कई पीढ़ियों ने खाई मैगी, कैसे टूटेगा नाता
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला)देश की शहरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा दो मिनट में तैयार इस मैगी फास्ट फूड को खाकर ही जवान हुआ है और किसी भी अन्य भोज्य पदार्थ की अपेक्षा आज भी यह बच्चों और युवाओं में अधिक स्वीकार्य रही है। परन्तु अब यह जहरीली लगने लगी है। अब सवाल ये भी है कि मैगी से देश दूर कैसे जाएगा। बेशक, यह मैगी कितनों को अधिक शीशा युक्त स्वाद से लोगों के शरीर को नुक्सान पहुंचा चुकी है और अब तक सरकार के विभाग क्या करते रहे? कौन से मापदंड से यह मैगी वर्षों से लोगों के शरीर में हानिकारक शीशे की अधिक मात्रा भेजती रही?
एगमार्क जैसे चिन्हों पर भरोसा
जानकार ठीक ही कहते हैं कि हमारे यहां डिब्बा बंद भोज्य पदार्थों अथवा पैकेट में उपलब्ध भोज्य पदार्थों के प्रति इतनी जागरुकता नहीं है और वह सरकारी गुणवत्ता के दिये गये मार्का एगमार्क जैसे चिन्हों पर भरोसा करके यह मान लेता है कि इसकी गुणवत्ता सरकार द्वारा प्रमाणित है जबकि हकीक़त यह है कि एगमार्क हों या आईएसआई जैसे प्रमाणपत्र इनके विभागों द्वारा कुछ रूपये में खरीदे जा सकते हैं फिर उसके बाद क्या?
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क्या प्रमाण है
हर वो चीजें जो बाजार में जा रहीं उनकी गुणवत्ता को मापदंडों के अनुसार होने का क्या प्रमाण है ? जहाँ तक मेरी जानकारी है कि दिन प्रतिदिन के उत्पादन को चेक करने की कोई व्यवस्था नहीं है और सरकार द्वारा दिये गये गुणवत्ता के चिन्ह हर पैकेट पर लिखा होता है जबकि अन्दर खाद्य पदार्थ उसी गुणवत्ता के मापदंड के अनुरूप हो यह आवश्यक नहीं । हाँ खाद्य विभाग का महीना इन कम्पनियों में अवश्य तय हो जाता है।
वरिष्ठ लेखक मोहम्द जाहिद सवाल करते हैं कि विश्वप्रसिद्ध विदेशी कम्पनी नेस्ले के उत्पाद में ऐसी गड़बड़ी है तो भारत की अन्य छोटी बड़ी कम्पनियों के डिब्बाबंद या पैकेट में उपलब्ध खाद्य पदार्थों के गुणवत्ता के मापदंडों की क्या विश्वसनीयता है? आखिरकार सरकार और उनके विभाग कोई पारदर्शी व्यवस्था क्यों लागू नहीं करते जिससे डिब्बाबंद और पैकेट में उपलब्ध खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर शक ना हो।













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