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अंबेडकर को किया नजरअंदाज, लोकतंत्र को कुचला - अब संविधान की दुहाई दे रही है कांग्रेस?

आज कांग्रेस खुद को भारतीय संविधान की सबसे बड़ी रक्षक बताने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसका अपना इतिहास इस दावे से मेल नहीं खाता। डॉ. भीमराव अंबेडकर को लगातार दरकिनार करने से लेकर इमरजेंसी के दौरान लोकतांत्रिक संस्थाओं का गला घोंटने तक, कांग्रेस ने बार-बार संविधान और उसके मूल सिद्धांतों का अपमान किया है।

भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. बी.आर. अंबेडकर को कांग्रेस नेतृत्व ने कभी वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। न केवल उनके विचारों को खारिज किया गया, बल्कि उनके साथ राजनीतिक और व्यक्तिगत स्तर पर भी उपेक्षा की गई।

Congress BR Ambedkar

🔴 कांग्रेस ने डॉ. अंबेडकर को कभी नहीं दिया सम्मान

1930 में जब डॉ. अंबेडकर दलितों की आवाज बनकर लंदन के राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में गए, तब कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया। जब उन्होंने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की, तो गांधी जी और कांग्रेस ने इसका विरोध किया, यह कहते हुए कि वे ही पूरे भारत की - दलितों समेत - एकमात्र प्रतिनिधि हैं।

डॉ. अंबेडकर को संविधान सभा में कांग्रेस ने प्रवेश नहीं करने दिया। वे बंगाल और मुस्लिम लीग के समर्थन से ही सदस्य बन पाए। विभाजन के बाद जब उन्हें नए सिरे से सीट की जरूरत पड़ी, तब भी कांग्रेस ने अनिच्छा के साथ उन्हें बॉम्बे से जगह दी -वो भी इसलिए क्योंकि वे संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष थे।

🔴 हिंदू कोड बिल से लेकर चुनावी हार तक - कांग्रेस की अंबेडकर विरोधी राजनीति

देश के पहले कानून मंत्री के तौर पर जब अंबेडकर ने महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने वाला ''हिंदू कोड बिल'' पेश किया, तो कांग्रेस ने उनका समर्थन नहीं किया। खुद को उपेक्षित महसूस करते हुए अंबेडकर ने 1951 में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद 1952 और 1954 के चुनावों में कांग्रेस ने उनके खिलाफ उम्मीदवार उतारे। खुद नेहरू ने उन्हें हराने के लिए प्रचार किया और अंबेडकर दोनों बार हार गए। 1956 में उनके निधन पर न तो राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया, न कोई राजकीय सम्मान मिला, और न ही तत्काल कोई स्मारक बना। उनका संसद में चित्र तक बाद में जन आंदोलनों के दबाव में लगाया गया।

आज वही कांग्रेस उनकी तस्वीरें चुनावी मंचों पर लगाकर उनके आदर्शों की बात करती है -जबकि उसका अतीत इसके एकदम विपरीत है।

🔴 इमरजेंसी: भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय

25 जून 1975 को इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल ने लोकतंत्र की नींव को हिला दिया। यह 21 महीने का दौर इस बात की मिसाल बना कि जब सत्ता निरंकुश हो जाए, तो संविधान कैसे रौंदा जाता है।

  • नागरिक अधिकार निलंबित: हबीयस कॉर्पस जैसे मौलिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई, और न्यायपालिका को दबा दिया गया।
  • विपक्ष का दमन: 1 लाख से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जयप्रकाश नारायण और कई पत्रकार शामिल थे, को जेल में डाल दिया गया।
  • जबरन नसबंदी: संजय गांधी के नेतृत्व में करोड़ों गरीब और हाशिए पर खड़े लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई।
  • संविधान में बदलाव: कांग्रेस ने 42वां संशोधन पास कर संविधान की मूल आत्मा को बदले बिना जन राय लिए "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्दों को प्रस्तावना में जोड़ दिया।

🔴 अंबेडकर के सपनों से किया विश्वासघात

  • वंचितों का असली सशक्तिकरण नहीं: 50 साल तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस ने दलितों और आदिवासियों को केवल वादों में सशक्त किया, जमीनी बदलाव नहीं लाए।
  • चुनावी राजनीति में अंबेडकर को रोका: कांग्रेस ने कभी अंबेडकर की पार्टी (शेड्यूल कास्ट फेडरेशन) का समर्थन नहीं किया और उन्हें चुनावी तौर पर हाशिए पर रखा।
  • धार्मिक रूपांतरणों पर चेतावनी की अनदेखी: अंबेडकर ने दबाव में धर्म परिवर्तन के खिलाफ चेताया था, लेकिन कांग्रेस ने इस चेतावनी को नजरअंदाज किया और तुष्टिकरण की राजनीति को बढ़ावा दिया।

🔴 BJP ने अंबेडकर को दी असली श्रद्धांजलि

जहां कांग्रेस अंबेडकर के नाम पर केवल प्रतीकात्मकता करती रही, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उनके विचारों और योगदान को जमीनी स्तर पर मान्यता दी।

  • अंबेडकर स्मारक और पंचतीर्थ: बीजेपी सरकार ने अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, पंचतीर्थ और संविधान दिवस जैसी पहलों से उनकी विरासत को संरक्षित किया।
  • कल्याणकारी योजनाएं: स्टैंड-अप इंडिया, मुद्रा योजना, EWS आरक्षण जैसी योजनाएं दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के लिए बनाई गईं, जो अंबेडकर के सामाजिक न्याय के सपनों को साकार करती हैं।
  • राजनीतिक प्रतिनिधित्व: रामनाथ कोविंद जैसे दलित राष्ट्रपति और कई मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति ने बीजेपी की समावेशी नीति को दर्शाया है।

🔴 कांग्रेस को अपने अतीत से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए

RSS के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले द्वारा जब कांग्रेस से इमरजेंसी के लिए माफी मांगने को कहा गया, तो एक बार फिर यह सवाल उठा कि क्या कांग्रेस अब भी अपने अतीत का सामना करने को तैयार है?

आज संविधान की किताब हाथ में लेकर जो तस्वीरें सामने आती हैं, वे तब तक खोखली लगेंगी जब तक कांग्रेस अपने इतिहास - अंबेडकर के साथ किए गए व्यवहार और आपातकाल के काले अध्याय - से ईमानदारी से नहीं जूझती।

क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि कौन संविधान को ज्यादा दिखाता है, बल्कि यह है कि कौन मुश्किल वक्त में संविधान के मूल्यों के साथ खड़ा रहा।

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