निख़त, नीतू, स्वीटी और लवलीना: महिला बॉक्सरों ने कैसे लिखी गोल्डन कहानी

Sports: 12 साल की उम्र में निख़त ज़रीन निज़ामाबाद में एक एथलेटिक्स मीट में हिस्सा लेने गई थीं. तब वह एक कम उम्र की धाविका थीं जो दूसरी एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेती थीं.

महिला बॉक्सर
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12 साल की उम्र में निख़त ज़रीन निज़ामाबाद में एक एथलेटिक्स मीट में हिस्सा लेने गई थीं. तब वह एक कम उम्र की धाविका थीं जो दूसरी एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेती थीं.

निख़त ने वहां बॉक्सिंग के अलावा दूसरे कई खेलों में हिस्सा लिया, लेकिन उनकी नज़र एक बात पर ठहर चुकी थी.

वह अपने पिता मोहम्मद जमील अहमद के साथ वहां गई थीं, लिहाज़ा उन्होंने अपने पिता से ही पूछा, "बॉक्सिंग बस लड़के ही करते हैं क्या?" इस मासूम से सवाल के साथ निख़त का मुक्केबाज़ी से रिश्ता शुरू हुआ था.

बीते रविवार को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में निख़त ने वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया.

इतना ही नहीं उनके अलावा तीन अन्य महिला मुक्केबाज़ों ने भी गोल्ड मेडल जीतकर वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में चार गोल्ड मेडल जीतने के करिश्मे की बराबरी की.

रविवार को वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप के 50 किलोग्राम लाइट फ़्लाइवेट वर्ग के फ़ाइनल में निख़त ने वियतनाम की नगुएम थी टाम को एकतरफ़ा मुक़ाबले में 5-0 से हराया.

ये लगातार दूसरा साल है जब निख़त ज़रीन ने वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया है.

रविवार को ही लवलीना बोरगोहाईं ने अपने कांस्य पदक जीतने के सिलसिले को पीछे छोड़ते हुए गोल्डन कामयाबी हासिल की.

उन्होंने 75 किलोग्राम वर्ग में ऑस्ट्रेलिया की कैटलिन पार्कर को हराकर वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में पहली बार गोल्ड मेडल हासिल किया.

इन दोनों से एक दिन पहले नीतू घनघस ने 48 किलोग्राम मिनिमम वेट कैटेगरी का गोल्ड मेडल जीता था जबकि 81 किलोग्राम लाइट हैवीवेट कैटेगरी का गोल्ड मेडल स्वीटी बूरा ने जीता.

गोल्ड मेडल और शोहरत के साथ साथ इन मुक्केबाज़ों को इनाम के तौर पर 82.7- 82.7 लाख रुपये का चेक भी मिला.

इन चारों की गोल्डन कामयाबी के चलते वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप, 2023 में भारतीय टीम अंक तालिका में शीर्ष पर रही.

इस कामयाबी के बाद भारतीय मुक्केबाज़ी संघ के अध्यक्ष अजय सिंह ने रविवार को कहा, "ये ऐतिहासिक प्रदर्शन है. हमलोग लगातार बेहतर कर रहे हैं. लेकिन जो आत्मविश्वास आज देखने को मिला है, वह इससे पहले कभी नहीं दिखा था. कुछ खिलाड़ियों ने तो राउंड गंवाने के बाद वापसी की और आख़िरी दम तक संघर्ष जारी रखा."

उन्होंने भविष्य की उम्मीद की ओर इशारा करते हुए कहा, "जो मुक्केबाज़ यहां नहीं जीत सके उनमें आने वाले दिनों में वर्ल्ड चैंपियन बनने की क़ाबिलियत है. इनमें से कुछ ओलंपिक और वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में आने वाले दिनों के चैंपियन हैं."

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जब 2006 में बना था इतिहास

2006 के बाद ये पहला मौक़ा है जब भारतीय महिला मुक्केबाज़ों ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में चार गोल्ड मेडल हासिल किए हैं.

2006 में भारत पहली बार वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप की मेज़बानी कर रहा था, तब 46 किलोग्राम वर्ग में एमसी मैरीकॉम, 52 किलोग्राम वर्ग में सरिता देवी, 63 किलोग्राम वर्ग में जेनी आरएल और 75 किलोग्राम वर्ग में लेखा केसी ने भारत को गोल्डन कामयाबी दिलाई थी.

भारतीय महिला मुक्केबाज़ों के लिए पहला मौक़ा था जब उनकी चमक ग्लोबल स्तर पर दिखी थी.

वास्तविक मायने में 2006 की इन चैंपियन बॉक्सरों ने ही इंटरनेशनल स्तर पर भारतीय महिला मुक्केबाज़ों की कामयाबी की नींव रखी.

इसके बाद एमसी मैरीकॉम छह बार वर्ल्ड चैंपियन बनीं और उनकी इस कामयाबी ने भी भारत में महिला मुक्केबाज़ी को लोकप्रिय बनाया.

2012 के लंदन ओलंपिक के दौरान पहली बार महिला मुक्केबाज़ी को मेडल स्पोर्ट्स के तौर पर शामिल किया गया. लंदन ओलंपिक में एमसी मैरीकॉम ने फ़्लाइवेट कैटेगरी में भारत को कांस्य पदक भी दिलाया.

लेकिन भारत ये कामयाबी के सिलसिले को जारी नहीं रख पाया. भारतीय मुक्केबाज़ी संघ में प्रशासनिक मुश्किलों का दौर शुरू हो गया.

दिसंबर, 2012 में चुनाव प्रक्रिया में अनियमितता की शिकायत के बाद विश्व मुक्केबाज़ी संघ ने भारतीय मुक्केबाज़ी संघ की मान्यता निलंबित कर दी.

लगभग चार साल बाद भारत विश्व मुक्केबाज़ी संघ के प्रावधानों के मुताबिक़ अपना खेल संघ तैयार कर पाया.

इस दौरान भारतीय मुक्केबाज़ों का भविष्य अधर में लटका रहा. ना तो घरेलू स्तर पर टूर्नामेंटों का आयोजन हो रहा था और ना ही वे भारतीय झंडे के साथ इंटरनेशनल टूर्नामेंट में हिस्सा ले सकते थे.

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जब अधर में लटके मुक्केबाज़ों को मिला सहारा

2016 में स्पाइस जेट विमान कंपनी के संस्थापक और सीईओ अजय सिंह के नेतृत्व में नए सिरे से भारतीय मुक्केबाज़ी संघ का गठन हुआ और इसके बाद ही भारतीय मुक्केबाज़ी पटरी पर आयी.

अजय सिंह के नेतृत्व में भारतीय मुक्केबाज़ी संघ में आधारभूत सुविधाएं बेहतर हुईं और संघ के अंदर प्रोफेशनलिज़्म कल्चर विकसित हुआ. स्टेट और नेशनल चैंपियनशिप की शुरुआत हुई.

जब ये चैंपियनशिप शुरू हुईं तो इनमें अलग-अलग आयु वर्ग के लिए भी प्रतियोगिताओं का सिलसिला शुरू हुआ.

भारतीय मुक्केबाज़ी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के कोच और सपोर्ट स्टॉफ़ रखने की शुरुआत हुई. मुक्केबाज़ों को कहीं ज़्यादा एक्सपोज़र मिलने लगा और विदेशों में कैंप आयोजनों की शुरुआत हुई.

हालांकि ये कैंप एकदम परफ़ेक्ट थे, ऐसा नहीं माना जा सकता. लेकिन इससे खिलाड़ियों को अनुभव ज़रूर मिला. इसके बाद मुक्केबाज़ों, ख़ासकर महिला मुक्केबाज़ों ने दिखाया कि थोड़ी-सी मदद से वे क्या कमाल दिखा सकती हैं.

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लवलीना बोरगोहाईं
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वर्ल्ड रैंकिंग में चौथे पायदान पर भारत

मुक्केबाज़ी की वर्ल्ड रैंकिंग में भारत अभी चौथे पायदान पर है.

मुक्केबाज़ी की दुनिया में दबदबा रखने वाले अमेरिका, तुर्की, क्यूबा, ब्रिटेन और आयरलैंड की तुलना में भारत की रैंकिंग बेहतर है.

2020 टोक्यो ओलंपिक में भारत ने मुक्केबाज़ों का अपना सबसे बड़ा दल भेजा- पांच पुरुष और चार महिला मुक्केबाज़ों ने भारत की ओर से चुनौती रखी.

69 किलोग्राम वर्ग में लवलीना बोरगोहाईं ने भारत के लिए कांस्य पदक जीता. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भारतीय महिला मुक्केबाज़ों का प्रदर्शन बेहतर रहा है.

2022 की महिला बॉक्सिंग वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत को तीन मेडल मिले.

निख़त ज़रीन ने 52 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल हासिल किया, वहीं मनीषा मौन ने फ़ेदरवेट कैटेगरी और प्रवीण हुड्डा ने लाइट वेल्टरवेट कैटेगरी में कांस्य पदक हासिल किया. यह प्रदर्शन निश्चित तौर पर उत्साह बढ़ाने वाला था.

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भारत कर रहा था मेज़बानी

इस साल की वर्ल्ड चैंपियनशिप में दुनिया के सामने अपनी ताक़त दिखाने के लिए भारत के सामने मौक़ा था.

एक तो भारत को अपने घरेलू दर्शकों के सामने खेलने का मौक़ा मिल रहा था, दूसरी ओर चैंपियनशिप के दौरान क़रीब 100 करोड़ रुपये की इनामी रक़म दांव पर थी.

भारत ने इवेंट की सभी 12 कैटेगरी में अपने एक एक मुक्केबाज़ को उतारा.

टीम चयन को लेकर विवाद, रूस और बेलारूस को खेलने का मौक़ा देने के चलते 11 देशों की ओर से आयोजन का बहिष्कार और टूर्नामेंट को ओलंपिक क्वालिफ़िकेशन स्टेट्स का दर्जा नहीं मिलना- ये सारे मुद्दे भारतीय महिला मुक्केबाज़ों के शानदार प्रदर्शन के सामने दब गए.

दो बार वर्ल्ड यूथ चैंपियनशिप का ख़िताब जीत चुकी नीतू घनघस, मुक्केबाज़ी के गढ़ भिवानी से आती हैं.

उन्होंने 2022 के कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्ड मेडल जीत कर अपने इरादे जता दिए थे. 2023 वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में उन्होंने आक्रामक शुरुआत की, पहले तीन मुक़ाबले तो उन्होंने इस अंदाज़ में जीते कि रेफ़री को मैच रोकना पड़ा.

सेमीफ़ाइनल में उनके सामने शीर्ष वरीयता प्राप्त अलुअ बल्किबेकोवा थीं. पिछली बार बल्किबेकोवा ने नीतू घनघस को हराया था और बाद में सिल्वर मेडल हासिल करने में कामयाब रही थीं.

हार का बदला चुकाते हुए नीतू ने सेमीफ़ाइनल मुक़ाबला 3-2 से जीत लिया. फ़ाइनल मुक़ाबले में नीतू घनघस के हीरो और भारत के स्टार मुक्केबाज़ रहे विजेंदर सिंह भी दर्शक दीर्घा में मौजूद थे.

उनकी मौजूदगी में नीतू ने मंगोलियाई लुत्सैईकान अल्तांत्सेत्से को 5-0 से हरा कर अपना पहला वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल हासिल किया, वो भी गोल्ड.

इस कामयाबी के बाद नीतू घनघस ने मीडिया से कहा भी, "पिछले साल मैं मेडल नहीं जीत पायी थी, इसलिए इस बार मैंने अपनी ख़ामियों पर काम किया और घरेलू दर्शकों के सामने मेडल हासिल किया."

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स्वीटी बूरा और लवलीना बोरगोहाईं का प्रदर्शन

वहीं दूसरी ओर स्वीटी बूरा के लिए ये गोल्ड मेडल नौ साल लंबे संघर्ष के बाद आया है. ये उनके करियर सबसे अहम लक्ष्य में एक रहा था. 2014 में जेजू सिटी चैंपियनशिप में बूरा ने सिल्वर मेडल हासिल किया था.

ये जानना भी दिलचस्प है कि कोरोना संकट के दौरान बूरा बॉक्सिंग छोड़कर अपने स्कूली दिनों के खेल कबड्डी की ओर मुड़ गयी थीं.

कुछ महीनों तक बॉक्सिंग से दूर रहने के बाद बूरा को एहसास हुआ कि मुक्केबाज़ी ही उनका प्यार है.

वह नये उत्साह के साथ बॉक्सिंग की दुनिया में लौटीं और अपनी फ़िटनेस पर काफ़ी काम किया. बूरा ने गोल्ड मेडल जीतने के लिए 2018 की वर्ल्ड चैंपियन वैंग लीना को हराया.

30 साल की बूरा ने बताया, "वर्ल्ड चैंपियन बनने का सपना पूरा होने से मैं रोमांचित हूँ. मुक़ाबला अच्छा रहा और मैंने अपनी योजना के मुताबिक़ ही काम किया. टूर्नामेंट जैसे जैसे आगे बढ़ा मेरा खेल सुधरता गया और शरीर ने भी इस दौरान तालमेल बिठा लिया था."

लवलीना बोरगोहाईं के लिए ये भी वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में पहला गोल्ड मेडल रहा.

असम की लवलीना इससे पहले तीन बड़े टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीत चुकी हैं, ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के अलावा 2018 और 2019 की वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीता था.

नई दिल्ली में होने वाले वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में लवलीना कांस्य पदक के रंग को बदलना चाहती थीं.

हालांकि टोक्यो ओलंपिक के बाद उनका फ़ॉर्म थोड़ा कमतर हुआ था. 2022 की वर्ल्ड चैंपियनशिप में लवलीना प्रीमियर क्वार्टर राउंड से आगे नहीं बढ़ सकी थीं और बर्मिंघम कॉमनवेल्थ खेलों में भी उनका सफ़र क्वार्टर फ़ाइनल तक ही रहा.

लवलीना इस बार कहीं ज़्यादा वेट कैटेगरी में खेलने उतरीं और शानदार प्रदर्शन किया. हालांकि यह इतना आसान भी नहीं था. फ़ाइनल में तो एक राउंड गंवाने के बाद उन्होंने वापसी की.

मुक़ाबले के बाद उन्होंने कहा, "मज़बूत मुक्केबाज़ से मुक़ाबला था. लिहाज़ा हम लोगों ने उस हिसाब से रणनीति बनाई थी. पहले दो राउंड में आक्रामक खेलने के बाद आख़िरी राउंड में काउंटर अटैक पर ध्यान देना था. 2018 और 2019 में मैंने कांस्य पदक जीता है. लिहाज़ा पदक का रंग बदलने से अच्छा महसूस हो रहा है."

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निख़त की चुनौती और वो सवाल

निख़त ज़रीन भी बदली हुए वेट कैटेगरी यानी 50 किलोग्राम वर्ग में क़िस्मत आज़माने उतरी थीं. इस वेट कैटेगरी में ही वह पेरिस ओलंपिक में हिस्सा ले सकती हैं.

पिछले साल वर्ल्ड चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्ड मेडल जीतने के बाद सबकी नज़रें भी 26 साल की निख़त ज़रीन पर टिकी थीं. लेकिन उनके सामने ही सबसे मुश्किल चुनौती थी.

निख़त एक तो बदली हुई वेट कैटेगरी में हिस्सा ले रही थीं. वह ग़ैर वरीयता प्राप्त खिलाड़ी थीं और उन्हें 12 दिनों के अंदर छह मैच खेलने थे.

करियर के शुरुआती सालों में निख़त, काफ़ी समय मैरी कॉम के साये में रहीं. लेकिन उन्होंने मिले मौक़ों का फ़ायदा उठाना सीखा है.

आक्रामक अंदाज़ में बॉक्सिंग करने वाली निख़त लगातार दूसरे साल भी फ़ाइनल में पहुंचीं.

नगुएम के सामने दूसरे राउंड में निख़त के होठ का ऊपरी हिस्सा कट गया था और वह दर्द से कराह रही थीं.

इस मुक़ाबले के बाद उन्होंने कहा, "ऊपरी होंठ से ब्लड आने लगा था. ऐसे मामले में डॉक्टर को बुलाते. और कुछ देर के लिए खेल रोक देते. लेकिन मैं जोख़िम नहीं लेना चाहती थी. इसलिए मैंने दम लगाया. मैंने ख़ुद से कहा - 'चल निख़त, कर सकती है और जान लगा'. आख़िरी मुक़ाबला था तो दम बचाकर क्या करना था. इसलिए मैंने और दम झोंका."

फ़ाइनल मुक़ाबले में निख़त कभी पिछड़ती नहीं दिखीं और गोल्ड मेडल जीतकर ही दम लिया.

ज़ाहिर है लगातार दो वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने के बाद निख़त ने ख़ुद को उस सवाल का बेहतर जवाब दिया होगा जो सालों पहले उसने अपने पिता से बॉक्सिंग के बारे में पूछा था.

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