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जिसे कस्तूरबा गांधी की डायरी बताया जा रहा है, वो अचानक कैसे मिली?

कस्तूरबा गांधी
KEYSTONE/GETTY IMAGES
कस्तूरबा गांधी

कुछ समय पहले एक डायरी इंदौर के एक आश्रम में पाई गई थी, इस डायरी को महात्ममा गांधी की पत्नी कस्तूरबा की डायरी बताया जा रहा है.

इस डायरी को लेकर विवाद जारी है. कुछ लोग इसे कस्तूरबा गांधी की डायरी नहीं मान रहे हैं. वहीं, उनके पड़पोते तुषार गांधी इसे अपनी पड़दादी कस्तूरबा गांधी की ही डायरी मान रहे हैं.

तुषार गांधी ने इस डायरी पर एक किताब भी लिखी है जिसका नाम - 'द लॉस्ट डायरी ऑफ़ कस्तूर, माई बा'.

बीबीसी ने तुषार गांधी से बात करके इस डायरी और उनकी किताब से जुड़े कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.

डायरी के पीछे की कहानी

तुषार गांधी ने इस डायरी के दुनिया के सामने आने की कहानी बयान करते हुए बताया कि कुछ साल पहले जलगांव में गांधी रिसर्च फाउंडेशन नाम से एक संस्था का स्थापना हुई थी.

इसका मकसद गांधी और उनसे जुड़े साहित्य को संजोना था. इस फाउंडेशन के कर्मचारी अलग-अलग गांधी संस्थाओं में जाकर गांधी जी से जुड़ी चीजों को इकट्ठा कर यहाँ लाते हैं.

तुषार गांधी कहते हैं, "ऐसी ही एक टीम कस्तूरबा ट्रस्ट इंदौर गई थी जहाँ सालों से बंद पड़ी पुरानी अलमारियाँ और संदूक दिखे जो बरसों से खुले ही नहीं थे और जब इन्हें खोलकर देखा गया तो इसमें से कई किताबें और दूसरी पुरानी चीजें मिलीं, ऐसे ही बक्से में से एक डायरी मिली, शुरुआत में पता नहीं लग पा रहा था कि हाथ से लिखी ये डायरी किसकी है लेकिन जांच करने गई टीम में से गुजराती जानने वाले एक व्यक्ति ने इसे पढ़ना शुरू किया तो लगा कि किसी ने अपनी रोज़मर्रा की बातें इस डायरी में लिखी हैं और ऐसा माना जाने लगा कि शायद ये डायरी कस्तूरबा गांधी की है."

तुषार गांधी कहते हैं, "क्या इस डायरी में लिखी बातें कस्तूरबा की ही हैं, इसकी पुष्टि के लिए लिखी बातों का मिलान उस समय से किया गया कि उस वक्त कस्तूरबा कहां थीं और पन्ने-दर-पन्ने पढ़ने और कस्तूरबा की जिंदगी से उन पन्नों को जोड़ने पर शक यकीन में बदल गया कि ये डायरी कस्तूरबा की ही है. ये कहानी थी कस्तूरबा की डायरी की लेकिन फिर भी हममें से कोई मानने को तैयार नहीं था कि ये डायरी उन्हीं की है क्योंकि वो तो पढ़ना-लिखना नहीं जानती थीं."

कस्तूरबा गांधी
Kanu Gandhi
कस्तूरबा गांधी

तुषार गांधी के तर्क

सवाल उठता है कि जब कस्तूरबा गांधी निरक्षर थीं, तो ऐसे में तुषार गांधी इस निर्णय पर कैसे पहुंचे कि ये डायरी उन्होंने ही लिखी थी.

तुषार गांधी की बातों से ऐसा लगता है कि वे पढ़ी-लिखी नहीं थी लेकिन समय के साथ उन्होंने खुद ही बुनियादी अक्षर ज्ञान हासिल कर लिया था.

तुषार गांधी दावा करते हैं, "डायरी मिलने पर मेरा भी यही मानना था कि ये ''बा'' की कैसे हो सकती है क्योंकि वो तो निरक्षर थीं और लिखना नहीं जानती थीं लेकिन जब मैंने डायरी पढ़ी तो मुझे यकीन होता गया कि ये ''बा'' की ही डायरी है. इस पर मैंने अपने पिताजी और उनसे बात कि जिन्होंने ''बा'' की बायोग्राफी लिखी है, उनका भी यही मानना था कि ये ''बा'' की डायरी नहीं हो सकती क्योंकि वो निरक्षर थीं, लेकिन मुझे यकीन तब हुआ कि जिस तरह की भाषा, शब्दावली, व्याकरण और वाक्यों का गठन था, वो सब जब मैं पढ़ने लगा तो ऐसा लग रहा था कि किसी ऐसे व्यक्ति ने लिखी है जिसे सिर्फ बोली भाषा का ज्ञान था, उसे लिखित भाषा का ज्ञान नहीं था, जैसे वो बोलते था, जैसा सोचता है, वैसे ही लिखाई हो रही है."

कई जगहों पर काठियावाड़ी लहज़े का इस्तेमाल है, काठियावाड़ी गुजरात की एक बोली है, और ''बा'' की ज़ुबान भी जीवन भर काठियावाड़ी ही थी, परिवार के साथ अन्य लोग ''बा'' के साथ रहे थे, इन सभी का मानना था कि ''बा'' काठियावाड़ी ही बोलती थीं, तो यकीन होता गया कि किसी काठियावाड़ी बोलने वाले ने ही इसे लिखा है और लिखाई में जो व्याकरण की गलतियां थीं उससे भी लगने लगा क्योंकि अगर ऐसा हुआ होता कि ''बा'' बोलती रही होंगी और कोई दूसरा डायरी लिखता रहा होगा तो वो लिखने वाला अपना कमाल दिखाता, वो ''बा'' की बोलने में जो गलतियां होतीं उसे वो सुधार देता, इसमें ये हुआ है कि जिस तरह से वे उच्चारण करती होंगी उसी तरह से उसे लिख दिया गया."

हॉस्पिटल शब्द को कहीं ''इसपिताल'' लिखा है कहीं पर ''हॉस्टिपल'' लिखा है, कहीं पर ''इसपताल'' लिखा है, इस एक ही शब्द को तरह अलग-अलग जगह पर अलग-अलग तरीके से लिखा है, जैसे सुपरिटेंडेंट जो जेल में होते थे उन्हें, कहीं ''सुपरीटेन'',''सुपलीनटेन'', ''सुकटेनली'' शब्द को गलत अक्षरों में लिखा है, ये सिर्फ वही लिख सकता है जिस लिखने का ज्ञान ना हो अगर ''बा'' बोलती और कोई और लिखता तो, भले ही ''बा'' बोलतीं गलत लेकिन वो लिखता तो सही, मैं जब ये सब पढ़ता गया तो यकीन और भी ठोस होता गया कि ये तो ''बा'' ने ही लिखा है."

महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी
TOPICAL PRESS AGENCY/GETTY IMAGES
महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी

डायरी में क्या लिखा है?

बीबीसी संवाददाता ने उनसे पूछा कि हम जब इतिहास को पढ़ते हैं तो महात्मा गांधी के बारे में तो बहुत कुछ है लेकिन उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी के बारे में उतना ज्यादा पढ़ने को नहीं मिलता है, जो ये डायरी लिखी गई है वो 1933 के आस-पास लिखी गई है, इस डायरी को अगर कस्तूरबा ने लिखा है तो उन्होंने अपने बारे में क्या लिखा है?

इस सवाल का जवाब देते हुए तुषार गांधी ने कहा 'इसमें ''बा'' ने अपने बारे में व्यक्तिगत कुछ नहीं लिखा है, ये उस वक्त की डायरी थी जब वो अपने पति से अलग थीं. वो कहीं अलग जेल में बंद थीं, बापू किसी और जेल में बंद थे. ये जो उनका एक दूसरे से अलग रहने का वक्त था, उसका ब्यौरा ''बा'' ने लिखा है, अपने बारे में बस यही लिखा है कि उन दिनों मैंने क्या किया, उसके मुताबिक ही लिखा है यानी इससे आपको ''बा'' की जीवनशैली और नित्यकर्म से, वो क्या थीं, ये पता चलता है.'

एक सवाल ये भी उठता है कि क्या कस्तूरबा गांधी सिर्फ अपने बारे में लिखती थीं या आस-पास जो घटित हो रहा था उसके बारे में भी अपने विचारों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती थीं.

इस सवाल के जवाब में तुषार गांधी दावा करते हैं कि ''बा'' ने डायरी में अपने मन के विचार उतने नहीं लिखे हैं, जितना उन्होंने आस-पास में जो हो रहा था, उसके बारे में लिखा है. कई जगहों पर उस वक्त की जो राजनीति थी, उस पर भी अपने विचार प्रकट किए हैं."

बापू की ताक़त थीं कस्तूरबा गांधी

महात्मा गांधी की ज़िंदगी पर कस्तूरबा गांधी का क्या प्रभाव रहा, इस सवाल के जवाब में तुषार गांधी का कहना था, "मुझे लगता है और बापू ने भी ये बात मानी थी कि जो उनके जीवन का प्रयास था और जिस मंज़िल तक वो पहुंचे और जो परिवर्तन उनके जीवन में आता गया, उन सारी चीजों में उन्हें 'बा'' का सहारा और साथ न मिला होता तो उनके लिए ये सब हासिल करना नामुमकिन हो जाता."

वे कहते हैं, "उनके हर बदलाव के साथ 'बा'' अपने आप को बदलती गईं और उसमें जो बापू को सहारे और ताकत की ज़रुरत पड़ी, वो देती गईं और इसके साथ ही अपनी ओर से एक मौन समर्थन से भी शक्ति प्रदान करती गईं. बापू को ये अहसास था कि मेरे पीछे कोई है, सारी चीजों को संभाल लेने वाला और ज़रुरत पड़ने पर मुझे भी संभाल लेने वाला, कोई मेरे साथ है, मेरे पास है.. ये हमें बापू के जीवन के आखिरी चार सालों में भी देखने को मिलती है जब 'बा'' उनके साथ नहीं थीं. उस समय जो बापू को अधूरापन महसूस होता था हमें भी दिखने लगा था कि जैसे बापू बेसहारा हो गए हों और खोज रहे हों उनके जीवनसाथी को. वो जो चीज हमें दिखाई देने लगी थी तो उससे पता चलता है कि 'बा'' का महत्व कितना था बापू के लिए."

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