पति ने छोड़ दिया, अपमान की आग में तप कर कुंदन बनी कोमल, आज हैं IRS अफसर

कोमल गनात्रा

कभी-कभी अपमान की आग इंसान को कुंदन बना देती है। तब एक ही जुनून होता है, कैसे आत्मसम्मान की रक्षा करें ? वह मुमकिन- नामुमकिन कुछ भी नहीं सोचता। बस एक धुन होती है, अपने वजूद को साबित करो। एक लड़की की शादी 15 दिन में टूट गयी। पति ने छोड़ दिया तो पड़ोसी ताना मारने लगे। सगे-संबंधी भी हंसने लगे। उसकी बदकिस्मती मजाक बन गयी। माता-पिता को भी शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही थी। लड़की का जीना मुहाल हो गया। खुद और परिवार को जिल्लत से बचाने के लिए एक दिन उसने घर छोड़ दिया। एक वैसे सुदूर गांव में डेरा डाला जहां उसे कोई जानता नहीं था। वह पढ़ी-लिखी थी। गांव के ही स्कूल में बच्चों को पढ़ाने लगी। अपमान के ज्वाला में जल रही लड़की कुछ करने के लिए बेचैन थी। उसे अपने धोखेबाज पति, समाज और खिल्ली उड़ाने वाले संबंधियों को जवाब देना था। उसके मन ने कहा, क्या एक स्त्री की पहचान उसका पति ही है ? वह खुद अपनी पहचान क्यों नहीं बना सकती ? शादी टूट जाने से जिंदगी खत्म नहीं होती। उसने तय किया कि यूपीएससी कम्पीट कर बड़ा अफसर बनना है। अफसर का रुआब ही उसके खोये हुए सम्मान को लौटा सकता है। तूफान के बीच दीया जलाने वाली इस लड़की का नाम है कोमल गनात्रा। वे 2013 बैच की IRS (इंडियन रेवेन्यू सर्विस) अधिकारी हैं।

कोमल गनात्रा

कोमल गनात्रा

ग्राम+पोस्ट - सावरकुंडला। जिला- अमरेली। राज्य- गुजरात। सावरकुंडला ही कोमल गनात्रा का पैतृक गांव है। उनके पिता शिक्षक थे। मां गृहिणी थीं। कोमल और उनके दो भाइयों की पढ़ाई गांव के ही स्कूल में हुई। शिक्षक पिता ने अपनी तीनों संतानों को हमेशा कुछ बेहतर करने के लिए प्रेरित किया। मैट्रिक पास करने के बाद कोमल का एडमिशन पॉलेटेक्निक कॉलेज में हो गया। कोमल ने इंजीनियरिंग का डिप्लोमा ले लिया तो उनके पिता ने कहा कि तुम और बेहतर कर सकती हो, कोशिश करो। कोमल की पढ़ाई गुजराती माध्यम से हुई थी। उसने गुजराती भाषा में ही ग्रेजुएशन करने की सोची। नियमित कॉलेज जाने में परेशानी थी। उन्होंने डॉ. बाबासाहेब अम्बेदकर ओपन यूनिवर्सिटी से गुजराती में बीए किया। रिजल्ट निकला तो उन्होंने यूनिवर्सिटी में टॉप किया। 2008 में उन्होंने गुजरात लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा पास कर ली थी। इंटव्यू बाकी था। इसी बीच उनके पिता ने एक अच्छा रिश्ता देख कर शादी तय कर दी । उनका विवाह रमेश पोपट से हुआ जो न्यूजीलैंड में रहते थे और वहीं व्यवसाय करते थे। एनआरआइ पति ने कोमल से कहा कि जब हमें न्यूजीलैंड में रहना है तो फिर गुजरात लोकसेवा आयोग का इंटरव्यू देने से क्या फायदा है। पति की बात मान कर उन्होंने इंटरव्यू नहीं दिया। वह जिंदगी के नये ख्वाब देखने लगीं। लेकिन जैसे ही ससुराल गयीं खुशियां काफूर हो गयीं। कोमल पर दहेज लाने के लिए दबाव शुरू हो गया।

शादी के बाद सदमा

शादी के बाद सदमा

शादी के 15 दिन बाद ही पति अकेले न्यूजीलैंड चले गये। रमेश पोपट ने कोमल को छोड़ दिया। तब उनके पैरों तले जमीन खिसक गयी। सपनों का महल धाराशायी हो गया। पति के धोखे से कोमल बिखर गयीं। न अफसर बन पायीं न विवाह का सुख मिला। इस हाल में और कहां जाती, सो अपने पिता के पास सावरकुंडला लौट आयीं। सोचा नये सिरे से जिंदगी शुरू करेंगी। पिता और भाइयों ने हौसला दिया। लेकिन सामाजिक विकृतियों ने उनका जीना दूभर कर दिया। पास-पड़ोस के लोग उनको देख कर कटाक्ष करते और परिवार के लिए अपशगुनी बताते। सगे-संबंधी भी परित्यक्ता कह कर ताना मारते। यह सब सुन कर कोमल को ग्लानी होने लगती। माता-पिता को भी शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही थी। दुखी कोमल का पीड़ा और बढ़ गयी। तब उन्होंने एक दिन घर छोड़ने का फैसला कर लिया। अपने घर से बहुत दूर भावनगर जिले के एक गांव में चली गयीं। इस गांव के प्राइमरी स्कूल में उन्हें सरकारी टीचर की नौकरी मिल गयी। उन्होंने टीचर ट्रेनिंग कर रखी थी। तनख्वाह थी पांच हजार रुपये। चूंकि इस गांव में उन्हें कोई जनता नहीं था इसलिए उन्होंने अपनी जिंदगी को नये सांचे में ढालना शुरू किया। स्कूल से आने के बाद वे पढ़ाई करने लगीं। अफसर बनने की तमन्ना फिर जोर मारने लगी। फरेबी और मतलबी लोगों को जवाब देने के लिए कुछ बड़ा करना जरूरी था। कोमल ने यूपीएससी की तैयारी शुरू की।

कोमल का संकल्प

कोमल का संकल्प

कोमल के लिए यूपीएससी की तैयारी पत्थर पर दूब उगाने की तरह थी। उस गांव में बिजली की हालत ठीक नहीं थी। प्रतियोगिता की तैयारी के लिए स्टडी मटेरियल की भारी कमी थी। जो भी पढ़ना था अपने दम पर पढ़ना था। उन्होंने यूपीएससी के लिए गुजराती साहित्य और इतिहास विषय का चयन किया। स्कूल से आने के बाद जो समय मिलता उसमें पढ़तीं। तीन बार यूपीएससी की परीक्षा दी लेकिन सफल नहीं हुईं। 2012 में चौथी बार परीक्षा देने के लिए कोमल ने जी-जान लगा दिया। उन्होंने अहमदाबाद के सरदार पटेल लोक प्रशासन संस्थान में दाखिला लिया। गुजरात सरकार का यह संस्थान यूपीएससी की तैयारी कर रहे प्रतिभागियों के मार्गदर्शन के लिए संचालित है। कोमल सोमवार से शुक्रवार तक स्कूल में पढ़ाती फिर शनिवार और रविवार को अहमदाबाद आ जातीं। सरदार पटेल संस्थान के मार्गदर्शन से उनकी तैयारी को धार मिला। भावनगर से अहमदाबाद की दूरी 171 किलोमीटर थी। आने जाने में सात घंटे लग जाते थे। ऐसे में स्कूल में पढ़ाना और खुद पढ़ना आसान न था। लेकिन एक जुनून था जो कमल को हर मुश्किल झेलने के लिए मजबूत बनाये हुए था।

कोमल का कमाल

कोमल का कमाल

2012 की यूपीएससी परीक्षा में कोमल ने गुजराती साहित्य और इतिहास विषय रखा था। जब उन्होंने मुख्य परीक्षा पास कर ली तो इंटरव्यू की चिंता होने लगी। गांव के एक प्राइमरी स्कूल की संघर्षरत टीचर। अंग्रेजी से कहने भर का वास्ता। कोई धड़ल्ले से अंग्रेजी बोलेगा तो क्या करूंगी ? ये खौफ उन्हें परेशान कर रहा था। तब कोमल ने फैसला किया कि वह इंटरव्यू भी गुजराती में देंगी। उन्होंने इंटरव्यू दिया। सब कुछ सामान्य रहा। वे उस गांव में लौट आयी जहां पढ़ाती थीं। कुछ दिनों के बाद जब रिजल्ट निकलने का समय आया तो उनका मन बेचैन रहने लगा। एक दिन अहमदाबाद से उनकी एक मित्र ने फोन किया, तुम सेलेक्ट हो गयी हो। इतना सुनना था कि कोमल बूत बन गयीं। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था। फिर उन्होंने अपनी मित्र से कहा, तुम रैंक मत बताना मैं खुद रिजल्ट देखूंगी। लेकिन जैसे ही वे स्कूल के कम्प्यूटर रूम में गयीं तो पाया कि बिजली नहीं है। वे एक घंटे तक वहीं बैंठी रहीं। जब बिजली आयी तो साइट खोल कर रिजल्ट देखा। 591 वीं रैंक मिली थी। कोमल ने कई बार रिजल्ट देखा। अपना और पिता का नाम मिलाया। रोल नम्बर मिलाया। भरोसा ही नहीं हो रहा था कि उन्होंने वह कर लिया है जिसके लिए वे तपस्या कर रही थीं। हां, उन्हीं का रिजल्ट था। फिर तो वे जोर से चिल्लाईं और रोने लगीं। ये खुशियों के आंसू थे जो उनके वजूद को जिंदा रखने के लिए निकल रहे थे।

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