AI से बनी फर्जी तस्वीर को कैसे पहचानें? जानिए
प्रदर्शनकारी पहलवानों की एक नकली तस्वीर पिछले दिनों खूब वायरल हो चुकी है। यह कोई अकेला मामला नहीं है। AI से तैयार नकली और असली का फर्क समझा जा सकता है।

मई के आखिर में पहलवानों के विरोध प्रदर्शन के बाद हुई पुलिस कार्रवाई के समय की एक तस्वीर खूब वायरल हुई थी। उसमें दो महिला पहलवान पुलिस हिरासत में मुस्कुराते हुए नजर आ रही थीं। लेकिन, बाद पता चला की उनकी असली तस्वीर से छेड़छाड़ की गई है, जिसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल हुआ है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के इस जमाने में इस तरह से टेक्टनोलॉजी का दुरुपयोग बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। क्योंकि, सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसी झूठी खबरें जंगल की आग की तरह फैल रही हैं। सरसरी तौर पर असली और नकली में फर्क करना नामुमकिन हो जाता है। लेकिन, फिर भी कुछ रास्ते हैं, जिससे एक असली-नकली के अंतर को समझने की कोशिश की जा सकती है।
असामान्य हाथ और दांत
जिन तस्वीरों को तैयार करने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल होता है, उसके हाथ बल्व के आकार वाले दिख सकते हैं। यही नहीं उनमें उंगलियां भी सामान्य से ज्यादा नजर आ सकती हैं। वह टेढ़े-मेढ़े और कमजोर भी लग सकते हैं।
इसकी वजह ये है कि ऐसे एआई सिस्टम को पूरी चीज के बजाए उसके टुकड़ों में कवर करने के लिए ट्रेंड किया जाता है। दांतों पर भी इसी वजह से ज्यादा प्रभाव दिख सकता है।
तस्वीर में विसंगतियां
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ होने पर वह तस्वीर अस्पष्ट और गंदी दिखाई पड़ सकती है। मतलब, गौर से देखने (या जूम करने) पर महसूस किया जा सकता है कि यह असली नहीं है। कान की बालियां भी एक अहम सुराग हो सकती हैं, जो अक्सर बेमेल हो जाती हैं।
इसके अलावा यह ध्यान रखना होगा कि ऐसे फिल्टर भी मौजूद हैं, जो तस्वीरों पर मुस्कान ला सकते हैं या मायूसी दिखा सकते हैं। साथ ही साथ जवान को बूढ़ा और बुजुर्ग को जवान बना सकते हैं।
बैकग्राउंड में गड़बड़ी
जिन तस्वीरों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी की मदद से तैयार किया जाता है, उनके बैकग्राउंड धुंधले हो सकते हैं। उनका पूरा टेक्सचर एक जैसा लगने लगता है। ब्लेंडिंग (सम्मिश्रण) इसकी सबसे बड़ी समस्या है, चीजें एक-दूसरे से मिलती हुई लगती हैं। कई बार बैकग्राउंड में गलतियां भी होती हैं, जैसे कि कोई स्ट्रीट लैंप झुका हुआ लग सकता है।
हाल ही में पोप की एक तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें वह पफर कोट में पूरे स्टाइल में नजर आ रहे थे। काफी देर तक तस्वीर देखकर लोग गलतफहमी में रहे। फिर पता चला कि वह असली नहीं है। इसलिए कई बार जब तस्वीरें बहुत ही ज्यादा पूर्ण नजर आएं तो इसके नकली होने का संकेत हो सकता है। इसी तरह एआई वाली तस्वीरों में लोगों की त्वचा असमान्य रूप से बहुत ज्यादा कोमल नजर आ सकती है।
डिटेक्टर कितने उपयोगी?
टेक्नोलॉजी की दुनिया में अगर एआई प्लेटफॉर्म्स (generative AI platforms) की बाढ़ आ रही है तो उसकी पहचान और पड़ताल करने वाले टूल्स भी विकसित हो रहे हैं। जैसे कि जेनरेटिव ऐड्वर्सेरीअल नेटववर्क (GAN) से यह पता चल सकता है कि तस्वीर असली है या नकली। लेकिन, अभी दिक्कत ये है कि अभी अधिकतर डिटेक्टर एक ही ऐल्गरिदम के लिए प्रशिक्षित होते हैं, जिसमें सुधार पर काम चल रहा है। (स्रोत: साइंटिफिक अमेरिकन, डीडब्ल्यू, डिसकवर मैगजीन)
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