2050 तक किचन तक में दिखेगा जलवायु परिवर्तन का भारी असर, क्या है भारत की तैयारी?
बेंगलुरु, 01 दिसंबर। सुबह चाय-नाश्ता होते ही किचन से एक ही सवाल आता है, खाने में क्या पकायें? दौड़ती भागती जिंदगी में फंसे ज्यादातर लोग कह देते हैं, दोपहर को दाल-चावल खा लेंगे, और शाम को रोटी। निरंतर बढ़ती महंगाई ने पहले ही किचन का बजट बढ़ा दिया है, लेकिन अब आपका किचन 'जलवायु परिवर्तन' के दुष्प्रभावों से भी नहीं बच पायेगा। 2019 में संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध आईपीसीसी ने चिंता व्यक्त की थी कि जलवायु में हो रहे परिवर्तन के चलते भविष्य में अनाज का संकट गहरा सकता है। अब इस पर भारत सरकार भी चिंतित है, क्योंकि शीतकालीन सत्र के दौरान जो रिपोर्ट सदन में पेश की गई, उसने इस चिंता को गहरा दिया है। रिपोर्ट की मानें तो भारत में 2030 तक धान की पैदावार में 5-7 फीसदी तक कमी आ सकती है, वहीं गेहूं की पैदावार करीब 6 प्रतिशत तक कम हो सकती है।

क्या है वर्तमान परिस्थिति
निरंतर बदलते मौसम का ही प्रभाव है कि दक्षिण भारत में दिसंबर में भी भीर बारिश हो रही है, हालांकि पूर्वोत्तर मानसून दक्षिण में अक्टूबर-दिसंबर में ही एक्टिव होता है लेकिन इस बार जिस तरह से भारी बारिश से साउथ इंडिया परेशान है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। वैज्ञानिक इसके पीछे कारण 'जलवायु परिवर्तन' को ही बता रहे हैं। हर दूसरे-तीसरे दिन मौसम में हो रहे उतार-चढ़ाव की वजह से फसलें बर्बाद हो रही हैं। किसानों को पहले से कुछ पता नहीं चल पा रहा है और इसका सीधा असर धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, सरसों, आलू, कपास और नारियल जैसी फसलों पर पड़ रहा है। लोकसभा में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक 'जलवायु परिवर्तन' के कारण आलू का उत्पादन भी साल 2050 तक 6 प्रतिशत और साल 2080 तक 11 प्रतिशत तक कम हो सकता है।

खाद्यान्न की कमी चिंता का विषय
खाद्यान्न की कमी एक बड़ी चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि साल 2050 तक दुनिया की जनसंख्या आज की तुलना में 2 अरब अधिक होगी और विश्व को तब जितनी खाद्यान्न की जरूरत होगी वो आज की तुलना में 60 प्रतिशत ज्यादा होगा। चावल विश्व में सत्तर प्रतिशत लोगों की आबादी का भोजन है लेकिन इसकी पैदावार के लिए काफी जल की आवश्यकता होती है। लेकिन पिछले कई वर्षों से जलवायु परिवर्तन के कारण धान की पैदावार प्रभावित हो रही है। जलवायु परिवर्तन से तापमान, बारिश और हवा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की सांद्रता प्रभावित होती है, जिससे धान की फसल तैयार होने की अवधि लगातार घट रही है और यही नहीं किसान अभी भी परंपरागत साधनों पर निर्भर हैं। उन्हें सिंचाई के लिए अधिक पानी की आवश्कता होती है और लगातार कम हो रहे 'भूजल' की वजह से खेती पर असर पड़ रहा है। आपको बता दें कि इस समस्या का सबसे ज्यादा ग्रसित उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के क्षेत्र हैं, जिनकी स्थिति आने वाले वक्त में और विकट हो सकती है।

किन राज्यों के लिए बढ़ेगी चिंता?
पूरे देश में 36.95 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है। राज्यों की बात करें तो पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर चावल पैदा होता है। वहीं झारखंड में 71 प्रतिशत खेती धान की ही होती है। खरीफ सत्र 2016-17 में 109.15 मिलियन टन धान का उत्पादन हुआ, जो कि पिछले सत्र से 2.50 मिलियन टन (2.34%) ज्यादा था। कृषि निर्यात की बात करें तो भारत के बासमती और गैर बासमती दोनों चावलों की खुशबू पूरी दुनिया में फैली हुई है। 2020-21 में 35476.61 करोड़ रुपए का गैर बासमती और 29849.89 करोड़ रुपए का बासमती चावल निर्यात किया। खास बात यह है कि निर्यात का बड़ा हिस्सा इन्हीं राज्यों से आता है। मतलब साफ है कि इन राज्यों की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा चावल के निर्यात पर निर्भर है।
शीतकालीन सत्र में उठा सवाल
इस बारे में संसद के शीत कालीन सत्र में डीएमके सांसद डॉ. कलानिधि वीरास्वामी ने लिखित रूप में सवाल उठाया और सरकार से पूछा कि आने वाले इस संकट से निपटने के लिए भारत की क्या तैयारियां हैं? इस पर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने जवाब दिया कि 'सरकार स्थिति से वाकिफ है और इस बारे में उचित कदम उठाए गए हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने साल 2011 में 'एनसीआरए' नेटवर्क परियोजना की शुरुआत की थी, जिसके अध्ययन के आधार पर बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से धान, गेंहू जैसी कई फसलों की बर्बादी हो सकती है। सरकार इस अध्ययन के आघार पर उचित काम कर रही है।

अतिसंवेदनशील राज्यों और जिलों को चिन्हित किया गया
- सरकार ने 'भारत में अनुकूलन योजना के लिए संवेदनशीलता का आकलन' नामक एक रिपोर्ट जारी की है। जिसमें अतिसंवेदनशील राज्यों और जिलों को चिन्हित किया गया है।
- झारखंड, मिजोरम, ओडिशा, छत्तीसगढ़, असम, बिहार, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल में जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा खतरा है इसलिए इस ओर विशेष कारक्रम चलाए जा रहे हैं।
- आइसीएआर ने विशिष्ट लक्षणों के साथ कई फसलों की किस्में विकसित की है।
- रेडियो, टेलीविजन, प्रिंट और स्मार्टफोन के माध्यम से कृषि मौसम-संबंधी सूचना किसानों को हर पल दी जाए।
आम जन को भी सोचने की जरूरत
ये हैं कुछ चौंकाने वाले आंकड़ें हैं जिन्हें पढ़कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर उचित कदम नहीं उठाए गए तो किस हद तक भारत में किसानों की स्थिति खराब हो सकती है।फिलहाल इस बारे में सरकार और किसान के अलावा आम जन को भी सोचने की जरूरत है क्योंकि ये समस्या का सीधा असर उसी पर पड़ने वाला है।












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