Rail Budget: हुआ होता इस तकनीक पर काम तो आज हर ट्रेन होती बुलेट ट्रेन

कैब सिग्नलिंग-
'कैब सिग्नलिंग' ऐसी तकनीकि है जिस पर यदि मजबूती से काम किया जाता तो आज देश की हर ट्रेन लगभग बुलेट ट्रेन बन चुकी होती। ना सिर्फ रफ्तार बल्कि सुरक्षा के मायने में भी हम देश-दुनिया के सामने एक अचूक मॉडल रख पाते। 'कैब सिग्नल' रेलवे की सुरक्षा मानकों पर खरा उतरने वाला ऐसा सिस्टम भी है, जिसकी मदद से ट्रैक सेफटी, ड्राइविंग कंफर्ट व ब्लॉक-हट सम्बंधी सुरक्षा कारणों के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
ऐसे होता है प्रयोग-
इसकी सबसे बड़ी खूबी है कि यह दो ट्रेनों के बीच एक पर्याप्त गैप बनाए रखता है व इसके मानक के बाद घटने पर ऑटोमेटिक स्पीड स्लो हो जाती है व ब्रेकिंग सिस्टम सक्रिय हो जाता है। दुनिया में सबसे पहले इस तरह की सिग्नलिंग 1910 में यूके ने शुरु की थी, 1920 यूएस व 1940 नीदरलैंड जैसे देशों ने कैब सिग्नलिंग से रेल-व्यवस्था को मजबूती दी। ऐसा नहीं है कि भारत इसे करने से चूक गया हो। 2003 में गोवा में इस तरह का प्रयोग किया गया व मजबूत इच्छाशक्ति व प्रशासनिक
फेरबदल के चलते इस योजना को पंख नहीं लग पाए।
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मिले हैं जानकारों से सुझाव-
कभी सैम पित्रोदा समिति ने इस तरह की सग्नलिंग को 5 हजार स्टेशन इंटरलॉकिंग का सुझाव दिया था पर घाटे में सना रेलवे इस तरह की रोशन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। हालांकि कैब सिग्नलिंग सिस्टम एक तकनीकी मामला है जो शायद हम और आप उतना बेहतर तरीके से नहीं समझ सकते। इस सिस्टम की मदद से विभिन्न तरीके अपनाए जाते हैं जिससे सुरक्षा-सूचना का आदान-प्रदान होता है-
- Electric/Magnetic
- Inductive
- Coded track circuits.
- Transponder
- Wireless












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