हिंदुत्व, भीमा-कोरेगांव, सावरकर को भारत रत्न की मांग के बीच NCP-Sena-Congress की चुनौतियां
नई दिल्ली। महाराष्ट्र के इतिहास में पहली बार तीन अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियां एक साथ मिलकर सरकार बनाने जा रही हैं। प्रदेश में पहली बार एनसीपी-शिवसेना और कांग्रेस गठबंधन की सरकार का गठन होने जा रहा है। यूं तो तीनों ही दलों के नेता आपसी तालमेल का दावा करते हुए प्रदेश के हित में एक साथ आने की बात कह रहे हैं। लेकिन तीनों ही दलों के लिए आने वाला समय आसान नहीं होने वाला है। 2014 में भाजपा नेता मधु चव्हाण ने मांग की थी पार्टी को शिवसेना से अपनी राह अलग करके अकेले चुनाव मैदान में जाना चाहिए। चव्हाण का कहना था कि शिवसेना के साथ भाजपा का गठबंधन तीनों पैरों की रेस की तरह है।

विचारधारा की लड़ाई
अहम बात यह है कि महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना सरकार के दौरान भाजपा सरकार शिवसेना के गढ़ में विकास के कार्यों में तेजी लाई और विधानसभा चुनाव के ठीक पहले अपना गठबंधन खत्म कर लिया और प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। लेकिन इसी तरह की मुश्किल शिवसेना को मौजूदा सरकार में उठानी पड़ सकती है। हालांकि इस गठबंधन में एनसीपी और कांग्रेस काफी हद तक एक ही विचारधारा की समर्थन हैं, लेकिन शिवसेना की विचारधारा पूरी तरह से इनसे उलट है। एनसीपी 1999 में कांग्रेस से ही अलग होकर बनी थी।

हिंदुत्व बनाम अल्पसंख्यक
शिवसेना को कट्टर हिंदुत्व का समर्थक माना जाता है, ऐसे में कांग्रेस के लिए शिवसेना के साथ लंबे समय तक बने रहना आसान नहीं होगा। केंद्र की राजनीति में कांग्रेस के लिए अल्पसंख्यक वोटरों को साधना काफी अहम है, लेकिन इस राह में शिवसेना का साथ उनके लिए बड़ी बाधा साबित हो सकता है। ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि अल्पसंख्यकों को साधने की जब बात होगी तो कांग्रेस किस तरह से शिवसेना के साथ होकर खुद की छवि सेक्युलर होने का दावा करेगी।

एक दूसरे के खिलाफ उतारे थे उम्मीदवार
वहीं महाराष्ट्र की बात करें तो शिवसेना और एनसीपी दोनों ही अपनी जमीन को मजबूत करने का काम करेंगी। शिवसेना ने प्रदेश में कुल 124 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उसमे से पार्टी ने एनसीपी के 57 उम्मीदवारों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे थे। मंझे हुए नेता के तौर पर जाने जाने वाले शरद पवार इस बात से वाकिफ हैं कि उनकी पार्टी को सरकार विरोधी लहर के चलते भी काफी वोट मिले थे, कई जगहों पर एनसीपी को शिवसेना के खिलाफ वोट मिला है। लिहाजा उनके सामने भी यह चुनौती होगी कि कैसे अपने वोटरों को अपने साथ बनाए रखें।

सावरकर का मुद्दा
वहीं इन तीनों ही दलों के बीच के मतभेद का भाजपा हर संभव फायदा उठाने की कोशिश करेगी। यही वजह है कि भाजपा ने विनायक दामोदर सावरकर के मुद्दे पर शिवसेना को घेरना शुरू कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि शिवसेना ने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की थी जबकि कांग्रेस इसके बिल्कुल खिलाफ है। शिवसेना और एनसीपी हिंदुत्व नेता संभाजीराव भिड़े गुरुजी को लेकर अलग-अलग राय रखते हैं। संभाजीराव भीमा कोरेगांव हिंसा के आरोपी हैं और वह मुसलमानों को कोटा दिए जाने के खिलाफ हैं।












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