समस्या का समाधान है नया जमीन अधिग्रहण अध्यादेश
नई दिल्ली। भारत के गांवों, और खासतौर से हिंदी पट्टी के किसी गांव में जाकर देखिए, आपको सिर्फ बच्चे और बूढ़े ही नजर आएंगे। प्रत्येक नौजवान पीढ़ी काम की तलाश में गांव से कोसों दूर किसी अनजान शहर की ओर निकल जाती है। आखिर क्यों?

आजकल की खेती में न तो साल भर काम मिलता है और न ही इतनी आमदनी कि पूरे साल का खर्च चल जाए। दूसरी ओर गांवों के लोग भी अपने लिए शहरी सुविधाओं, बच्चों की अच्छी शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसरों की मांग कर रहे हैं।
बिना जमीन विकास नहीं
इन सुविधाओं का विकास जमीन के बिना नहीं हो सकता। सड़क और सिंचाई जैसे बुनियादी ढांचे, आवासीय सुविधा, शहर बसाने, औद्योगिकरण और स्कूल तथा अस्पताल जैसी सरकारी सेवाओं के लिए जमीन चाहिए।
अगर जमीन का अधिग्रहण नहीं होगा तो इनमें से किसी भी सुविधा का विकास नहीं किया जा सकता। फिर कहां बनेंगी सड़के, खेतों को पानी कैसे मिलेगा। विकास के बिना देश की विशाल युवा आबादी का जीवन किस अंधकार में होगा? इस बारे में सोचकर ही डर लगता है।
दिल्ली के किसी एलीट क्लब में बैठकर जमीन अधिग्रहण का विरोध करने वाले और इसे किसान विरोधी बताने वाले लोग इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि किसी गांव के बगल से एक हाईवे निकल जाए, और अगर उस हाईवे पर एक फैक्ट्ररी खुल जाए तो कैसे वर्षों से सोया हुआ गांव अचानक जाग उठता है।
आसपास के कुछ लोगों को रोजगार तो मिलता ही है, साथ ही उस इलाके में सुरक्षा का भाव बढ़ता है। संचार के साधन बढ़ते हैं। जो पलायन अब तक गांव से शहरों की ओर हो रहा था, उसकी दिशा बदल जाती है।
क्यों मचा है इतना हंगामा
ऐसे में सवाल ये है कि फिर जमीन अधिग्रहण को लेकर इतना हल्ला क्यों मचता है? इसके लिए पिछली कांग्रेस सरकारों की नीतियां और वो कम्युनिस्ट मानसिकता जिम्मेदार है, जो उद्योग तथा उद्योगपतियों को अपना शत्रु समझती है।
कांग्रेस सरकारों में पहले जमीन अधिग्रहण कानून इतने लचर थे कि किसान अपने को हमेशा ठगा हुआ महसूस करता था। सरकारी डंडे के बल पर किसान की जमीन तो हथिया ली जाती थी, लेकिन उस जमीन पर होने वाले विकास में किसान की कोई हिस्सेदारी नहीं होती।
जब इन नीतियों पर विरोध बढ़ा तो कांग्रेस की ही पिछली यूपीए सरकार एक ऐसा सख्त कानूनन ले आई, जिसने जमीन अधिग्रहण को पूरी तरह अव्यावहारिक बना दिया। यानी विकास की राह को पूरी तरह से बंद कर दिया।
इन्हीं विसंगतियों को दूर करने के लिए मोदी सरकार बीते दिनों एक अध्यादेश लाई, जिसे विपक्षी दलों ने किसान विरोधी करार दिया। इस अध्यादेश पर विपक्ष का विरोध दो पहलुओं पर आधारित है। पहला- संसद में जमीन अधिग्रहण विधेयक पारित कराने की जगह सरकार अध्यादेश क्यों लाई?
ये एक प्रक्रियागत सवाल है, जिसका किसान विरोधी होने या नहीं होने से कोई लेनादेना नहीं। अगर कानून में संशोधन अच्छे हैं तो चाहें वो विधेयक के जरिये हों या अध्यादेश के जरिए, अंत में भला तो किसान का ही हो रहा है।
किसान नहीं है अधिग्रहण विरोधी
दूसरा विरोध इस बात के लिए किया जा रहा है कि सरकार ने इस कानून के जरिए जमीन अधिग्रहण को आसान बना दिया है। लेकिन समझने वाली बात ये है कि इस देश का किसान भी अधिग्रहण का विरोधी नहीं है। वो समझता है कि जमीन अधिग्रहण और विकास उसके लिए भी जरूरी हैं।
बस वो उस विकास में अपनी हिस्सेदारी चाहता है। अगर विकास में उसे हिस्सेदारी मिल रही है, तो वो अधिग्रहण का विरोधी नहीं है।
इस अध्यादेश के जरिये सरकार यही सुनिश्तित करना चाहती है कि विकास का फायदा सभी को मिले। खासतौर से उन किसानों की इसमें महत्वपूर्ण भागीदारी हो, जिनकी जमीनों पर विकास की ये इमारतें खड़ी की जा रही हैं।
इसके लिए नये जमीन अधिग्रहण अध्यादेश में जहां एक ओर अधिग्रहण के प्रावधानों को सरल बनाया गया है, वहीं दूसरी ओर किसानों को मिलने वाले मुआवजे तथा उन्हें मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा को बढ़ाया गया है।
नए संशोधनों में इस बात का प्रावधान है कि अधिग्रहण का वहां के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा जबकि खाद्य सुरक्षा को लेकर विशेष प्रावधान जोड़े गए हैं।
क्या कहा है अरुण जेटली ने
इस बात को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने फेसबुक पर अपनी टिप्पणी में भी स्पष्ट किया गया है। इसमें कहा गया है, 'यह संशोधन ग्रामीण भारत की विकास संबंधी जरूरतों को संतुलित करता है और भूमि स्वामियों के लिए अधिक मुआवजे की व्यवस्था सुनिश्चित करता है।'
पिछली यूपीए सरकार के कानून के प्रावधानों अनुसार रेलवे, नैशनल हाइवे, मेट्रो रेल, एटमिक एनर्जी और बिजली जैसी 13 केंद्र सरकार की परियोजनाओं पर जमीन अधिग्रहण कानून लागू नहीं होता था।
लेकिन मोदी सरकार के नए प्रावधानों में इन परियोजनाओं को भी मौजूदा जमीन अधिग्रहण कानून के दायरे में ला दिया गया है। इसका मतलब है कि इन परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण होने पर किसानों को ज्यादा मुआवजा मिल सकेगा, पुनर्वास जरूरी होगा।
एक काल्पनिक डर ये भी दिखाया जाता है कि उद्योगों के नाम पर सारी जमीन ले ली जाएगी और खेत ही नहीं बचेंगे। अध्ययन बताते हैं कि देश की कुल ढांचागत और औद्योगिक जरूरतों के लिए जितनी जमीन की आवश्यकता है वो देश में कुल कृषि योग्य भूमि के आधा प्रतिशत से भी कम है, जबकि ग्रामीण भारत को इससे होने वाले फायदे कई गुना हैं।












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