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लद्दाख में चीन से LAC को बचाने के लिए खानाबदोशों की रक्षा है बेहद जरूरी, जानिए क्यों

नई दिल्ली- अगर चरवाहे नहीं होते तो 1999 में करगिल में पाकिस्तान की हरकतों का पता लगते-लगते बहुत ही देर हो जाती। यही स्थिति आज लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण पर भी हो सकती है। वहां जो हालात बन गए हैं, उससे स्थानीय खानाबदोश जनजातियों की पहले से ही संकट में पड़ी आजीविका और ज्यादा खतरे में पड़ गई है। चीन ने उनके बहुत सारे चारागाहों पर दशकों पहले से ही धीरे-धीरे करके कब्जा जमा रखा है। अभी जो पूर्वी लद्दाख में पिछले 6-7 हफ्तों से संघर्ष की स्थिति बनी हुई है और 15 जून को जो खूनी झड़पें हुई हैं, उससे उनकी जिंदगी और भी चुनैतीपूर्ण हो गई है। लद्दाख पश्मीना बकरी पालने वाली एक अर्द्ध खानाबदोश जनजाति है- जंगपा। पिछले कुछ वक्त से उसके साथ यही हो रहा है। वो एलएसी पर अपनी सेना के लिए करगिल के चरवाहों की तरह आंख-कान और नाक हैं, लेकिन उन्हें चीन की दबंगई की वजह से वहां से पलायन करने की सोचनी पड़ रही है। ऐसे में ये जरूरी है कि एक तरफ भारतीय सेना अगर पीपुल्स लिब्रिशेन आर्मी के जवानों को धूल चटाने का माद्दा रख रही है तो स्थानीय प्रशासन और केंद्र सरकार को पश्मीना बकरियां पालने वाले उन खानाबदोशों की भी हर तरह से रक्षा करनी जरूरी है। क्योंकि, सीमा के ये आंख-कान और नाक बचे रहेंगे, तभी भारत को भी सुरक्षित रखने में आसानी होगी।

चीन की वजह से चंगपा खानाबदोशों पर संकट

चीन की वजह से चंगपा खानाबदोशों पर संकट

लद्दाख से छन-छन कर ऐसी खबरें आ रही हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की गतिविधियां बढ़ने से वहां खानाबदशों पर संकट के बाद मंडराने लगे हैं। चीन की बढ़ती दखलंदाजी के डर से खानाबदोशों ने अपना झुंड बेचना शुरू कर दिया है। एलएसी के आसपास के इलाकों से पलायन करने लगे हैं। लेह के नयोमा ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल की चेयरपर्सन उरगेन चोडॉन भी इस बात पर चिंता जता रही हैं कि अबतक की सरकारें कहीं न कहीं खानाबदोशों की हिफाजत कर पाने में नाकाम रही हैं। लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों में मौजूद खानाबदोशों के लिए उपयोगी चारागाहों की अनदेखी हुई है। स्थानीय लोगों के मुताबिक सच्चाई ये है कि इलाके की दुर्गमता के कारण चीन की घुसपैठ और भारतीय इलाकों पर अवैध कब्जे को वर्षों तक नजरअंदाज किया गया और पहले सीमावर्ती क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की बात कभी सोची ही नहीं गई। जबकि, चीन ने अपनी सीमा के इलाके में एक बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर लिया है।

बकरियों को चारागाहों तक ले जाना हुआ मुश्किल

बकरियों को चारागाहों तक ले जाना हुआ मुश्किल

लद्दाख की यह अर्द्ध खानाबदोश जनजाति चंगपा अपनी झुंड और पश्मीना बकरियों के लिए ही मशहूर हैं। चंगपा लद्दाख के पहाड़ों में डेरा डाले रहते हैं और पश्मीना बकरियों के लिए हरे चारागाहों की तलाश में अक्सर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के आसपास ही मंडराते रहते हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास ज्यादातर चारागाहों के इलाकों में चीनी सैनिकों की गतिविधियों के चलते इलाके के खानाबदशों की रोजी-रोटी पर संकट छा गया है। इन खानाबदशों की जिंदगी पूरी तरह से उसी हरे घास के मैदानों पर ही निर्भर हैं। इस समय जिस तरह से एलएसी पर चीन के साथ तनाव बढ़ा है उन्हें डर है कि उनके लिए बचे-खुचे घास के मैदानों में भी बकरियां ले जाना मुश्किल हो जाएगा। इलाके के लोगों को इस बात की चिंता सता रही है कि अगर भारत सरकार ने उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया तो वह लाचार होकर यहां से पूरी तरह से लेह जैसे पलायन करने को मजबूर हो जाएंगे।

पश्मीना के कारोबार पर भी आ सकता है संकट

पश्मीना के कारोबार पर भी आ सकता है संकट

एक अनुमान के अनुसार एलएसी पर तनाव की वजह से करीब 1,200 चंगपा परिवार हरे चारागाहों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इसके चलते चंगपा को अपनी बकरियों के साथ ज्यादा ऊंचाई वाले अधिक ठंडे इलाकों में ही रहना पड़ रहा है। पश्मीना के कारोबार से जुड़े लोगों के मुताबिक ज्यादा ठंडे वातावरण में रहने के चलते इस साल बकरियों की करीब 3,00,000 झुडें में से हजारों नवजातों की मौत हो गई। एक आंकड़े के मुताबिक इस साल इनके ब्रीडिंग सीजन में ही करीब 85 फीसदी नवजातों की मौत हुई है। इन बकरियों से हर साल करीब 45 टन ऊन निकलता है, जिससे विश्व प्रसिद्ध पश्मीना शॉल और दूसरे बेशकीमती ऊनी कपड़े बनते हैं, जिसकी कीमत हजारों डॉलरों तक पहुंच जाती है।

सेना की आंख-कान और नाक हो सकते हैं चंगपा खानाबदोश

सेना की आंख-कान और नाक हो सकते हैं चंगपा खानाबदोश

सच्चाई ये है कि चंगपा खानाबदोशों की जितनी जरूरत पश्मीना शॉल की वजह भारतीय अर्थव्यस्था के लिए है, उतनी ही वह चीन से सटे इलाके के लिए भारतीय सेना की आंख-कान और नाक भी हैं। चंगपा खानाबदोशों की एक खासियत ये भी है कि वो जिस भाषा या बोली में बात करते हैं, तिब्बत या चीन के इलाके की जनजातियां भी उसी भाषा में बाद करते हैं। यानि इलाके में चीन क्या हरकत करने वाला है, इसकी जानकारी एलएसी के दुर्गम इलाके के चप्पे-चप्पे से वाकिफ ये लोग ज्यादा आसानी से जुटा सकते हैं। यही वजह है कि आज से नहीं कई वर्षों से चीन अपने संचार माध्यमों के जरिए इस इलाके में अपना प्रोपेगेंडा करने की कोशिश में भी लगा रहा है। ऐसे में पहले ही पर्यावरण संकट झेल रहे ये चंगपा खानाबदोश अपना मूल स्थान छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे तो यह देश की सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है और सरकार को हर हाल में उनकी जरूरतों और आवश्यकताओं पर ध्यान देना होगा।

वर्षों पहले मिला था नए चारागाह विकसित करने का भरोसा

वर्षों पहले मिला था नए चारागाह विकसित करने का भरोसा

ऐसा भी नहीं है कि इलाके में चीन की चालबाजियां अचनाक शुरू हो गई हैं। आज तो चीन लद्दाख में पिछले कुछ वर्षों में भारत की ओर से इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने पर जोर दिए जाने से ही बौखलाया हुआ है। जबकि, वह पहले से ही इलाके पर गिद्ध दृष्टि लगाए हुए है। इस दशक की शुरुआत में भी चंगपा खानाबदोशों के लिए अलग से नए चारागाह विकसित करने की बात उठी थी और उस समय भरोसा भी दिया गया था कि फंड का जुगाड़ होने पर गांव वालों और खानाबदोशों के लिए नए चारागाह बनाए जाएंगे। अगर तब से लेकर अबतक उसपर वाकई ध्यान दिया गया होता तो आज चंगपा जनजाति मुश्किलों में फंसती, न ही पश्मीना शॉल की चिंता बढ़ती और न ही सुरक्षा एजेंसियों के लिए दुश्मनों की सूचना का एक अहम और मुकम्मल स्रोत के ही खत्म होने की स्थिति पैदा होती।

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