तूफ़ान कैसा भी हो, आसमान का रंग बदल दे तो जानें: वुसअत का ब्लॉग

सांप्रदायिक हिंसा
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सांप्रदायिक हिंसा

ये बात है गुजरात के दंगों के दो वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव की, जब मैं बीबीसी पत्रकार की हैसियत से कई राज्यों से होता-हवाता अहमदाबाद के साबरमती आश्रम पहुंचा.

आश्रम के सुविडियर शॉप के इंचार्ज एक गांधीगीर बुज़ुर्गवार थे, वो बहुत प्यार से मिले. उनकी मुस्कुराहट को फ़ायदा उठाते हुए मैंने गुजरात में सांप्रदायिकता की स्थिति के बारे में उनकी राय जाननी चाही.

कहने लगे, जब आकाश में काले बादल छा जाएं तब उनकी गड़गड़ाहट से घबराना नहीं चाहिए. ये बादल गरजते-बरसते हैं और आगे निकल जाते हैं. मगर नीला आसमान अपनी जगह टिका रहता है.

गुजरात
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आज 14 साल बाद कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब मुझे साबरमती में मिले उन गांधीगीर बुज़ुर्ग की बात याद न आती हो.

इन 14 वर्षों में पाकिस्तान में आतंकवाद के घनघोर बादल आए, ख़ूब गरजे-बरसे और आगे बढ़ गए. कभी यूं लगा कि इस पाकिस्तान में शिया हज़ारा मुसलमानों से ज़्यादा हिंदू और क्रिश्चियन सुरक्षित हैं. मंदिर और गिरजे, मस्जिदों और इमामबाड़ों से ज़्यादा महफ़ूज़ हैं.

देश का सबसे बड़ा शहर कराची, लगभग दो दशक तक कोई ऐसा दिन देखने को तरस गया जब वहां रोज़ाना दस से बारह महाजिर पठान, बलोच और कुछ पंजाबी लाशें न गिरी हों.

दो करोड़ वासियों के इस शहर में बाहर निकलते समय ये यक़ीन नहीं आता था कि शाम को ज़िंदा हालत में घर लौटेंगे. मगर ये काले बादल भी न रहे औऱ रफ़्ता-रफ़्ता छंट गए. आज हालात कल से बहुत बेहतर हैं. मगर बहुत से मुद्दों पर खुलकर बात नहीं हो पाती.

कहीं किसी स्टेट या नॉन स्टेट एक्टर को बुरा न लग जाए. कहीं कोई और मेरी कही बात को कोई और मतलब निकालकर मुझ पर देश से ग़द्दारी या धर्म दुश्मनी का सर्टिफ़िकेट न थमा दे. मगर दिल फिर भी कहता रहता है, घबराओ नहीं वो दिन न रहे तो ये दिन भी न रहेंगे. भइया ऑल इज़ वेल...

नसीरुद्दीन शाह
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नसीरुद्दीन शाह

इंसान रफ़्ती तौर पर देखी-अनदेखी ज़जीरों में बांधा जा सकता है पर सोच को कौन बांध सका. ख़्याल के पर कौन काट सका. ख़्याल को फैलने से कौन रोक सका.

जब जब भी मैं ख़ुद को और अपने विचारों को को असुरक्षित समझने वाले अपने भारतीय दोस्तों से बात करता हूं तो उन्हें याद दिलाता हूं कि कड़े वक़्त का कोई धर्म या जाति सीमा नहीं होती. वो कभी भी किसी पर भी आ सकता है.

कल हम पर था, आज तुम पर है, कल तुम पर भी न रहेगा. बस ख़ुद को कायम रखना है और काले बादलों को आसमान नहीं समझना है. तूफ़ान भले ही कैसा हो, आसमान से उसका नीला रंग छीनकर गेरुआ या हरा कर दे, तब जानें.

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