अशोक गहलोत के पहले ही दांव में कैसे चित हो गए सचिन पायलट, अंदर की बात जानिए

नई दिल्ली- राजस्थान कोरोना की मार झेल रहा है। वहां के लोगों के लिए राहत की बात है कि तत्कालीन उपमुख्मंत्री सचिन पायलट की अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत के चलते वहां एक महीने से जारी सत्ताधारी पार्टी के सिसायी संकट का फिलहाल समाधान होते दिख रहा है। सचिन पायलट अब कह रहे हैं कि उन्हें किसी पद की लालसा नहीं है। लेकिन, यह बात राजस्थान की राजनीति को समझने वाला कोई भी शख्स समझता है कि आखिर पौने दो साल से वह अपने दिल में किस ख्वाहिश को दबाए हुए बैठे हैं। खैर छोड़िए। सौ बात की एक बात ये कि प्रदेश की राजनीति में जादूगर माने जाने वाले अशोक गहलोत एकबार फिर विजेता बनकर उभरे हैं और पायलट को उनके पहले ही दांव में ऐसा चित किया है कि शायद उनके लिए अपना वही जमीन पाना बहुत मुश्किल साबित हो सकता है।

गहलोत के पहले ही दांव में कैसे चित हो गए पायलट

गहलोत के पहले ही दांव में कैसे चित हो गए पायलट

राजस्थान में कांग्रेस पर आए संकट के बादल छंटने के साथ ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही आखिरकार विजेता बनकर उभरते हुए दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि तीन सदस्यीय कमिटी क्या रास्ता निकालती है, वह अभी साफ नहीं हुआ है, लेकिन वह छाती ठोककर कहने लगे हैं कि वो ही राजस्थान में कांग्रेसी विधायकों के अभिभावक हैं और आगे भी बने रहेंगे। करीब एक महीने तक चली अपने पूर्व डिप्टी के साथ लड़ाई में विधानसभा सत्र आते-आते पायलट स्पष्ट रूप से कमजोर होते दिख रहे थे और उनके साथ गए विधायक भी उनका साथ छोड़कर मुख्यमंत्री के सामने सरेंडर कर देने में ही भलाई समझने लगे थे। अलबत्ता विधानसभा चुनावों के बाद से ही सीएम की कुर्सी पर नजर गड़ाए बैठे पायलट की पहली खुली बगावत की हवा निकालने में गहलोत को एआईसीसी में उनके साथियों और आलाकमान के खासमखास राजनीतिक सचिव अहमद पटेल का भरपूर साथ जरूर मिला है।

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    सचिन पायलट को बगावत करके क्या मिला?

    सचिन पायलट को बगावत करके क्या मिला?

    कांग्रेस सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक ये भी लगभग तय है कि सचिन पायलट को अब न तो उनका डिप्टी सीएम वाला पोस्ट मिलने जा रहा और ना ही उनकी प्रदेश अध्यक्ष के पद पर फिर से नियुक्ति होने जा रही है। शायद इसलिए उन्होंने खुद से ही कहना शुरू कर दिया है कि उन्हें पद की कभी कोई लालसा रही ही नहीं। आज की तारीख में उनके पास संतुष्टि के लिए इसके अलावा कुछ नहीं बचा है कि पार्टी के सर्वेसर्वा 'परिवार' के दोनों भाई-बहनों यानि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की पहल पर उन्होंने बगावत का रास्ता छोड़ने का फैसला किया है। लेकिन, हकीकत तो ये है कि प्रियंका पहले भी निजी तौर पर कई बार उन्हें समझा चुकी थीं और राहुल गांधी ने तो नाराज होकर एक वक्त उनसे साफ मुंह ही मोड़ लिया था। माना जा रहा है कि जबतक अशोक गहलोत के पास कमान रहेगी, वह प्रदेश की राजनीति में अब ज्यादा दखल भी नहीं दे सकेंगे। वैसे भी संभावना है कि उनके सम्मान को ठेस न पहुंचे इसके लिए उन्हें एआईसीसी में जगह जरूर मिल सकती है।

    किसका भरोसा पाया, किसका गंवाया ?

    किसका भरोसा पाया, किसका गंवाया ?

    तथ्य ये भी है कि सचिन पायलट को यही करना था तो उन्होंने 'परिवार' की बात पर हामी भरने में बहुत देर लगा दी। उन्हें उनकी बात सुन लेने और कमिटी बनाने पर ही राजी होना था तो पार्टी की इतनी मिट्टी पलीद करने की क्या आवश्यकता थी। राज्य सरकार का महीने भर से सारा ध्यान सत्ता को बचाने में लगा रहा। जाहिर है कि पायलट अब मान भले ही गए हों, लेकिन गांधी परिवार का उनपर पहले जो भरोसा था, आगे भी वैसा ही रहेगा ये कहना मुश्किल है। इसके अलावा जिन 18 विधायकों ने उनके साथ जाकर गहलोत को खुली चुनौती दी है, उनमें भी पायलट के नेतृत्व के प्रति विश्वास का संकट खड़ा होना बड़ा ही स्वाभाविक है। राहुल-प्रियंका के नजरिए से देखें तो वो इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि वो यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि उनकी वजह से ही राजस्थान का एक बड़ा नेता पार्टी में रह गया है और गहलोत सरकार गिराने की कथित कोशिश में भाजपा नाकाम हो गई है।

    गहलोत ने दो मोर्चो पर छोड़े थे सियासी घोड़े!

    गहलोत ने दो मोर्चो पर छोड़े थे सियासी घोड़े!

    सवाल उठता है कि सचिन पायलट सबकुछ गंवाकर होश में आने के लिए क्यों तैयार हुए। दरअसल, जब अशोक गहलोत को लगा कि पायलट इसी तरह रूठे रहे तो उनके लिए सरकार बचाने में दिक्कत हो सकती है। इसलिए उन्होंने एक साथ दो मोर्चों पर अपने सियासी घोड़े छोड़ दिए। ऐसा लगता है कि उन्होंने पायलट कैंप में भी अपनी पैठ बना ली थी और भाजपा में उनके 'कुछ अदृश्य दोस्तों' ने भी विरोध के बिगुल को दबाने के लिए उन्हें हौसला दे रखा था। विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले जिस तरह से भाजपा को अपने कुछ विधायकों (कथित रूप से वसुंधरा समर्थक) को गुजरात भेजना पड़ा उससे जाहिर होता है कि उसे भी गहलोत की सेंधमारी का डर सता रहा था। इन दोनों बातों ने पायलट का हौसला तोड़ने में बहुत ज्यादा रोल निभाया। क्योंकि, उनके प्यादे तो डूबते हुए जहाज के चूहों की तरह पहले ही फुदक-फुदककर सत्ता के सामने नतमस्तक होने लगे थे। जानकारी के मुताबिक दिल्ली में अहमद पटेल और केसी वेणुगोपाल के पास सबसे पहले कांग्रेस में वापसी की गुहार लगाने वाले वही पाटलट के करीबी भंवरलाल शर्मा समेत आधा दर्जन विधायक थे, जिनपर गहलोत ने विधायकों की खरीद-फरोख्त की लालच देने का आरोप लगाया था। जल्दी ही गुरुग्राम के रिजॉर्ट से कुछ और विधायक निकलकर मुख्यमंत्री से मिलने पहुंच गए। वैसे फिर से पाला बदलने वाले इन विधायकों में कितने गहलोत के भेजे हुए सियासी घोड़े थे, यह सवाल लंबे वक्त तक पायलट को परेशान कर सकता है।

    विधायकों को सदस्यता जाने का डर था

    विधायकों को सदस्यता जाने का डर था

    राजस्थान में जो कुछ भी हुआ उसके लिए सचिन पायलट और उनके समर्थक किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते। करीब 30 दिन की सियासी उथल-पुथल के बावजूद वो 18 में एक भी और विधायक नहीं जोड़ सके। जबकि, शुरू में उन्होंने 30 विधायकों के समर्थन होने का दावा किया था, जिसके बाद ही शायद भाजपा पर्दे के सामने आकर आगे का मंच संचालन करने के लिए तैयारी होती। कांग्रेस के धुरंधरों की टीम ने जिस तरह से गहलोत का साथ दिया और अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल जैसे कानून के खिलाड़ियों ने बागियों को अदालत में घेरने की कोशिश की उससे बागियों को सदस्यता गंवाने का डर चरम पर पहुंच चुका था। उन्हें यकीन हो चुका था कि सत्र शुरू होने की देर है, अगर पायलट कुछ कर नहीं पाए तो उनके साथ रहकर विधायकी गंवाने में कोई समझदारी नहीं है। क्योंकि, कोरोना के नाम पर सत्र की मांग करने वाले गहलोत की सियासी चालाकी किसी से छिपी नहीं थी। विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी जिस लड़ाई में अदालत में पिछड़ गए थे, सदन में उनकी फौरी जीत लगभग तय थी। ऐसे में सचिन पायलट को अब अपने दोस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया से चिढ़ जरूर हो रही होगी, जो न सिर्फ राज्यसभा पहुंच गए, बल्कि उनको मध्य प्रदेश की सत्ता में भी पूरी भागीदारी भी मिल चुकी है।

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