#HisChoice : 'मैं हाउस हसबैंड हूँ, पर लोगों को इससे क्या शिक़ायत है?'

हाउस हसबैंड
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मैं अपनी ससुराल में था. मौका था मेरी साली की शादी. मेरे और मेरी पत्नी के साथ इस बार परिवार का एक नया सदस्य भी था- मेरी बेटी.

मेरी पत्नी शादी ब्याह की रौनक और गीत-संगीत में मस्त थीं और मेरी बेटी मुझसे चिपकी थी क्योंकि उसे मेरे साथ रहने की आदत थी.

हम गपशप में मशगूल थे तभी मेरी बेटी ने पॉटी कर दी. जैसे ही मैं उसे साफ़ करने के लिए भागा मेरी सास ने मुझे टोक दिया.

एक कोने में ले जाकर उन्होंने मुझे सख़्ती से कहा, "आप इस घर के दामाद हैं ये आप क्या कर रहे हैं. रिश्तेदार देखगें तो क्या कहेंगे. सोनाली को बुलाइये. वो बच्ची की पॉटी साफ़ करेगी और उसे डॉयपर पहनाएगी.'

मैं कुछ कह पाता कि ये मैं भी कर सकता हूं, इतनी देर में मेरी सास ने मेरी पत्नी को बुलाया और कहा, 'जाओ अपनी बेटी की पॉटी साफ़ कर दो'.

मैं और मेरी पत्नी एक दूसरे को देखने लगे. मेरी सास ने फिर तल्ख़ लहज़े में कहा, 'सोनाली...' और वो मेरी बेटी को तुरंत वॉशरुम ले गईं.

मैं हैरान था. क्योंकि मेरे लिए ये काम नया नहीं था और मेरे सास ससुर को ये पता था कि मैं हाउस हसबैंड हूं.

बीबीसी हिन्दी
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पर शर्मिंदगी शायद औरों की वजह से रही होगी. कई लोगों के चेहरे पर एक तंज़ भरी मुस्कान थी.

शादी के इस शोर शराबे में दबी ज़ुबान में मेरे कानों में ये आवाज़ कई बार पड़ी थी कि 'ये हाउस हसबैंड है न'.

मेरे सास ससुर नहीं चाहते थे कि ये बात जग ज़ाहिर हो. मैं जानता हूं कि लोग तो आपका मज़ाक उड़ाते ही इसलिए हैं ताकि आप लज्जित महसूस करें.

लेकिन मैंने भी तय कर लिया था कि ना मैं शर्मिंदगी महसूस करूंगा और ना ही अपना नज़रिया बदलूंगा.

हमने अंतरजातीय प्रेमविवाह किया है. शुरुआत में ही हमने तय कर लिया था कि करियर में जिसे अच्छा मौका मिलेगा वह आगे जायेगा. और शुरू से ही मेरा करियर ठीक नहीं चल रहा था.

इस बीच सोनाली क़ामयाबी की सीढ़ियां चढ़ती चली गईं.

हमने तय कर लिया कि मैं घर का काम देखूंगा और वो नौकरी करेंगी.

मेरे घर में काम करने के लिए कोई सहयोगी नहीं है. मैं ही झाड़ू-पोछा और बर्तन धोने के साथ-साथ साग सब्ज़ी लाने और खाना बनाने का काम करता हूं.

शायद उन्हें मेरा घर पर काम करना अजीब लगता था लेकिन घर का काम करना मेरे लिए आम बात थी.

मैं अपने घर में तीन भाइयों में सबसे छोटा हूं. मैं अपने घर में भी अपनी मां का हाथ बंटाया करता था और उस समय मेरे दोस्त मुझे 'गृहणी' नाम से चिढ़ाते भी थे.

अब दिल्ली के मेरे पढ़े लिखे दोस्त मेरी घर पर काम करने की 'चॉइस' को समझने लगे हैं लेकिन जब मैं अपने शहर भोपाल जाता हूँ तो मेरे दोस्त मेरी खिल्ली उड़ाते हैं.

जब किसी राजनीतिक या गंभीर मुद्दे पर बहस होती है तो सब मेरी बात बीच में ही काटकर कह देते हैं कि तुम नहीं जानते छोड़ दो ये बड़े मुद्दे हैं.

मुझे अपनी जगह दिखाने की कोशिश की जाती है.


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एक बार तो ऐसा हुआ कि दोस्त किसी मसले पर चर्चा कर रहे थे कि मैंने जैसे ही कुछ कहने के लिए मुंह खोला- मेरे दोस्त ने कहा कि अरे तुम छोड़ो और चाय बना लाओ.

तो मैंने भी मुस्करा कर उसे जवाब दिया कि चाय क्यों पकौड़े भी बना लाता हूं. मैं ये सब स्पोर्टिंगली लेता हूं.

मेरे कुछ दोस्त तो अब भी फ़ोन करके मेरा मज़ाक उड़ाते है कि क्या भाई आज खाने में क्या बना रहे हो?

लोग घर के काम को काम नहीं समझते. दोस्त तो मुझे ये कहकर ताना कसते हैं कि तुम तो घर पर बैठकर ऐश करते हो.

लेकिन वो ये नहीं जानते कि मैं भी काम पर जाने वाले किसी मर्द की तरह तड़के उठता हूं. घर और बाहर के सारे काम करता हूं.

और मैं ये भी समझ गया हूं कि ऐसा बोलनेवाले लोग 'हाउसवाइफ़' को कितनी हीन दृष्टि से देखते हैं और उसके काम की कोई कद्र नहीं करते.

हमारी शादी के चार साल बाद हमारी बेटी का जन्म हुआ. अब मेरे ऊपर ज़िम्मेदारी का और बोझ बढ़ा. मां होना तो एक फ़ुलटाइम जॉब जैसा था.

घर देखने के साथ बेटी को नहलाना, खिलाना और उसे सैर करवाना सब मेरी ज़िम्मेदारी थी.

जब मैं अपनी बेटी को पार्क ले जाता था तो शुरूआत में महिलाएं मेरी बेटी को प्यार करने आती थीं. लेकिन चार-पांच दिन बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि आज भी आप आये हैं? गुड़िया की मां कहा है? क्या तबीयत ठीक नहीं है? वगरैह-वगरैह.

जब मैंने जवाब दिया था कि मेरी बीवी काम पर जाती है और मैं बच्ची को संभालता हूं, तो सवालों की नई बौछार शुरू हो गई.

आप इतनी छोटी बच्ची को कैसे संभाल लेते हैं? वो क्या आपके पास रह जाती है? उसे कौन नहलाता है? उसको कौन खाना खिलाता है? आदि आदि.

उनके चेहरे के ऐसे भाव होते जैसे मैं कोई नायाब काम कर रहा हूं. मैं ये कैसे कर सकता हूं. मैं कैसा आदमी हूं जो घर में रहता है और काम पर नहीं जाता.

यहाँ तक कि वो मुझे 'फोकट' कहकर मेरा पीछे से मज़ाक उड़ाते हैं.


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शादी के बाद जब पहली बार मेरे माता-पिता घर आये और मुझे घर का काम करते देखा तो मेरी मां को भी पसंद नहीं आया.

मेरी मां मुझे कुछ कहती तो नहीं थी लेकिन मैं उनके हाव-भाव से समझ जाता था कि वो सहज नहीं हैं.

जैसे आंखों ही आंखों में पूछती हों- क्यों तुम कमाने बाहर नहीं जाते हो और बहु क्यों नहीं नौकरी के साथ-साथ घर का काम कर सकती है?

मेरी पत्नी ने मेरी मां की असहजता को भांपकर घर का काम करना शुरू भी किया लेकिन वो कर नहीं पायीं. बाद में मैंने ही सोनाली को घर का काम करने से मना कर दिया.

मेरी मां को ये बात समझ तो आई लेकिन वो कुछ नहीं बोली और इस मामले पर हमेशा के लिए चुप्पी साध ली.

अब मेरी बेटी स्कूल जाती है. उसे स्कूल की तरफ से फ़ैमिली-ट्री बनाने के लिए दिया गया.

मैं घर से बाहर था और मेरी पत्नी ने मेरी बच्ची की मदद की और उस फैमिली-ट्री में मेरा नाम 'हेड ऑफ़ द फ़ैमिली' में लिख दिया.

जब मैंने देखा तो इस पर एतराज़ जताया. मेरा कहना था कि जब सोनाली नौकरी करती है, घर में पैसा लाती है तो वो ही 'हेड ऑफ़ द फ़ैमिली' हुई.

लेकिन सोनाली नहीं मानी. उसने कहा 'हेड ऑफ़ द फ़ैमिली' वो मर्द या औरत होनी चाहिए जो घर चलाते हों. उसने मेरा नाम नहीं हटाया.

वैसे मैं फ्रीलांसर लेखक हूं और घर पर रहकर लिखने का काम करता हूं. मेरी दो किताबें छप चुकी हैं और तीसरी छपने वाली है. लेकिन लोग इसकी अहमियत नहीं समझते हैं.

मेरी पत्नी को भी ऑफ़िस में ऐसे ही कुछ सवालों का सामना करना पड़ता है. लेकिन हम दोनों में इतना प्यार है कि हमारे रिश्ते पर इसका कोई असर नहीं पड़ा.

मेरे भाई मेरे घर पर काम करने को लेकर कुछ कहते नहीं हैं पर उसकी तारीफ़ भी वो नहीं करते. लेकिन घर की महिलाएं मेरी ख़ास इज़्ज़त करती हैं.

मैं जानता हूँ कि आप जब कुछ अलग करते हैं तो पहले लोग मज़ाक उड़ाते है, फिर आलोचना करते हैं और आख़िर में स्वीकार करने लगते हैं.

मैं अभी पहले पायदान पर ही हूं.

(ये कहानी एक पुरुष की ज़िंदगी पर आधारित है जिनसे बात की बीबीसी संवाददाता नीलेश धोत्रे ने. उनकी पहचान गुप्त रखी गई है. इस सिरीज़ की प्रोड्यूसर सुशीला सिंह हैं.)

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