कोरोना काल में 3000 बच्चे हुए अनाथ, 26000 बच्चों ने माता-पिता में से किसी एक को खोया
नई दिल्ली, 08 जून। कोरोना महामारी ने देश में इस साल हजारो लोगों की जान ले ली है। नेशनल कमीशन फॉर चाइल्ड राइट की ओर से सुप्रीम कोर्ट में जो सपथ पत्र दाखिल किया गया है उसके अनुसार पिछले साल एक अप्रैल से 5 जून के बीच देश में 3621 बच्चे कोरोना की वजह से अनाथ हो गए, जबकि 26176 बच्चों ने अपने माता-पिता में से किसी एक को खो दिया जबकि 274 बच्चों को छोड़ दिया गया। कमीशन की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि बच्चों के माता-पिता की मौत सिर्फ कोरोना की वजह से नहीं हुई है, उनकी मौत अन्य वजहों से भी हुई है।

30071 बच्चों को देखभाल की जरूरत
कमीशन की ओर से कहा गया है कि 30071 बच्चों की देखभाल की जरूरत है, जिसमे 15620 लड़के, 14447 लड़कियां और चार ट्रांसजेंडर हैं। इनमे अधिकतर बच्चों की उम्र 8-13 वर्ष के बीच है। 13 साल से कम उम्र के कुल बच्चे 11815 हैं जबकि 5107 बच्चों की उम्र 4-7 वर्ष के बीच है। ये आंकड़ो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की ओर से एनसीपीसीआर की बाल स्वराज पोर्टल पर सुप्रीम कोर्ट के हाल के आदेश के बाद अपलोड किए गए थे।
अलग-अलग प्रदेश के आंकड़े
अगर अलग-अलग प्रदेश की बात करें तो महाराष्ट्र में सर्वाधिक बच्चे 7084 हैं जिन्हें देखभाल की जरूरत है। वहीं उत्तर प्रदेश में 3172 बच्चे, राजस्थान में 2481 बच्चों को देखभाल की जरूरत है। अन्य राज्यों की बात करें तो हरियाणा में 2438, मध्य प्रदेश में 2243 और केरल में 2002 बच्चों को देखभाल और सुरक्षा की जरूरत है। 28 मई को बच्चों की सुरक्षा का स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से ऐसे बच्चों के आंकड़े जारी करने को कहा था जो मार्च 2020 के बाद अनाथ हो गए। कमीशन की ओर से 31 मई को कोर्ट में शपथ पत्र दायर किया गया, जिसमे 29 मई तक के आंकड़े दिए गए थे। लेकिन दूसरे शपथ पत्र में संशोधित आंकड़ों को दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया सख्त रूख
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल और दिल्ली को इस मुद्दे पर सख्त लहजे में कार्रवाई करने को कहा। कमीशन की ओर से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज पेश हुए और उन्होने जस्टिस केल नागेश्वर राव और अनिरुद्ध बोस की दो जजों की बेंच को बताया कि ये दोनों राज्य बच्चों को लेकर आंकड़े अपलोड नहीं कर रहे हैं। जिसके बाद कोर्ट ने कहा आपने हमारा निर्देश देखा है, हमने कहा था कि 20 मार्च 2020 के बाद से बच्चों से जुड़े आंकड़े अपलोड किए जाए। हर राज्य को यह समझ आ गया था और उन्होंने यह आंकड़े अपलोड कर दिए। आखिर कैसे सिर्फ बंगाल को यह ऑर्डर समझ नहीं आया।
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