CBI डायरेक्टर को हटाने का मोदी सरकार का बहाना कितना सही?

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पिछला पूरा हफ़्ता सीबीआई विवाद से जुड़ी ख़बरों से भरा रहा.

लेकिन इस बीच एक और जाँच एजेंसी- केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) भी लोगों के फ़ोकस में आ गई.

साथ ही क़रीब दो सालों के बाद फिर चर्चा में आ गए हैं आयोग प्रमुख केवी चौधरी, जिनकी नियुक्ति का जमकर विरोध किया था मशहूर वकील राम जेठमलानी ने और मामला सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तक जा पहुँचा था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साल 2015 में भेजी गई चिट्ठी में राम जेठमलानी ने चौधरी पर 'आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने' और 'भ्रष्ट व राष्ट्र-विरोधी तत्वों से मदद लेने' का आरोप लगाया था.

राम जेठमलानी केवी चौधरी की नियुक्ति के पक्का होने पर इस क़दर नाराज़ हुए थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री से ये तक कह डाला था कि "आपके लिए मेरा घटता हुआ सम्मान आज पूरी तरह ख़त्म हो गया."

'सीवीसी की सिफारिश पर की गई कार्रवाई'

मंगलवार आधी रात के बाद सीबीआई में हुए कथित सत्ता-पलट पर सरकार की तरफ़ से बोलते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सीबीआई में जो बदलाव हुए हैं वो सीवीसी की सिफ़ारिश पर किए गए हैं.

सरकार ने आयोग का जो आठ पन्नों का लंबा आदेश जारी किया है, उसमें सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा पर 'सीवीसी में उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले में चल रही जाँच में जानबूझकर बाधा डालने' और एजेंसी में गुटबाज़ी की वजह से माहौल ख़राब होने की बात कही गई है.

मुख्य सतर्कता आयुक्त और दो अन्य आयुक्तों के हस्ताक्षर से जारी इस निर्देश में कहा गया है कि भ्रष्टाचार से जुड़े सभी मामलों की जाँच या किसी और तरह की कार्रवाई में सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा से सारे अधिकार वापस ले लिए जायें.

अरुण जेटली के बयान के बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जहां इसका जवाब तंज़ में दिया, वहीं वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर ने कहा, "सीवीसी के नाम का इस्तेमाल एक रणनीति के तहत किया जा रहा है ताकि सरकार आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने और एजेंसी चीफ़ के तौर पर उनके सारे अधिकारों को सीज़ किए जाने के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट के सामने जायज़ ठहरा सकें."

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मंगलवार को क्या हुआ था?

सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल कर चुके हैं जिसकी सुनवाई आज यानी शुक्रवार को होनी है.

सरकार ने आयोग के आदेश की जो कॉपियां मुहैया करवाई हैं, उस आदेश पर मंगलवार, 23 अक्तूबर की तारीख़ दर्ज है.

मंगलवार आधी रात को ही पुलिस ने सीजीओ कॉम्पलेक्स स्थित सीबीआई मुख्यालय की घेराबंदी कर दी थी.

एजेंसी में वरीयता के क्रम में नंबर चार यानी जॉइंट डायरेक्टर एम नागेश्वर राव उसी रात पुलिस दल-बल के साथ वहाँ पहुंचे और तक़रीबन रात 2 बजे उन्होंने डायरेक्टर का चार्ज ग्रहण कर लिया. आनन-फ़ानन में आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के दफ़्तरों पर ताले डाल दिए गए.

आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को सूचना दे दी गई कि उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया है.

सीवीसी के ऑर्डर में कहा गया है कि आयोग दो आला अधिकारियों के एक-दूसरे पर लगाये गए भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहा था.

सरकार की घबराहट!

सुबह होते-होते ख़बर आई कि एजेंसी के लगभग दर्ज़न भर अधिकारियों का तबादला कर दिया गया है और इनमें वो अधिकारी भी शामिल थे जो अस्थाना के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले की जांच कर रहे थे.

राजनीतिक विश्लेषक उर्मिलेश कहते हैं कि "ऐसी घटना तो इमरजेंसी में भी नहीं हुई थी."

उर्मिलेश सरकार की ज़ल्दबाज़ी की बात करते हुए कहते हैं, "कोई न कोई सूचना रही होगी जिसने सरकार की घबराहट को इस क़दर बढ़ा दिया कि रातोंरात इतनी बड़ी कार्रवाई कर दी गई."

जेटली
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PMने CBI चीफ़को मुलाकात के लिए बुलाया

प्रधानमंत्री ने मंगलवार शाम ही आलोक वर्मा को मुलाक़ात के लिए तलब किया था.

उसी रात सीबीआई पर इतनी बड़ी कार्रवाई हुई जिसे एजेंसी में 'तख़्तापलट' के नाम से भी पुकारा जा रहा है.

हाल के दिनों में ये बात सामने आई थी कि सीबीआई ने अपने नंबर-2 यानी राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और साज़िश रचने के मामलों में एफ़आईआर दर्ज की है.

उसी क्रम में ये बात भी सामने आई थी कि अस्थाना ने भी अपने बॉस यानी आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ लिखित शिकायत कर रखी है जिसमें उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाये गए हैं.

गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी अस्थाना, पीएम नरेंद्र मोदी के क़रीबी बताये जाते रहे हैं.

जब ये मामला हर दिन अख़बारों की सुर्खियां बनने लगा तो प्रधानमंत्री ने आलोक वर्मा को मुलाक़ात के लिए बुलाया.

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फ़ैसले को सही साबित करने की कोशिशें

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने की ख़बर किसी जूनियर अधिकारी से मिली. उन्हें बताया गया कि उनके सारे अधिकार सीज़ हो गए हैं.

बुधवार दिन में बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में अरुण जेटली ने कहा कि दो अधिकारियों की लड़ाई जिसमें वो एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे थे, उसमें ठीक तरह से जाँच किए जाने के लिए ये ज़रूरी था कि उन्हें पद से अलग कर दिया जाए.

वित्त मंत्री ने ये भी दावा किया कि ये सब कुछ सीवीसी यानी केंद्रीय सतर्कता आयोग के आदेश पर हुआ है.

राजनीतिक विश्लेषक संजय कपूर कहते हैं कि हुक़ूमत इस बात से बुरी तरह घबराई हुई है कि न जाने मुख्य न्यायाधीश मामले पर किस तरह का रुख अपनायेंगे और वो सीवीसी का नाम लेकर आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने को सही ठहराना चाहती है.

कुछ जगहों पर ये भी कहा जा रहा है कि आलोक वर्मा ने अपने नंबर-2 यानी राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने से पहले सरकार की मंजूरी नहीं ली और ये मुद्दा भी उनके ख़िलाफ़ गया.

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नियम, कायदे, क़ानून

हालांकि ऐसी ख़बरें भी हैं कि आलोक वर्मा ने तो सरकार से मंज़ूरी मांगी थी, लेकिन सरकार इसपर चुप्पी साधे रही.

सीवीसी के पूर्व सदस्य आर श्री कुमार कहते हैं कि "ये बात सही है कि जॉइंट सेक्रेटरी रैंक से ऊपर के लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए हुक़ूमत की रज़ामंदी अनिवार्य है, लेकिन अगर कोई विशेष परिस्थिति पैदा हो जाये तो क़ानून बाधा नहीं बन सकता है."

आर श्री कुमार जो कि कर्नाटक के पुलिस प्रमुख भी रह चुके हैं, कहते हैं कि अगर किसी तरह की कोई जाँच जारी है और अधिकारी को लगता है कि देरी होने पर जांच बाधित हो सकती है तो वो केस दर्ज कर सकता है. हालांकि ये देखना होगा कि उस समय क्या हालात थे.

सीवीसी भी सवालों के घेरे में

सीवीसी का नाम आने पर केवी चौधरी की नियुक्ति के समय से मचा बवाल फिर से चर्चा में हैं और कहा जा रहा है कि क्या इस सरकार में कोई भी ऐसी संस्था बची रह गई है जिसमें दाग़ न लगा हो!

केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) एक स्वायत्तशासी संस्था है और उसके पास भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में सीबीआई पर नज़र रखने का अधिकार है.

सीवीसी सरकार के प्रतिनिधि के साथ मिलकर जांच एजेंसी में बहालियों के लिए उम्मीदवारों की लिस्ट भी तैयार करती है.

लेकिन सीबीआई के निदेशक की बहाली एक समिति के ज़रिए की जाती है जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा भारत के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं.

सीवीसी के पास ये सारे अधिकार केंद्रीय सतर्कता आयोग क़ानून, दिल्ली पुलिस क़ानून और लोकपाल क़ानून के तहत मौजूद हैं.

सुप्रीम कोर्ट
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'आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना का पद बरकरार'

सीवीसी का गठन साल 1964 में सरकार के भीतर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए लाये गए एक क़ानून के तहत हुआ था और शुरुआत में कमीशन महज़ एक सदस्यीय हुआ करता था.

लेकिन अब उसमें तीन सदस्य- मुख्य सतर्कता आयुक्त और दो मुख्य आयुक्त होते हैं. उनके बहुत सारे अधिकार सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर होते हैं.

बहरहाल, ये मामला फ़िलहाल सुलझने की बजाय उलझता दिखाई दे रहा है और वर्मा के सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद अदालत के सामने एम नागेश्वर राव को सीबीआई प्रमुख बनाए जाने को लेकर याचिका दायर हो गई है.

शायद इसी वजह से गुरुवार देर शाम सीबीआई ने बयान दिया है कि आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को सिर्फ़ छुट्टी पर भेजा गया है और उनका पद बरक़रार है और राव को जो चार्ज दिया गया है वो सिर्फ़ अंतरिम है.

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