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भारत के रोज़गार संकट ने क्या एक पूरी पीढ़ी को 'नाउम्मीद' कर दिया है?

प्रतीकात्मक तस्वीर
Getty Images
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बजट-2022 की घोषणाएं बता रही हैं कि भारत का लक्ष्य अगले 5 साल में 60 लाख रोज़गार पैदा करना है.

ऐसे में जब भारत में बेरोज़गारी दर पिछले कुछ सालों में ज़्यादातर उभरती अर्थव्यवस्थाओं को पार कर गई है, ये लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा.

साल 2000 के दशक के मध्य की बात है, मेरठ के एक कॉलेज में छात्रों का एक समूह मज़ाक में अपने आपको 'नाउम्मीद पीढ़ी' के तौर पर बता रहा है.

सरकारी नौकरी हासिल करने की कोशिशों में जुटे इस ग्रुप के छात्र कहते हैं कि वो अपने ग्रामीण घर परिवार और शहर के सपनों के बीच कहीं अटके हुए हैं. छात्र कहते हैं, "हमारी ज़िंदगी तो बस टाइमपास बन गई है."

हाल के दो हफ़्तों में भारत में रोज़गार संकट साफ़ तौर पर दिखा है. मीडिया और लोगों का ध्यान भी बेरोज़गार युवाओं की तरफ़ एक बार फिर से गया है. ऐसे लाखों युवा जो अपनी शिक्षा से कहीं कम के स्तर पर काम कर रहे हैं, वो भारत के उत्थान की कहानी को चुनौती देते दिखते हैं.

बेरोज़गारी की समस्या जो 2000 के दशक के मध्य में भी दिखती थी, उस दौर से अब तक काफ़ी बढ़ चुकी है.

एक तरफ़ बेरोज़गारी की समस्या तेज़ होती दिख रही है तो मीडिया की सुर्ख़ियां ज़ोरदार प्रदर्शनों और नेताओं के भाषण के बीच कहीं झूलती दिखती है.

लेकिन अगर ध्यान से और बेरोज़गार युवाओं को लेकर सभी स्टीरियोटाइप बातों को हटाकर देखें तो हम पूछ सकते हैं कि आख़िर भारत में युवा रोज़मर्रा के स्तर पर क्या कर रहे हैं?

वो अपना समय कैसे बिताते हैं? उनका समाज से कैसा संबंध है? और वो कैसे भारत को बदल रहे हैं?

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सांकेतिक तस्वीर
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बेरोज़गार युवाओं के हाथ लगती है कई तरह की निराशा

पिछले 25 सालों में हमने बेरोज़गार युवाओं के अनुभव और कामकाज को लेकर रिसर्च किया है.

ये रिसर्च 18 से 35 साल के युवाओं के बीच उत्तर प्रदेश के मेरठ और उत्तराखंड के चमोली ज़िले में रहकर और काम करके तैयार किया गया है.

नतीज़ों में हमें सामाजिक पीड़ा की गहराई देखने को मिली है. बेरोज़गार युवाओं को कई तरह की निराशा हाथ लगती है. उनके पास पैसे की कमी है, अपने परिवार की उम्मीदों को वो पूरा नहीं कर सकते, अक्सर उनके साथ बर्ताव में सम्मान की कमी झलकती है और उनकी शादी में भी अड़चन देखने को मिलती है.

पुरुषों के पास अगर पक्की नौकरी (स्थायी नौकरी) नहीं है तो उन्हें कमतर आंका जाता है. उन्होंने अपनी पढ़ाई और जॉब खोजने में जितना समय बिताया है उसके बारे में वो ख़राब महसूस करते हैं.

साथ ही नौकरी, नागरिकता से भी जुड़ी है. बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो किशोरावस्था में ये सोचते हैं कि सरकारी नौकरी हासिल करके वे देश की सेवा करेंगे, जिसे हासिल कर पाना काफ़ी मुश्किल हो गया है.

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ऐसा भी देखने को मिल जाएगा कि कई बेरोज़गार लोग ख़ासकर पुरुष अलग-थलग पड़ गए हैं, उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है. वो ख़ुद के लिए बताते हैं कि वो 'कुछ नहीं करते' या टाइमपास करते हैं. ऐसा लगता है कि ख़ुद को 'नाउम्मीद' कहने वाली ये पीढ़ी हर जगह है.

लेकिन 'कुछ नहीं करते' जैसी बात करने वाले बेरोज़गार युवाओं को सिर्फ़ ऐसे नहीं देखा जा सकता कि वो कुछ नहीं कर रहे हैं.

भारत की सिविल सोसाइटी का आधार हैं युवा

हर रोज़ के कामकाज में युवा नज़दीकी से शामिल होते हैं. ये कुछ न कुछ काम खोज लेते हैं. ऐसा ज़रूरी नहीं कि ये काम हाई क्वॉलिटी का हो या उसमें इन युवाओं के सभी कौशल का इस्तेमाल हो, लेकिन इतना ज़रूर है कि इससे काम बन जाता है.

ये भी ख़ास बात है कि बेरोज़गार युवा अपने समुदाय के लिए काफ़ी कुछ कर रहे हैं. समाज का ये वर्ग भारत की सिविल सोसाइटी का मुख्य आधार बन गया है.

ऐसे युवा अक्सर सामाजिक बदलाव के माध्यम के तौर पर काम करते हैं. वो अपने गाँव-कस्बे में दूसरों के लिए वॉलेटिंयर या सहायक के तौर पर काम करते हैं.

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ये युवा दूसरों को बताते हैं कि सरकारी सेवाओं का इस्तेमाल कैसे करें. टेक्नोलॉजी, माइक्रोक्रेडिट, धर्म-कर्म से जुड़े कामकाज, पर्यावरण की देखभाल और विकास से जुड़े नए आइडियाज़ ये युवा सर्कुलेट करते हैं.

कभी-कभी इनका विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिलता है, लेकिन ज़्यादातर समय राजनीति से दूर इनका जुड़ाव सर्विस और इंफ्रास्ट्रक्चर के आसपास होता है. ये अपने इलाक़ों में स्कूल चाहते हैं, शिक्षक चाहते हैं.

कई बेरोज़गार युवाओं ने हमें एक बात बताई कि भले ही वो ख़ुद की मदद नहीं कर सकते हैं, लेकिन वो अपनी आने वाली पीढ़ियों की मदद कर सकते हैं.

ऐसी पीढ़ी जो अभी बच्चे हैं, किशोर हैं और अपने एजुकेशन या करियर के लिए विकल्प तय कर रहे हैं और उनका परिवार उन्हें समझाने में पूरी तरह कामयाब नहीं है - ऐसी पीढ़ी के लिए ये 18 से 35 साल के बेरोज़गार युवा ''बीच की पीढ़ी'' बन जाते हैं.

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यहाँ जो युवाओं की स्थिति बताई जा रही है है उसका ये मतलब नहीं है कि बेरोज़गारी को ''अच्छे तरीक़े'' से पेश किया जा रहा है.

इसका मतलब है देश के अलग-अलग कोने में रहने वाले बेरोज़गार युवाओं की ऊर्जा को बताना. जो भारत की आबादी में ऊर्जा के केंद्र के तौर पर समझे जा सकते हैं. ये बेरोज़गार युवा भारत और दुनिया के भविष्य के लिए काफ़ी अहम हैं.

नीतियां बनाने वालों से भी सवाल पूछना है कि कैसे युवाओं के इस समुदाय को बाहरी संगठनों के द्वारा सपोर्ट दिया जा सकता है?

शायद महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) का विस्तार करके ताकि युवा जिस तरीक़े की सामुदायिक सेवा अभी कर रहे हैं, उन्हें भी इसमें शामिल किया जाता है और एक संगठित ढाँचा बनाकर उन्हें मौका दिया जा सकता है.

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ऐसा भी तरीका खोजा जा सकता है कि बेरोज़गार युवाओं को उनके स्किल के साथ मान्यता दी जा सके और उन्हें काम मिल सके.

एक बात तो साफ है कि युवा तो मौके के लिए बेताब हैं.

(क्रेग जेफ़री और जेन डायसन मेलबर्न यूनिवर्सिटी में ह्यूमन भूगोल पढ़ाते हैं जेफरी भारत पर कई किताबों के लेखक हैं, जिनमें ''टाइमपास: यूथ, क्लास एंड द पॉलिटिक्स ऑफ़ वेटिंग इन इंडिया'' शामिल हैं. डायसन ''वर्किंग चाइल्डहुड: यूथ, एजेंसी एंड द एनवायर्नमेंट इन इंडिया'' के लेखक हैं.)

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