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    सीबीआई विवाद: सेलेक्ट कमेटी में इन तमाम वजहों पर बहस के बाद हुआ आलोक वर्मा का तबादला

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    नई दिल्ली। सीबीआई के चीफ आलोक वर्मा को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एक बार फिर से उनके पद पर बहाल किया गया था। लेकिन पद पर बहाल किए जाने के महज दो दिन बाद ही उनका तबादला कर दिया गया। लेकिन इस बार उनका तबादला सिर्फ केंद्र सरकार के आदेश पर नहीं बल्कि उच्च स्तरीय सेलेक्ट कमेटी के आदेश पर किया गया, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। तीन सदस्यों की इस कमेटी में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जून खड़गे, सुप्रीम कोर्ट के जज एके सीकरी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे।

    वर्मा के खिलाफ 10 मामले

    वर्मा के खिलाफ 10 मामले

    जस्टिस सीकरी उस पैनल के सदस्य भी थे जिसे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने बनाया था। इसी पैनल ने आलोक वर्मा को एक बार फिर से उनके पद पर बहाल करने का फैसला दिया था। कमेटी के फैसले का मल्लिकार्जुन खड़गे ने विरोध किया था, जबकि पीएम मोदी और जस्टिस सीकरी ने आलोक वर्मा को ट्रांसफर कर दिया था। आलोक वर्मा को ट्रांसफर सीवीसी की रिपोर्ट के बाद किया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आलोक वर्मा के खिलाफ 10 मामले हैं, जिसमे से 5 मामलों में सीवीसी के पास सबूत हैं।

    दो करोड़ की घूस का आरोप

    दो करोड़ की घूस का आरोप

    आलोक वर्मा पर जो सबसे बड़ा आरोप है वह यह कि उन्होंने बिजनेसमैन से दो करोड़ रुपए की घूस ली थी, जिसकी जांच सीबीआई कर रही थी। जांच में कहा गया है कि इस मामले में स्थितियों को देखते हुए इसकी जांच किए जाने की जरूरत है। यही नहीं आलोक वर्मा ने घूस ली है इसके भी सबूत मौजूद हैं, लिहाजा इसकी जांच की जरूरत है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आईआरसीटीसी मामले में भी आलोक वर्मा पर संगीन आरोप है और उनके खिलाफ जांच किए जाने की जरूरत है।

    आलोक वर्मा पर कई संगीन आरोप

    आलोक वर्मा पर कई संगीन आरोप

    इसके अलावा दिल्ली एयरपोर्ट पर गोल्ड तस्करी मामले में कार्रवाई नहीं करने का भी आलोक वर्मा पर आरोप है, इसकी भी जांच की जरूरत है। सूत्रों की मानें तो सीवीसी की जांच के आधार पर ही आलोक वर्मा के खिलाफ कार्रवाई की गई और उच्च स्तरीय पैनल ने उनका तबादला कर दिया। पैनल की ओर से कहा गया कि आलोक वर्मा से जांच में जिस उच्च स्तरीय विश्वसनीयता की अपेक्षा थी उसे उन्होंने पूरा नहीं किया लिहाजा उनका तबादला किया जाना चाहिए। सूत्र के अनुसार आईआरसीटीसी मामले में सीवीसी को ऐसा लगता है कि आलोक वर्मा ने जानबूझकर एक नाम को एफआईआर से हटाया था, जिसकी वजह हर किसी को पता है।

    क्या कहा खड़गे ने

    क्या कहा खड़गे ने

    सूत्रों का कहना है कि पैनल को ऐसा लगता है कि इन तमाम मामलों में आलोक वर्मा के खिलाफ जांच की जानी चाहिए और उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर जांच की जानी चाहिए। इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए आलोक वर्मा को सीबीआई के चीफ के पद रखने की जरूरत नहीं है और उनका तबादला किया जाना चाहिए। लेकिन इन तमाम रिपोर्ट के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे ने कमेटी के फैसले का विरोध किया। उन्होंने कहा कि वर्मा के खिलाफ जांच की जानिए लेकिन उन्हें उनके पद से नहीं हटाना चाहिए। उन्होंने इस बात की भी वकालत की थी कि आलोक वर्मा को उनके पूरे अधिकार दिए जाने चाहिए साथ ही 77 दिनों का एक्सटेंशन भी दिया जाना चाहिए। उन्होंने 23 और 24 अक्टूबर की रात जो वाकये हुए थे उनकी भी जांच की मांग की थी। इससे सरकार का सीबीआई डायरेक्टर के खिलाफ षड़यंत्र उजागर हो जाएगा।

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    English summary
    Here is why CBI chief Alok Verma was transferred from his post explained.
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