प्याज़ का इतिहास, भूगोल, राजनीति और अर्थशास्त्र
प्याज़ की कीमत देश की राजधानी दिल्ली में प्रति किलो हाफ सेंचुरी के पार है. देश के बाकी शहरों में भी कीमतें कमोबेश पचास से साठ रुपए प्रति किलो ही हैं.
प्याज़ वो सब्ज़ी है जिसमें सरकारों को हिलाने की ताक़त है. प्याज़ देश की रसोई से चढ़ती कीमतों की वजह से ग़ायब है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस प्याज़ पर भारतीय फ़िदा हैं, वो भारतीय नहीं है.
प्याज़ का इतिहास
प्याज़ का प्रयोग आज से 4,000 साल पहले भी विभिन्न व्यंजनों में किया जाता था.
यह बात पता चली मेसोपोटामिया काल के एक लेख से जिसे सबसे पहले पढ़ा 1985 में एक फ़्रेंच पुरातत्वविद ने. आज दुनिया के लगभग सभी देशों में प्याज़ की खेती होती है.
चीन और भारत मिलकर दुनिया के कुल उत्पादन (सात करोड़ टन) का क़रीब 45 प्रतिशत पैदा करते हैं.
लेकिन खाने के मामले में ये दोनों दुनिया के शीर्ष देशों में नहीं हैं.
साल 2011 के संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के मुताबिक़ लीबिया में हर व्यक्ति साल में औसतन 33.6 किलो प्याज़ खाता है.
दुनिया के ज़्यादातर देशों के व्यंजनों में इसका इस्तेमाल आम है. इसके पीछे की वजह प्याज़ का पौष्टिक होना माना जाता है.
आने वाले दिनों में बढ़ेगें प्याज़ के दाम , ये हैं कारण...
कितना पौष्टिक है प्याज़?
डायटिशियन डॉक्टर अर्चना गुप्ता के मुताबिक, "प्याज़ एक लो कैलरी फ़ूड है. इसमें फ़ैट न के बराबर होता है, लेकिन विटामिन-सी भरपूर मात्रा में पाई जाती है."
डॉक्टर अर्चना गुप्ता का कहना है, "100 ग्राम प्याज़ में पाए जाने वाले पौष्टिक तत्व की बात करें तो इसमें 4 मिलीग्राम सोडियम, 1 मिलीग्राम प्रोटीन, 9-10 मिलीग्राम कार्बोहाइड्रेट और 3 मिलीग्राम फ़ाइबर होता है."
इसलिए डॉक्टर भी प्याज़ खाने की सलाह देते हैं. कैंसर की बीमारी वालों को खास तौर पर इसकी ज़्यादा ज़रूरत होती है क्योंकि इसमें एंटी ऑक्सीडेंट अधिक मात्रा में पाए जाते हैं.
प्याज से प्यार 4000 साल पुराना
दिल्ली में प्याज़ की कीमतें
दिल्ली की आज़ादपुर मंडी में थोक प्याज़ व्यापारी राजेन्द्र शर्मा के मुताबिक, "प्याज़ के दाम बढ़ने के पीछे वजह डिमांड और सप्लाई का अंतर है. पिछले एक ढेड़ साल से किसानों को प्याज़ की पैदावार के लिए उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा था, इसलिए इस बार किसानों ने प्याज़ लगाना उचित नहीं समझा और पैदावार कम हुई है."
प्याज़ की सबसे ज्यादा पैदावार भारत में महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में होती है, लेकिन इस बार इन राज्यों में बारिश ज़्यादा हुई जिस वजह से प्याज़ की फसल बर्बाद हो गई.
राजेन्द्र शर्मा के मुताबिक, "दिल्ली में प्याज़ के दाम बढ़ने के पीछे मध्य प्रदेश सरकार का भी हाथ है. किसानों को उचित दाम देने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने थोक में प्याज़ खरीद लिया, लेकिन स्टोर करने के लिए बेहतर इंतजाम नहीं थे, इसलिए ज्यादातर प्याज़ बर्बाद हो गया."
प्याज़ का मंडी से लेकर किचन तक का सफ़र
महाराष्ट्र की मंडी में आज भी प्याज़ 26 रुपए प्रति किलो ही बिक रहा है, लेकिन मंडी से घर पहुंचते पहुंचते क़ीमत दोगुनी हो जाती है.
इसकी वजह बताते हुए महाराष्ट्र के लासलगांव मंडी के थोक व्यापारी जय दत्त होलकर कहते हैं, "दिल्ली का थोक व्यापारी महाराष्ट्र आकर प्याज़ खरीदता है तो 26 रुपए प्रति किलो वाला प्याज़, दिल्ली के खुदरा व्यापारी को 30- 32 रुपए प्रति किलो मिलता है."
थोक हो या खुदरा व्यापारी, लागत पर पैकिंग, माल ढुलाई और मुनाफा जोड़ कर किसी भी चीज़ का दाम तय करता है. लेकिन सामान की सप्लाई जब कम होती है तो व्यापारी मुनाफ़ा मनमाना लगाते हैं. ये भी एक वजह है महाराष्ट्र में 26 रुपए किलो मिलने वाला प्याज़ दिल्ली में 50-60 रुपए प्रति किलो बिक रहा है.
बिना प्याज़ के खाना
दिल्ली से सटे इंदिरापुरम में रहने वाली कमला इस बार प्याज़, सड़क किनारे लगे ठेले से नहीं लेकर आईं. पांच रुपए बचाने के चक्कर में कमला ने हफ्ते में एक बार लगने वाले शनिवार बाज़ार से खरीदना बेहतर समझा. जब उनसे बीबीसी ने वजह पूछी, तो कमला का जवाब था, "मेरे घर में कोई भी सब्ज़ी बिना प्याज़ के नहीं बनती. दाल के तड़के से लेकर हर किस्म के पराठे में मैं प्याज़ का इस्तेमाल करती हूं."
कमला उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं. उनके मुताबिक बिना प्याज़ के खाना बनाने का चलन न तो उनके ससुराल में है और न मायके में.
हालाँकि त्योहार के दौरान या व्रत में मिलने वाले खाने में प्याज़ न डालने का चलन रहा है.
समोसे के भारत पहुंचने की कहानी
प्याज़ पर राजनीति
समय-समय पर प्याज़ का दाम महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बनता रहा है. प्याज़ का चुनाव पर सबसे सीधा असर शायद 1998 में दिखा. माना जाता कि उस साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार में प्याज़ की ऊंची क़ीमतों का हाथ था.
प्याज़ की बढ़ती कीमतों को देखते हुए मौजूदा सरकार ने भी प्याज़ के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य पिछले हफ्ते बढ़ा दिया है ताकि कम से कम प्याज़ बाहर भेजा जा सके.
सीधी-सी बात है कि प्याज़ की रुलाने की ताक़त से सरकार भी अच्छी तरह परिचित है.
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