राष्ट्रपति चुनी गयीं द्रौपदी मुर्मू गैरभाजपा दलों के समर्थन का आभार कैसे जताएंगी ?
द्रौपदी मुर्मू का जीवन संघर्ष से भरा है। उनका राष्ट्रपति बनना देश की बड़ी राजनीतिक घटना है। वे आदिवासी और वंचित समाज की बड़ी उम्मीद बन कर उभरी हैं। वे भाजपा की नेता हैं लेकिन उनको अन्य दलों ने भी दिल खोल कर समर्थन दिया है। अब उन पर भी जिम्मेदारी आन पड़ी है कि वे कैसे विरोधी दलों के इस विश्वास को बनाये रखती हैं।

द्रौपदी मुर्मू को आगे कर भाजपा ने ध्वस्त किया विपक्ष को
राष्ट्रपति का पद दलनिरपेक्ष माना गया है। भले वह किसी दल का नेता रहा हो लेकिन पद पर आसीन होते ही दलीय प्रतिबद्धता से मुक्त हो जाता है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि भाजपा ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था। उनके उम्मीदवार बनने से विपक्ष की राजनीति छिन्न-भिन्न हो गयी। अब वे राष्ट्रपति चुन ली गयीं हैं तो भाजपा उनके नाम पर आदिवासी-दलित राजनीति को साधने की कोशिश करेगी। भाजपा ने रामनाथ कोविंद को भी दलित राजनीति को प्रभावित करने के लिए ही राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था। वे राष्ट्रपति बने तो भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ मिला। उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय का एक बड़ा तबका भाजपा के साथ जुड़ गया। देश के सबसे राज्य में अगर भाजपा लगातार दूसरी बार चुनाव जीत गयी तो इसमें दलित समुदाय का समर्थन भी एक बड़ा कारण रहा है। अब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चयन, राजनीति से अधिक रणनीति है। इसलिए दलीय निरपेक्षता की उम्मीद अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

क्या कर सकता है राष्ट्रपति?
यह सही है कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर चलने के लिए बाध्य हैं लेकिन वह संसद द्वारा पारित किसी विधेयक पर असहमति जता सकते हैं। वह इसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं। अगर संसद उसे दोबारा मंजूर कर राष्ट्रपति के पास भेजती है तब राष्ट्रपति विधेयक पर दस्तखत लिए बाध्य हो जाते हैं। अगर कोई राष्ट्रपति इतना भी साहस करता है तो इससे सरकार दबाव में आ जाती है। वह इस लिए क्यों कि सरकार से राष्ट्रपति की असहमति के बाद पूरे देश में एक बहस चल पड़ती है जिससे जनमत पर एक व्यापक प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रपति पॉकेट वीटो का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। ज्ञानी जैल सिंह भारत के सातवें राष्ट्पति थे। उन्हें कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया था। लेकिन जैल सिंह ने 1986 में पॉकेट वीटो का इस्तेमाल कर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को चौंका दिया था।

जब राजीव सरकार के विधेयक को रोक दिया था राष्ट्रपति ने
ज्ञानी जैल सिंह 1982 से 1987 तक भारत के राष्ट्रपति थे। वे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की पसंद थे। लेकिन बाद के दिनों में उनका प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मतभेद शुरू हो गया था। मतभेद, व्यक्तिगत लड़ाई में बदल गया। 1986 में राजीव गांधी ने इंडियन पोस्ट ऑफिस (अमेडमेंट) बिल पेश किया था। राष्ट्रपति जैल सिंह को बिल के कुछ प्रावधानों से असहमति थी। इसमें प्रावधान था कि सरकार अगर जरूरी समझे तो वह किसी की भी चिट्ठी पढ़ सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सरकार ऐसा करना उचित समझती थी। उस समय आरोप लगा था कि सरकार प्रेस को नियंत्रित करने के लिए ऐसा करना चाहती है। इससे निजी स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती थी। तब राष्ट्रपति जैल ने इस विधेयक को रोकने के लिए पॉकेट वीटो का इस्तेमाल किया। अगर राष्ट्रपति किसी विधेयक को न मंजूर करे, न ही पुनर्विचार के लिए वापस भेजे और उस पर मौन साध ले, तो इसे पॉकेट वीटो कहा जाता है। ज्ञानी जैल सिंह ने इस विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इससे पूरे देश में ये संदेश गया कि राष्ट्रपति इस विधेयक पर अपना विरोध जता रहे हैं। तब सरकार ने इस विधेयक को वापस ले लिया था। कार्यकाल के अंतिम दिनों में राष्ट्रपति जैल सिंह की प्रधानमंत्री राजीव गांधी से व्यक्तिगत बातचीत भी बंद हो गयी थी।

कमजोर या मजबूत होना परिस्थितियों पर निर्भर
चर्चा के मुताबिक 1982 में जब राष्ट्रपति चुनाव का समय आया तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने पुत्र राजीव गांधी को एक बड़ी जिम्मेदारी दी थी। उनसे योग्य उम्मीदवारों की सूची बनाने के लिए कहा गया था। राजीव गांधी उस समय कांग्रेस के महासचिव और सांसद थे। राजनीति अभी सीख रहे थे। उन्होंने जो सूची बनायी उसमें तत्कालीन गृहमंत्री जैल सिंह का भी नाम था। जैल सिंह, इंदिरा गांधी के परम विश्वस्त नेता था। राजीव गांधी भी उनकी निष्ठा से प्रभावित थे। जैल सिंह को इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया। इसकी घोषणा होते ही जैल सिंह की खुशियों का ठिकाना न रहा। उन्होंने इंदिरा गांधी के प्रति स्वामिभक्ति दिखाने के लिए कह दिया, मैं मैडम के कहने पर राष्ट्रपति बनने वाला हूं। ये तो बहुत बड़ी बात है। अगर वे कहें तो मैं झाड़ू लगाने को भी तैयार हूं। जैल सिंह के इस बयान पर बहुत विवाद हुआ था। इंदिरा गांधी पर आरोप लगने लगा कि वे राष्ट्रपति नहीं बल्कि रबर स्टाम्प की तलाश में हैं। लेकिन वक्त बदला तो सब कुछ बदल गया। जिस राजीव गांधी ने जैल सिंह का चयन किया था वही उनके खिलाफ हो गये थे। राजनीति में कोई कमजोर या ताकतवर नहीं होता। सब कुछ समय और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। जैल सिंह को कठपुतली समझने की भूल कांग्रेस को भारी पड़ गयी थी। अगर राष्ट्रपति चाहें तो वे विधिसम्मत तरीके से सरकार की नीतियों का विरोध कर सकती हैं।












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