोट

उसके बाद वाजपेयी अपने घर से बाहर निकले थे जहाँ लॉन में सभी प्रमुख संचार माध्यमों के संवाददाता मौजूद थे. वाजपेयी के मंच पर पहुंचने से कुछ सेकेंड पहले प्रमोद महाजन ने उस पर भारत का तिरंगा झंडा रख दिया था.

उस मौके पर दी जाने वाली प्रेस ब्रीफ़िंग को जसवंत सिंह बहुत पहले तैयार कर चुके थे. वाजपेयी ने उस वक्तव्य में अंतिम समय पर एक संशोधन किया.

अटल बिहारी वाजयेपी
Getty Images
अटल बिहारी वाजयेपी

बयान का पहला वाक्य था, 'आइ हैव अ ब्रीफ़ अनाउंसमेंट टु मेक.' वाजपेयी ने अपनी कलम से ब्रीफ़ शब्द को काटा और फिर घोषणा की, "आज 3 बज कर 45 मिनट पर भारत ने तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए हैं. मैं इन सफलतापूर्वक परीक्षण करने वाले वैज्ञानिकों और इंजीनयरों को बधाई देता हूँ."

दो दिन बाद पोखरण की भूमि एक बार फिर हिली और भारत ने दो और परमाणु परीक्षण किए. एक दिन बाद वाजपेई ने घोषणा की, "भारत अब परमाणु हथियार संपन्न देश है."

ये भी पढ़ेंः-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+