उपचुनाव के नतीजे नरेंद्र मोदी और बीजेपी के लिए कितने चिंताजनक?
तीन लोकसभा और 29 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के नतीजों का एलान मंगलवार को हुआ.
इनमें बीजेपी ने 7 सीटों पर जीत दर्ज की, उनके सहयोगियों को 8 सीटों पर सफलता मिली. वहीं कांग्रेस के खाते में भी 8 सीटें गईं.
इन दोनों पार्टियों के अलावा टीएमसी को पश्चिम बंगाल की सभी 4 सीटों पर जीत मिली है. बाक़ी सीटों पर क्षेत्रीय पार्टियों का प्रदर्शन अच्छा रहा.
इन नतीजों के बाद कांग्रेस के खेमे में ख़ुशी की लहर है और बीजेपी खेमे में थोड़ी टेंशन.
कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने जनता के इस फ़ैसले को 2022 में पाँच राज्यों होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़ कर ट्वीट किया है.
इन नतीजों के बाद सबसे ज़्यादा चर्चा हिमाचल प्रदेश की हो रही है. जहाँ की तीन विधानसभा और एक लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की है.
हिमाचल प्रदेश में सत्तारूढ़ बीजेपी की हार के बाद चर्चा है कि वहाँ के मुख्यमंत्री बदले जा सकते हैं.
हाल ही में बीजेपी ने गुजरात और उत्तराखंड में अपना मुख्यमंत्री बदला है, जहाँ अगले साल विधानसभा चुनाव हैं.
हिमाचल प्रदेश में अगले साल नवंबर में विधानसभा चुनाव होना है. इस वजह से मुख्यमंत्री बदले जाने की चर्चा को बल मिल रहा है.
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हिमाचल में हार के मायने
हिमाचल प्रदेश, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का गृह प्रदेश है.
इसलिए वहाँ की हार से बीजेपी ज़्यादा निराश है. चुनाव के नतीजों के बाद असम, बिहार, तेलंगाना और मध्य प्रदेश में पार्टी को मिली जीत पर उन्होंने अलग-अलग ट्वीट किए. लेकिन हिमाचल और कर्नाटक पर चुप्पी साध गए.
हालाँकि हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार अश्विनी शर्मा कहते हैं, "उपचुनाव में बीजेपी की मिली हार को जेपी नड्डा से जोड़ना अतिशयोक्ति है."
"बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ना तो उपचुनाव में कैम्पन में के लिए हिमाचल आए और ना ही उनके इलाके में ये चुनाव हुए. नतीजों में केवल एक ही फ़ैक्टर काम किया, वो है - वीरभद्र सिंह. मरणोपरांत भी उन्होंने जनता को प्रभावित किया. इसलिए अब चर्चा मुख्यमंत्री को लेकर है. क्या जयराम ठाकुर आगे भी मुख्यमंत्री बने रहेंगे?"
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए जयराम ठाकुर के पक्ष में कई बातें हैं.
उन कारणों का जिक्र करते हुए अश्विनी शर्मा कहते हैं, "जयराम ठाकुर की छवि ईमानदार नेता की ही. काफ़ी मेहनत करके इस मुकाम पर पहुँचे हैं. वो जेपी नड्डा के क़रीबी भी है. एक समय में वो जेपी नड्डा को मुख्यमंत्री बनाने के लिए काम करते नज़र आ रहे थे. वो केंद्र में बीजेपी के दूसरे बड़े नेताओं की भी पसंद हैं."
लेकिन कौन सा मुख्यमंत्री चुनाव में जीत दिलाने का माद्दा रखता है, ये बात भी बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए बहुत मायने रखती है. मंडी, जयराम ठाकुर का गृह ज़िला है, जहाँ से बीजेपी चुनाव हार गई.
अश्विनी शर्मा आगे कहते हैं, "बीजेपी को अगर ये आभास हो जाए कि जयराम ठाकुर के रहते हिमाचल का विधानसभा चुनाव जीतना मुश्किल है, तो उन्हें बदलने में ज़रा भी नहीं हिचकेगी."
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कई दूसरे राज्यों की तरह हिमाचल प्रदेश हर पाँच साल में सत्ताधारी पार्टी को बदलने का ट्रेंड चला आ रहा है. बीजेपी की टेंशन इस वजह से भी बढ़ गई है.
सालों से बीजेपी को कवर कर रही, अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की पत्रकार निस्तुला हेब्बार कहती हैं कि बीजेपी को इन उपचुनाव के नतीजों से ज़रूर धक्का लगा है. खास तौर पर हिमाचल और कर्नाटक में.
हिमाचल प्रदेश के बारे में वो कहती हैं, "वीरभद्र सिंह की मौत के बाद बीजेपी को लगता है कि कांग्रेस की हालत वहाँ बहुत अच्छी नहीं है. इतनी दुर्बल कांग्रेस के सामने बुरी तरह से बीजेपी का चुनाव हारना दिखाता है कि लोगों के अंदर नाराज़गी तो है. वो नाराज़गी प्रदेश सरकार से है या केंद्र सरकार से - इसका आकलन बीजेपी को करना होगा."
हार के बाद पहली प्रतिक्रिया देते हुए जयराम ठाकुर ने कहा था कि कांग्रेस ने महंगाई को बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल किया. साफ़ है कि वो हार का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ रहे हैं.
लेकिन कुछ स्थानीय मुद्दे भी थे, जिस पर बीजेपी ने वादा तो किया लेकिन पूरा नहीं कर पाई, जिनमें से एक नेशनल हाईवे को चौड़ा करने से जुड़ा हुआ है.
केंद्र में हिमाचल के दो बड़े चेहरे हैं. एक राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और दूसरे अनुराग ठाकुर, जो सरकार में मंत्री भी हैं.
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बीजेपी के लिए मायने?
हिमाचल प्रदेश के बाद बीजेपी को कर्नाटक से मायूसी मिली.
कर्नाटक के उपचुनाव में एक सीट पर जीत और एक सीट पर हार मिली है. ये हार हंगल सीट पर हुई है.
ये सीट मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई के लिए बेहद अहम माना जा रहा था, क्योंकि यह उनके गृह ज़िले में थी.
बीजेपी ने कर्नाटक में हाल ही में बीएस येदियुरप्पा को हटा कर बासवराज बोम्मई को राज्य की कमान सौंपी थी.
मुख्यमंत्री बनने के बाद ये उनकी पहली परीक्षा थी, जिसे उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ा था.
निस्तुला कहती है, "बीएस येदियुरप्पा बीजेपी के पुराने धुरंधर नेता हैं, जिनकी जनता में अच्छी पकड़ मानी जाती है. उनको हटाकर बीजेपी ने सही फ़ैसला किया या नहीं - इस हार के परिप्रेक्ष्य में बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को दोबारा ये सोचने की ज़रूरत पड़ सकती है"
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शिवराज सिंह और हेमंत बिस्व सरमा हुए मजबूत?
दूसरी तरफ़ दो राज्य ऐसे हैं, जहाँ से बीजेपी को थोड़ी राहत भी मिली है.
असम में बीजेपी ने अपने सहयोगियों के साथ पाँचों सीटों पर चुनाव जीता. मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने इसका क्रेडिट पार्टी कार्यकर्ताओं और सरकार के कामकाज को दिया.
वहीं मध्य प्रदेश में भी बीजेपी का प्रदर्शन बुरा नहीं रहा. खास तौर पर जोबट सीट, जो 70 साल में दूसरी बार बीजेपी के खाते में गई है.
निस्तुला कहती हैं, "कर्नाटक से उलट मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पार्टी का पुराना चेहरा है. अक्सर सुनने में आता है कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व उनसे ख़ुश नहीं रहता. लेकिन उपचुनाव के नतीजे ये बताते हैं कि पूरे मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ही बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा अब भी हैं."
मध्यप्रदेश की राजनीति में उपचुनाव के नतीजों के बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल के काफ़ी कयास लगाए जा रहे है. कुछ स्थानीय नेता, जिन्हें शिवराज-विरोधी गुट करार दिया जाता है, उनकी बयानबाज़ी को सत्ता हथियाने की क़वायद के तौर पर देखा जा रहा था.
लेकिन अब माना जा रहा है कि शिवराज सिंह चौहान कुछ और दिन तक वहाँ मज़बूत स्थिति में हैं.
उसी तरह से हरियाणा के ऐलनाबाद सीट अभय चौटाला की जीत से भी बीजेपी राहत की सांस ले रही है.
अभय चौटाला ने केंद्र के कृषि कानूनों को लेकर राज्य विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था
बीजेपी का मानना है कि भले ही अभय सिंह चौटाला चुनाव जीत गए हैं, लेकिन उनकी जीत का अंतर अब पहले से कम हुआ है, जो बताता है कि किसान आंदोलन उतना बड़ा मुद्दा नहीं है.
इस बार अभय चौटाला 6 हज़ार से ज़्यादा मतों के अंतर से जीते, जो पिछली बार के मुकाबले 50 फ़ीसदी कम है.
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कांग्रेस के लिए मायने?
29 सीटों में से कांग्रेस को 8 सीटों पर जीत मिली है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसके बारे में ट्वीट कर इसे नफ़रत के ख़िलाफ़ जीत बताया.
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई कहते हैं, "कांग्रेस की जीत बहुत अहमियत नहीं रखती. हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में जीतना अच्छी बात है. पर उप-चुनाव और विधानसभा चुनाव में अंतर होता है. उपचुनाव मूलत: स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता है. अगर यही जीत गोवा जैसे छोटे राज्य के विधानसभा चुनाव में मिलती तो कांग्रेस के लिए बड़ी जीत कही जा सकती थी. या फिर मध्य प्रदेश में चारों सीट पर वो जीत जाते तो और बात होती. राजस्थान में दोनों सीटों पर जीत, से गहलोत मजबूत जरूर दिखते हैं, लेकिन उसमें वसुंधरा राजे सिंधिया के केंद्रीय नेतृत्व के साथ खींचतान का भी एक रोल है. उसी तरह से बिहार में कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार खड़े किए. लोकतांत्रिक रूप से वो ऐसा कर सकती थी, लेकिन राजनीतिक रूप से उन्हें नुक़सान हुआ. अगर वहाँ के नतीजे नीतीश के पक्ष में नहीं आते तो राजनीतिक खलबली मच सकती थी."
फ़िलहाल उपचुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस बीजेपी की चिंता से ख़ुश हो सकती है, लेकिन 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले दोनों दलों को लंबा सफर तय करना है.
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