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लेकिन... मैं आपके 'शहीद' की बेटी नहीं हूं: गुरमेहर कौर

ब्रेकिंग न्यूज की सुर्खियों ने जो कहानी सुनाई। मैं वो सुर्खियां नहीं हूं। हाथों में प्लेकार्ड लिए जो लड़की टीवी पर थी लेकिन मैं नहीं, मैं तो अपने पापा की गुलगुल हूं।

नई दिल्ली। करीब डेढ़ महीने पहले एबीवीपी के विरोध के बाद ट्विटर ट्रोल का शिकार हुई गुरमेहर कौर ने लंबी खामोशी के बाद एक ब्लॉग लिखकर बताया है कि वो खुद को कैसे देखती हैं और पिछले दिनों अपने विरोध पर उन्हें कैसा लगता था। उन्हें अपने पिता और मां से रिश्तों और अपने शौक और आदतों पर लेख में बताया है।

लेकिन, मैं आपके 'शहीद' की बेटी नहीं हूं : गुरमेहर कौर

आपको बता दें कि फरवरी में एबीवीपी के विरोध वाली प्रोफाइल पिक्चर फेसबुक पर लगाने के बाद ये वायरल हो गई थी। इसके बाद भाजपा के नेताओं, क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग और कुछ दूसरे सेलेब्रिटी ने उनके पाक के साथ शांति की अपील वाले एक पुराने वीडियो पर कौर को निशाना बनाते हुए उनको ट्रोल किया था। इसके बाद कौर को बड़ी तादाद में लोगों का जबरदस्त समर्थन भी मिला था।

अब गुरमेहर कौर ने 'मैं कौन हूं' शीर्षक से लेख में अपने बारे में काफी कुछ बताया है। 9 अप्रैल को लिखे इस ब्लॉग का लिंक उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया है। गुरमेहर ने लिखा कि मेरे बारे में सबने अपनी-अपनी राय बना ली है, मैं अपने बारे में खुद बता रही हूं मेरा पहला ब्लॉग 'आई ऐम'.

 गुरमेहर का ब्लॉग 'मैं कौन हूं'?

गुरमेहर का ब्लॉग 'मैं कौन हूं'?

मैं कौन हूं यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब मैं कुछ हफ्ते पहले तक बेझिझक होकर किसी को भी दे सकती थी लेकिन अब इस सवाल पर मैं वैसे ही जवाब दूंगी ये मैं पक्के तौर पर ऐसा नहीं कह सकती।
क्या मैं वो हूं जो ट्रोल्स मेरे बारे में सोचते हैं?
क्या मैं वैसी हूं जैसा चित्रण मेरा मीडिया में होता है?
क्या मैं वो हूं जो सिलेब्रिटीज मेरे बारे में सोचते हैं?

नहीं, मैं इनमें से कोई नहीं हो सकती। अपने हाथों में प्लेकार्ड लिए और मोबाइल फोन के कैमरे पर टिकी आंखों वाली जिस लड़की को आपने टेलीविजन स्क्रीन पर फ्लैश होते देखा होगा, वह यकीनन मेरे जैसी ही दिखती है लेकिन क्या मैं वहीं हूं? उसके विचार मेरे जैसै हैं लेकिन ब्रेकिंग न्यूज की सुर्खियों ने जो कहानी सुनाई। मैं वो सुर्खियां नहीं हूं। मैं वो नहीं हूं।

"मैं अपने पापा की गुडिया हूं"

शहीद की बेटी, शहीद की बेटी, शहीद की बेटी... मैं अपने पिता की बेटी हूं। मैं उनकी गुड़िया हूं। मैं अपनी मां का सिरदर्द हूं। एक मूडी बच्ची, जिनमें मेरी मां की भी छाया है। मैं अपनी बहन के लिए गाइड हूं।

मैं क्लास में पहली बेंच पर बैठने वाली वो लड़की हूं जो अपने शिक्षकों से किसी भी बात पर बहस करने लगती है मेरे दोस्त कहते हैं मेरा सेंस ऑफ ह्यूमर ड्राई है। मुझे किताबों और कविताओं का शौक है। मेरे घर की लाइब्रेरी किताबों से भरी पड़ी है, ये मुझे राहत देती हैं।

"मैं जंग की बर्बादी जानता हूं इसलिए जंग नहीं चाहती"

मैं अमन को पसंद करने वाली लड़की हूं। ये सही है कि मैं जंग नहीं चाहती, ऐसा इसलिए क्योंकि मुझे पता है कि इसकी क्या कीमत देनी पड़ती है। जंग की कीमत मैंने सालों चुकाई है और आज भी हर वक्त चुकाती हूं।

न्यूज चैनल चिल्लाते हुए पोल करा रहे थे, "गुरमेहर का दर्द सही है या गलत?" दर्द की अंदाजा पोल से भी हो जाता है क्या? अगर 51 फीसदी लोग सोचते हैं कि मैं गलत हूं तो मैं फिर मैं गलत हुई और मेरा दर्द झूठा?।

"मैं आपके 'शहीद' की बेटी नहीं हूं"

मेरे पापा पिछले 18 सालों से मेरे साथ नहीं है। 6 अगस्त, 1999 को उनके दुनिया से चले जाने के बाद मैंने मौत, पाकिस्तान और जंग के बारे में सुना। तब से लगातार इन शब्दों को सोचती रहती हूं। क्या किसी को भी इसका मतलब पता है? मैं इनका मतलब ढूंढने की कोशिश कर रही हूं।

मैं अपने पिता को शहीद के तौर पर नहीं कार्गो की बड़ी जैकेट पहनने वाले शख्स के तौर पहर जानती हूं, वो शख्स जिसकी जेब से मैं टॉफी निकाल कर खाती थी। मैं उस पिता को जानती हूं जिसने मुझे स्ट्रॉ से पीना सिखाया और ना जाने जिंदगी की कितनी चीजें सिखाई। मैं उनके साथ रहना चाहती थी लेकिन वो चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए।

मेरे पिता शहीद हैं. मैं उनकी बेटी हूं लेकिन, मैं आपके 'शहीद' की बेटी नहीं हूं।

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