सचिन पायलट अड़ने के बाद भी अशोक गहलोत के सामने कैसे झुके
कांग्रेस के एक पूर्व महासचिव राजस्थान पर चर्चा शुरू होने पर अशोक गहलोत को लेकर अमूमन बात से ही चर्चा शुरू किया करते हैं.
मजाकिया लहजे में वे कहते हैं, "अशोक गहलोत जी को देखिए, आप उनसे कहीं मिलिए या वे आपसे कहीं मिलें, उनके बाल बेतरतीब ढंग से उड़ते नज़र आएंगे, कुर्ता मुड़ा तुड़ा होगा, हो सकता है फटा हुआ पहने भी मिल जाएं. उनको देखकर लगता है मानो इस आदमी अपना सबकुछ कांग्रेस पर न्योछावर कर दिया है."
तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे और अलग अलग मौकों पर छह बार केंद्र की सरकार में मंत्री रहे अशोक गहलोत की यही ख़ासियत है.
राजस्थान से ही आने वाले वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी बताते हैं, "अशोक गहलोत ने अपनी ऐसी छवि बनाई है जिससे कांग्रेस आलाकमान को हमेशा ये महसूस होता रहा है कि ये आदमी पार्टी से कुछ ले नहीं रहा है, बल्कि अपना सबकुछ पार्टी में लगा रहा है. अपनी इस छवि के चलते ही वे हमेशा आलाकमान की पसंद रहे हैं."
अशोक गहलोत ने अपनी ये छवि इंदिरा गांधी के समय में बनाई थी तबसे लेकर अब राहुल गांधी तक गहलोत की छवि वैसी की वैसी है. यही वजह है कि सचिन पायलट की मेहनत और दावों की बावजूद गहलोत बाजी मार ले गए.
वैसे देखा जाए, तो इस बार राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के लिए सचिन पायलट का दावा कमजोर भी नहीं था. दिसंबर, 2013 में राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था. 200 विधानसभा वाले राजस्थान में पार्टी के महज 21 विधायक चुनाव जीत पाए थे. इसके बाद पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सचिन पायलट को सौंपी.
सचिन ने मुक़ाबले तक पहुंचाया
एक तरह से कांग्रेस का राज्य में पूरी तरह सफाया हो गया था, इसके बाद 2014 में मोदी लहर में लोकसभा की सभी 25 सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. एक तरह से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का मनोबल सबसे नीचे पहुंच गया था.
ऐसे में सचिन पायलट ने दिन रात एक कर दिया. उन्होंने बीते साढ़े चार सालों में पार्टी को उस मुकाम तक पहुंचा दिया जहां से इस बार चुनाव से पहले ही राजस्थान में कांग्रेसी की उम्मीद बढ़ गई थी. सचिन के समर्थकों का दावा है कि उन्होंने राज्य में करीब साढ़े पांच लाख किलोमीटर की यात्रा करके बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं में वो उत्साह भरा और पार्टी को मुक़ाबले में ला दिया.
राज्य विधानसभा की तीन सीटों पर हुए उपचुनाव और अलवर के साथ साथ अजमेर लोकसभा सीट के हुए दो उपचुनावों में उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार को जीत भी दिलाई. राज्य के वरिष्ठ स्थानीय पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं, "कांग्रेस की जीत में वसुंधरा सरकार की नाकामियों का भी बड़ा योगदान रहा है, इस वजह से आम लोगों में काफ़ी नाराजगी रही थी."
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चुनाव से छह महीने पहले तक ये माना जा रहा था कि अगर राज्य में कांग्रेस सत्ता में आती दिख रही है तो इसका श्रेय सचिन पायलट को ही मिलेगा, उन्हें ही मुख्यमंत्री की कमान सौंपी जाएगी. बहुत हद तक राहुल गांधी भी उनका समर्थन कर रहे, कांग्रेस सत्ता बनाने की स्थिति में भी आई लेकिन सचिन पायलट पिछड़ गए.
गहलोत बनाम पायलट
विजय त्रिवेदी के मुताबिक सचिन पायलट अकेले रेस में नहीं हैं, ये बात तो उसी दिन तय हो गई थी जिस दिन राहुल गांधी ने सचिन पायलट के साथ साथ अशोक गहलोत को भी विधानसभा चुनाव में लड़ाने की घोषणा की थी.
चुनाव मैदान में गहलोत के उतरने से ही राज्य में कांग्रेस के अंदर गहलोत बनाम पायलट का विवाद शुरू हो गया था. गहलोत ने भी उस दौरान लगातार मुख्यमंत्री बनने की बात से इनकार नहीं किया, उल्टे 44 सालों से कांग्रेस के लिए काम कर रहा हूं कहकर सचिन पायलट के साढ़े चार साल के अनुभव की बात को कमतर साबित करते रहे.
लेकिन सचिन पायलट के पिछड़ जाने की सबसे बड़ी वजह तो यही है कि कांग्रेस को उम्मीद के मुताबिक राजस्थान में कामयाबी नहीं मिली. राजस्थान में कांग्रेस अपने दम पर बहुमत के बेंचमार्क से एक सीट कम जीत पाई, अगर ये संख्या 125 के आसपास होती जो सचिन पायलट का दावा ज़्यादा मजबूत होता.
इसके अलावा जीते हुए विधायकों में बड़ी संख्या वैसे लोगों की भी है, जो कभी अशोक गहलोत के नज़दीकी रहे हैं. इसलिए चुनावी नतीजे आने के बाद सचिन पायलट के साथ देने वाले विधायक उतने नहीं थे जिससे कांग्रेस आलाकमान पर दबाव बढ़ता.
कांग्रेस पार्टी पर नजर रखने वालों की मानें तो नतीजे आने के बाद सचिन पायलट के घर पर करीब 17 विधायक जमा हुए थे. ज़्यादा से ज़्यादा उनके समर्थक विधायकों की संख्या जीते हुए विधायकों में एक तिहाई तक पहुंच सकती है.
कहां चूके पायलट
नारायण बारेठ के मुताबिक गहलोत पहले भी दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और तीन बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की भूमिका निभा चुके हैं, ऐसे में उनको समर्थकों की संख्या का ज्यादा होना स्वभाविक ही है.
दरअसल मौजूदा राजस्थान कांग्रेस में आज जो गहलोत की क्षमता दिख रही है, वह 1985 से लेकर 1999 के बीच तीन अलग कार्यकाल को मिलाकर नौ साल तक प्रदेश अध्यक्ष रहने के चलते भी है.
इस दौरान राज्य में अलग अलग जातियों से लेकर अलग अलग सामाजिक वर्गों के लिए अशोक गहलोत ने कांग्रेस के प्रकोष्ठ बनाए हुए थे. उसमें रखे गए लोग उनके ही हैंडपिक्ड लोग थे. यही वजह है कि आज राजस्थान कांग्रेस का जो ढांचा दिखाई दे रहा है उसकी बुनियाद में गहलोत के ही लोग हैं.
सचिन पायलट ने उन्हीं लोगों को फिर से खड़ा किया, उन्होंने अपने लोगों को जोड़ा ज़रूर है लेकिन पूरे राज्य के संगठन में ऐसा कर पाना साढ़े चार साल में नामुमकिन काम था.
इतना ही नहीं राज्य में कांग्रेस के करीब 10 उम्मीदवारों की ज़मानत भी जब्त हुई है. वहीं नौ बाग़ी चुनाव जीतने में कामयाब हुए हैं. ये बातें भी सचिन पायलट की स्वीकार्यता के पक्ष में नहीं रहीं, दूसरी ओर अशोक गहलोत के पास सबको साथ लेकर चलने का अनुभव भी था जिसको तरजीह मिली.
गहलोत क्यों पड़े भारी
कांग्रेस महासचिव मोहन प्रकाश आलाकमान के फ़ैसले पर कहते हैं, "ये फ़ैसला काफ़ी सोच विचारकर लिया गया है, सचिन जी के नेतृत्व में संगठन ने काम किया है, उनको भी साथ लिया गया है और अनुभव को देखते हुए गहलोत जी को नेतृत्व सौंपा गया है."
वैसे सबसे अहम बात ये है कि महज साढ़े चार महीने बाद लोकसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी आलाकमान दोनों में से किसी को नाराज करने का जोख़िम नहीं उठाना चाहता था. अशोक गहलोत की ज़मीनी पकड़ और राजस्थान की राजनीति का जातिगत विश्लेषण भी उनके पक्ष में गया है.
कुछ विश्लेषकों के मुताबिक जिस तरह से उन्होंने गुजरात चुनाव में जातिगत समीकरणों के आधार पर कांग्रेस को बीजेपी के मुक़ाबले में ला दिया था, उसे देखते हुए राहुल गांधी भी उनके इस भरोसे पर यक़ीन कर रहे थे.
ठीक इसी जातिगत समीकरण के चलते कांग्रेस सचिन पायलट के दावे को दरकिनार करके गुर्जर समुदाय के वोटों को नाराज नहीं करना चाहती थी, गुर्जर समुदाय के वोट अच्छी संख्या राजस्थान ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों में भी हैं.
दूसरी तरफ़ सचिन पायलट अपनी मेहनत और युवा कार्यकर्ताओं के भरोसे की दलील दे रहे थे. उनकी दलीलों को भी आलाकमान खारिज नहीं कर रहा था यही वजह है कि पहले दौर की बातचीत में वे डिप्टी सीएम के ऑफ़र को स्वीकर करने को तैयार नहीं हुए थे.
विजय त्रिवेदी के मुताबिक उनका अड़ना या उनके समर्थकों द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन भी उनके ख़िलाफ़ ही गया होगा. वे कहते हैं, गहलोत इस मामले में बेहद सुलझे हुए हैं, वे अपनी ओर से कोई मांग करते ही नहीं और उनके समर्थक भी शांत रहे तो इसका असर भी होता है.
आने वाले दिनों में संकट बढ़ेगा?
हालांकि सचिन पायलट की आक्रमकता को भी कुछ विश्लेषक पसंद कर रहे हैं, कम से कम अपने हक के लिए या फिर कार्यकर्ताओं के हक के लिए सचिन पायलट लड़ भिड़ सकते हैं, इसका संदेश तो पायलट देने में कामयाब रहे हैं.
वैसे सचिन पायलट जिस तरह से अड़े, उससे ये संकेत भी गया है कि अब वे बेहद कांफिडेंट भी हो चुके हैं. दिलचस्प ये है कि उनके पिता राजेश पायलट में ये डेयरिंग कांफिंडेंस राजनीति में आने से पहले ही था.
वायुसेना पायलट होने की ट्रेनिंग के चलते उनके लिए ये सहज रहा होगा लेकिन वे कितने डेयरिंग थे, इसकी एक दिलचस्प झलक सचिन पायलट की मां रमा पायलट ने अपने पति राजेश पायलट की जीवनी में किया है.
इसके मुताबिक इंदिरा गांधी ने राजेश पायलट को कहा था कि कहां नौकरी छोड़कर राजनीति में आना चाहते हो, ये काफी अस्थिर फील्ड है तो राजेश पायलट ने कहा था- मैडम मैं आपसे सलाह लेने नहीं आया हूं, मैं आशीर्वाद लेने आया हूं और मैं चरण सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना चाहता हूं.
तब चरण सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने के बात वो भी एक युवा से सुनकर इंदिरा गांधी दंग रह गई थीं.
बहरहाल, सचिन पायलट के समर्थकों की मानें तो राहुल गांधी ने सचिन को आने वाले दिनों में बड़ा मौका देने का भरोसा दिया है.
अपने पुराने दिनों के कामों का सिला अशोक गहलोत को भले मिल गया हो लेकिन ये साफ़ है कि उनके शासन में सचिन पायलट की भी सक्रिय भूमिका होने वाली है. अहम मंत्रालयों के अलावा उनके समर्थकों को भी भागीदारी मिलने का दावा किया जा रहा है.
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या ये दोनों नेता आने वाले दिनों में एक साथ मिलकर मज़बूती से काम कर पाएंगे? मोहन प्रकाश के मुताबिक आने वाले दिनों में अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों के बीच किसी तरह का कोई विवाद देखने को नहीं मिलेगा.
वे कहते हैं, "दोनों मैच्योर नेता हैं. पार्टी की जिम्मेदारियों को निभाने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता है और उन्हें मालूम है कि राज्य में बीजेपी को चुनौती देने के लिए काफ़ी काम करना है."
पायलट को क्या सीखना होगा
वैसे कांग्रेस आलाकमान 2019 के आम चुनाव के बाद सचिन पायलट को राज्य की बागडोर थमाने का फैसला कर सकता है, लेकिन ये काफी हद तक चुनावी नतीजों पर निर्भर करेगा.
हालांकि विजय त्रिवेदी इससे इत्तेफाक़ नहीं रखते. वे कहते हैं, "गहलोत जब तक हैं तब तक उनके बिना राजस्थान में सरकार चलाना आसान नहीं होगा. गहलोत की अहमियत का अंदाज़ा इससे लगा सकते हैं कि जब वे सरकार से बाहर होते हैं तो केंद्र या आलाकमान के क़रीब हो जाते हैं और समय आने पर सरकार की कमान भी उन्हें थमाई जाती है."
ऐसे में ज़ाहिर है सचिन पायलट को सबको साथ लेकर चलने की कला सीखनी होगी. उन्हें अपनी ज़िद के बदले दूसरे की बातों को सुनने के लिए भी तैयार होना होगा. अशोक गहलोत से आगे निकलने के लिए उन्हें वह राजनीति सीखनी होगी जिसके बूते गहलोत इस मुकाम तक पहुंचे हैं.
गहलोत 34 साल की उम्र में जब राजस्थान प्रदेश के अध्यक्ष बने थे, तब राजस्थान कांग्रेस के कई दिग्गज थे, मसलन शिवचरण माथुर, हरि देव जोशी, जगन्नाथ पहाड़िया, बलराम जाखड़ और बूटा सिंह. इन लोगों के बीच राजस्थान के जादूगर ने अपनी जगह बनाई.
सचिन पायलट की चुनौती कहीं ज़्यादा आसान है, उनके सामने तो केवल अशोक गहलोत ही हैं.
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