स्पेस मिशन में भारत अग्रणी देशों की श्रेणी में, जानिये जीएसएलवी मार्क 3 को

श्रीहरिकोट। अतरिक्ष मिशन में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त कर ली। नवीनतम पीढ़ी के वजनी और भारी भरकम रॉकेट का सफलतापूर्वक परीक्षण करके दुनियाभर में भारत के वैज्ञानिकों ने अपना लोहा मनवाया है। वैज्ञानिकों की इस सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ने भी बधाई दी है।

gslv mark 3

राष्ट्रपति ने कहा, "मेरी तरफ से वैज्ञानिकों, इंजीनियरों तथा तकनीशियनों की आपकी टीम और इस अभियान में शामिल अन्य लोगों को हार्दिक बधाई। मैं आपके भविष्य के प्रयास के भी सफल होने की कामना करता हूं।" मोदी ने बधाई देते हुए अपने संदेश में कहा, "जीएसएलवी का सफल परीक्षण हमारे वैज्ञानिकों के परिश्रम और प्रतिभा का एक और उदाहरण है। आप सभी को प्रयासों के लिए बधाइयां।"

क्या है जीएसएलवी-मार्क 3
भारत ने जिस जीएसएलवी मार्क 3 का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है वह दरअसल एक भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण है जिसके जरिए रॉकेट का प्रक्षेपण किया जा सकेगा।
इस प्रक्षेपण से छोड़े गये रॉकेट में अपने साथ प्रायोगिक क्रू मॉड्यूल ले जाने की भी क्षमता है। यह क्रू मॉड्यूल मानवरहित है। नवीनतम पीढ़ी के इस अंतरिक्ष यान ने प्रक्षेपण के कुछ ही सेकंडों में खुद को दूसरे लांच पैड से अलग कर लिया और आकाश में सफलतापूर्वक उड़ान भरी।

क्या है लागत
भारत के सफल अंतरिक्ष यान में करीब 155 करोड़ रुपये की लागत आयी है। यह यान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की अंतरिक्ष में यात्रियों को भेजने की योजना का हिस्सा है। यह अपने साथ 3.7 टन वजनी क्रू मॉड्यूल भी लेकर गया है, जिसे क्रू मॉड्यूल एटमॉस्फेरिक री-एंट्री एक्सपेरिमेंट नाम दिया गया है। इसके जरिये अंतरिक्ष से धरती पर लौटने की तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है।

क्या है खूबी
दुनिया के अहम देशों के पास ही इस तरह का जीएसएलवी है जो कि भारी भरकम रॉकेट को लांच कर सके। इस यान का वजन 630 टन और लंबाई 43.43 मीटर है। इसरो के एक अधिकारी ने बताया कि इस क्रू मॉड्यूल का आकार एक छोटे से शयनकक्ष के बराबर है, जिसमें दो से तीन व्यक्ति आ सकते हैं।

इस यान से अपनी उड़ान के महज पांच मिनट बाद रॉकेट 126 किलोमीटर की ऊंचाई पर 3.7 टन वजनी क्रू माड्यूल से अलग हो गया। उसके बाद क्रू माड्यूल पृथ्वी की तरफ काफी तेज गति से गिरा। पृथ्वी से 80 किलोमीटर की ऊंचाई तक इसकी गति का नियंत्रण किया गया।

इसरो अध्यक्ष के.राधाकृष्णन ने कहा, "एक दशक पहले भारत ने रॉकेट विकास पर काम शुरू किया था और आज इसने अपना पहला परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। ठोस तथा द्रव्य इंजनों का प्रदर्शन उम्मीद के अनुकूल रहा।"

प्रयोग के तौर पर अंतरिक्ष में भेजे गए इस रॉकेट में वास्तविक क्रायोजेनिक इंजन नहीं है। उल्लेखनीय है कि क्रायोजेनिक इंजन ज्यादा दक्ष होता है, क्योंकि यह प्रति किलोग्राम प्रणोदक पर अपेक्षाकृत ज्यादा धक्का प्रदान करता है। यह अभी निर्माणाधीन है और इसके बनने में करीब दो साल का वक्त लगेगा। हालांकि, रॉकेट की संरचना के व्यावहारिक अध्ययन के लिए इसरो ने इसमें नकली क्रायोजेनिक इंजन लगाया है, जो अंतरिक्ष यान को ऊर्जा देने वाले वास्तविक क्रायोजेनिक इंजन की तरह ही है।

भारत के इस सफलता से हले 2010 में दो मिशन विफल हो चुके थे। तीसरे चरण का इंजन क्रायोजेनिक है। भारतीय वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जल्द ही वह अंतरिक्ष इंसान भेजने और वहां से उसे वापस लाने के अभियान में सफलता पाएंगे।

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